ऑस्ट्रेलिया देगा भारत को दुनिया का सबसे शक्तिशाली यूरेनियम, क्या है इस दुर्लभ तत्व की पूरी कहानी

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम सप्लाई समझौता हुआ है. आखिर यूरेनियम इतना महत्वपूर्ण क्यों है? धरती से निकलने, परमाणु रिएक्टर में बिजली बनाने और महाविनाशी एटम बम की सबसे बड़ी ताकत बनने तक, दुनिया के सबसे शक्तिशाली तत्व की पूरी कहानी.

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  • ऑस्ट्रेलिया से भारत आएगा यूरेनियम, PM मोदी ने कहा- न्यूक्लियर एनर्जी क्षेत्र में बड़ी डील.
  • भारत में 47 यूरेनियम भंडार हैं, पर ये पर्याप्त नहीं. तो ऑस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे देशों के खरीदना पड़ रहा है.
  • इस दुर्लभ तत्व की खदान से परमाणु रिएक्टर तक की यात्रा आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है.

भारत को जल्द ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की सप्लाई मिलने का रास्ता साफ हो गया है. इसे भारत की परमाणु ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा बड़ा कदम माना जा रहा है. दोनों देशों ने सिविल न्यूक्लियर समझौते के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को अंतिम रूप दिया है. इस समझौते के तहत भारत को ऑस्ट्रेलिया से लंबे समय तक यूरेनियम का निर्यात संभव हो सकेगा. इस खबर ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान एक ऐसे तत्व की ओर खींच दिया है, जिसका नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में परमाणु बम, रेडिएशन और युद्ध की तस्वीरें घूमने लगती हैं.

ऐसे में चलिए जानते हैं कि यूरेनियम है क्या और भारत में इसकी कीतनी मौजूदगी है? क्या यह सिर्फ हथियार बनाने के लिए इस्तेमाल होता है? क्या यही दुनिया का सबसे खतरनाक तत्व है? और आखिर ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? पढ़िए यूरेनियम की पूरी कहानी...

सबसे पहले समझिए, यूरेनियम आखिर है क्या?

यूरेनियम वो प्राकृतिक धातु है जो धरती की चट्टानों के अंदर लाखों-करोड़ों साल से मौजूद है. यह इतना भारी तत्व है कि समान आकार का यूरेनियम लोहे से लगभग ढाई गुना ज्यादा भारी होता है. लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका वजन नहीं, बल्कि इसके परमाणु के भीतर छिपी ऊर्जा है. यही ऊर्जा इसे दुनिया का सबसे अहम परमाणु ईंधन बनाती है.

यूरेनियम की खुदाई
Photo Credit: NDTV

यूरेनियम आया कहां से, इसकी खोज कब हुई?

माना जाता है कि अरबों साल पहले विशाल तारों के विस्फोट यानी सुपरनोवा के दौरान कई भारी तत्व बने. उन्हीं में से एक यूरेनियम भी था. जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तो वो तत्व इसके चट्टानों में दब गए. 1789 में जर्मनी के केमिस्ट्री के साइंटिस्ट मार्टिन हेनरिक क्लैप्रोथ ने पहली बार यूरेनियम की पहचान की. उन्होंने कुछ साल पहले 1781 में खोजे गए ग्रह यूरेनस के नाम पर रखा.  तब किसी को ये अनुमान तक नहीं था कि कैसे आने वाले वर्षों में यही तत्व समूचे दुनिया की राजनीति, विज्ञान, ऊर्जा और युद्ध की दशा-दिशा बदल देगा.

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यूरेनियम के बड़े भंडार कहां है?

यूरेनियम हर जगह नहीं मिलता. यह खास तरह की चट्टानों में पाया जाता है. दुनिया में यूरेनियम का सबसे बड़ा भंडार ऑस्ट्रेलिया में है. वहीं कजाकिस्तान दूसरे नंबर पर है तो कनाडा, नामीबिया, रूस और उज्बेकिस्तान में भी यह बड़ी मात्रा में मौजूद है. हालांकि हर जगह इसकी क्वालिटी अलग-अलग है.

एनरिच्ड यूरेनियम की हर 8-एमएम की एक गोली इतनी बिजली पैदा कर सकती है कि उससे 60 वाट का बल्ब तीन साल तक ऑन रह सकता है

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भारत में यूरेनियम कहां मौजूद है?

भारत में में यूरेनियम मौजूद है. परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय के आंकड़ों के मुताबिक भारत के आंद्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, मेघालय, राजस्थान, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र में 47 यूरेनियम भंडार हैं. इन यूरेनियम भंडारों में 4 लाख, 33 हजार, 800 टन यूरेनियम (U308) का अनुमान है.

बीते वर्ष राज्यसभा में परमाणु ऊर्जा विभाग के केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने अपने लिखित जवाब में बताया था कि झारखंड के सिंहभूम में 26 हजार टन से अधिक यूरेनियम का पता चला है. वहीं 2021 में परमाणु ऊर्जा आयोग ने आंध्र प्रदेश के कडप्पा में डेढ़ लाख टन यूरेनियम के होने का अनुमान जताया था.

अगर भारत में भंडार मौजूद हैं तो खरीदने की जरूरत क्यों पड़ी?

दरअसल, भारत अभी 8 गीगावाट परमाणु ऊर्जा बनाता है और केंद्र सरकार ने साल 2047 तक परमाणु ऊर्जा को 100 गीगा वॉट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसका जिक्र किया है. इसके लिए भारत को बड़ी मात्रा में यूरेनियम की जरूरत है. ऐसे में भारत ने उस ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम खरीदने का करार किया है जिसके पास दुनिया का करीब 32 फीसद भंडार मौजूद है. भारत ने ऐसे ही करार कनाडा के साथ भी कर रखे हैं. जहां दुनिया के सबसे हाई क्वालिटी यूरेनियम (200,000 ppm U) मिलते हैं.

भारत में मौजूदा यूरेनियम भंडार देश की कुल बिजली जरूरतों के मुकाबले पर्याप्त नहीं है. खनन प्रक्रिया जटिल है और जो अयस्क हासिल होते हैं उनमें यूरेनियम की मात्रा बहुत कम होती है. साथ ही अगर 2047 के लक्ष्य की बात करें तो मौजूदा घरेलू भंडार 100 गीगा वॉट तक परमाणु ऊर्जा हासिल करने के लिए जरूरी यूरेनियम का महज 25% ही है.

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भारत को जितनी परमाणु ऊर्जा की फिलहाल जरूरत है उसकी पूर्ति मौजूदा यूरेनियम खनन से नहीं हो पाती है. लिहाजा कजाकिस्तान, कनाडा और अन्य देशों समेत अब ऑस्ट्रेलिया से भी ये यूरेनियम खरीदेगा.

पोखरण परमाणु परीक्षण

बीते दशकों में क्या बदलाव आया?

भारत के लिए यूरेनियम की खरीद उस पर लगे प्रतिबंधों को 2012 में खत्म करने के बाद संभव हो पा रही है. दरअसल भारत ने 1974 और 1998 में जो परमाणु बम परीक्षण किया था उसके बाद कई देशों ने उस पर प्रतिबंध लगा रखे थे. हालांकि अमेरिका के साथ नागरिक परमाणु समझौते होने के बाद भारत को यूरेनियम के आयात की इजाजत मिल गई.  

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बीते वर्ष दिसंबर में भारत ने SHANTI एक्ट पारित किया है जिसे इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. इस कानून के जरिए सरकार ने कानूनी ढांचे को आधुनिक बनाने और निजी तथा विदेशी भागीदारी को बढ़ावा देने की कोशिश की है ताकि स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य तेजी से पूरे किए जा सकें.

भारत जैसे तेजी से आगे बढ़ते देश के लिए जहां बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है और नेट जीरो लक्ष्य भी तय किए गए हैं, वहां न्यूक्लियर ऊर्जा को भरोसेमंद और कम कार्बन वाले विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है.

दुनिया में कितने रिएक्टर हैं और कितनी ऊर्जा पैदा करते हैं?

वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत 2015 तक केवल 385 टन यूरेनियम का उत्पादन करता था, जो 2024 में बढ़कर 500 टन हो गया है. यूरेनियम ऊर्जा की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक कनाडा की कैमेको के मुताबिक दुनिया में 440 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर मौजूद हैं जिनकी कुल क्षमता महज 390 गीगावाट की है. इतनी ऊर्जा पैदा करने के लिए करीब 80 हजार टन यूरेनियम ऑक्साइड कॉन्सेंट्रेट यानी येलो केक की जरूरत होती है, जिसमें करीब 67.5 हजार टन यूरेनियम होता है. 

परमाणु रिएक्टर
Photo Credit: AFP

परमाणु रिएक्टर में यूरेनियम का इस्तेमाल

जमीन से यूरेनियम निकालने के बाद वह कैसे परमाणु बिजलीघर तक पहुंचता है और आखिर में उसका इस्तेमाल किया हुआ ईंधन कहां जाता है. सबसे पहले वैज्ञानिक और कंपनियां यह खोजती हैं कि जमीन के नीचे यूरेनियम कहां और कितनी मात्रा में मौजूद है. इसके लिए सर्वे, सैंपलिंग और भूवैज्ञानिक जांच की जाती है.

जब यूरेनियम का भंडार मिल जाता है, तो उसे खदान से निकाला जाता है. फिर उसे प्रोसेस करके यू3ओ8 (U3O8) बनाया जाता है, जिसे आम भाषा में येलोकेक (Yellowcake) कहा जाता है. यह यूरेनियम का एक सघन रूप होता है, जिससे आगे का काम आसान हो जाता है.

फिर येलोकेक को और साफ किया जाता है और उसे यूओ3 (UO3) में बदला जाता है. इससे अशुद्धियां कम होती हैं और यह अगले चरण के लिए तैयार होता है. इसके बाद यूओ3 को यूएफ6 (UF6) गैस में बदला जाता है. यह एक बहुत महत्वपूर्ण चरण है क्योंकि यूरेनियम को समृद्ध (Enrich) करने के लिए इसे गैस के रूप में होना जरूरी होता है.

Photo Credit: AFP

यह खास कर लाइट वाटर रिएक्टर के लिए होता है. इसमें यूरेनियम के उपयोगी हिस्से यू-235 की मात्रा बढ़ाई जाती है. प्राकृतिक यूरेनियम में यू-235 बहुत कम होता है, इसलिए बिजली उत्पादन के लिए उसे बढ़ाना पड़ता है. एनरिच किए गए यूरेनियम को फिर यूओ2 (UO2) में बदलकर छोटे-छोटे ईंधन पेलेट और फ्यूल रॉड बनाए जाते हैं. यही फ्यूल रॉड बाद में परमाणु रिएक्टर में लगती हैं.

ये फ्यूल रॉड्स कितने ताकतवर होते हैं इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इसके अंदर मौजूद केवल एक अंगूठे के आकार का पेलेट लगभग 1 टन कोयले या 3 बैरल तेल के बराबर ऊष्मा पैदा करता है. यह रासायनिक ईंधन (जैसे कोयला) से लगभग 10 करोड़ गुना अधिक शक्तिशाली होती है.

ये फ्यूल रॉड रिएक्टर में जाकर परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) की प्रक्रिया से गर्मी पैदा करती हैं. यह गर्मी भाप बनाती है, भाप टरबाइन घुमाती है और टरबाइन बिजली पैदा करती है. यह बिजली फिर एनर्जी ग्रिड के जरिए घरों, अस्पतालों और उद्योगों तक पहुंचती है.

जब फ्यूल रॉड अपनी उपयोगी क्षमता खो देती हैं, तो उन्हें निकालकर सुरक्षित भंडारण में रखा जाता है. इसे स्पेंट फ्यूल स्टोरेज कहा जाता है, जहां इसे लंबे समय तक सुरक्षित तरीके से रखा जाता है.

कैंसर रिसर्च

आम आदमी की जिंदगी में यूरेनियम कहां काम आता है?

ज्यादातर लोगों को पता भी नहीं होता कि वे रोज यूरेनियम से मिलने वाले फायदे ले रहे हैं.

  • लाखों घरों तक बिजली.
  • कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाले रेडियोआइसोटोप.
  • मेडिकल रिसर्च.
  • कृषि अनुसंधान.
  • खाद्य सुरक्षा तकनीक.
  • समुद्री जहाज और पनडुब्बियां.
  • अंतरिक्ष मिशनों के लिए परमाणु ऊर्जा तकनीक.

अगर इतना अच्छा है तो लोग इससे डरते क्यों हैं?

क्योंकि इसकी दूसरी कहानी कहीं ज्यादा डरावनी है. अगर यूरेनियम को बहुत अधिक संवर्धित किया जाए तो उससे परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं. 6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम 'लिटिल बॉय' में अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम-235 का इस्तेमाल किया गया था. कुछ ही सेकंड में पूरा शहर तबाह हो गया. करीब डेढ़ लाख लोग मारे गए थे और इसके विकिरण का असर कई पीढ़ियों तक दिखाई देता रहा.

यही वजह है कि दुनिया यूरेनियम को जहां ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत मानती है वहीं इसे सबसे खतरनाक हथियार की नींव भी मानती है.

क्या यूरेनियम को छूने से इंसान मर सकता है?

यह सबसे बड़ा भ्रम है. प्राकृतिक यूरेनियम को छूने भर से कोई व्यक्ति नहीं मर जाता. लेकिन लंबे समय तक बिना सुरक्षा के इसके संपर्क में रहना या इसकी धूल शरीर में जाना नुकसान पहुंचा सकता है. इसीलिए खदानों और परमाणु संयंत्रों में बेहद सख्त सुरक्षा नियम लागू होते हैं.

क्या परमाणु बिजली सुरक्षित है?

आज दुनिया के कई विकसित देश परमाणु ऊर्जा पर भरोसा कर रहे हैं. फ्रांस अपनी बिजली का बड़ा हिस्सा परमाणु ऊर्जा से बनाता है. भारत भी तेजी से अपनी परमाणु क्षमता बढ़ा रहा है. हालांकि परमाणु कचरे का सुरक्षित निपटान और दुर्घटनाओं से बचाव सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.

भारत के लिए यह समझौता क्यों अहम है?

भारत की बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है. साथ ही देश को कार्बन उत्सर्जन भी कम करना है. ऐसे में परमाणु ऊर्जा एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभरी है. ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की नियमित आपूर्ति भारत के नए और मौजूदा परमाणु बिजलीघरों को ईंधन उपलब्ध कराने में मदद करेगी. इससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और स्वच्छ ऊर्जा का हिस्सा बढ़ेगा.

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