"नोटबंदी ने तोड़ी थी नक्सलियों की कमर, 30 करोड़ का हुआ था नुकसान" पूर्व नक्सल कमांडर भूपति ने NDTV पर कबूला

Demonetization Impact on Naxals: 6 करोड़ के इनामी और पूर्व नक्सली पोलित ब्यूरो सदस्य भूपति (सोनू दादा) ने NDTV पर खुलासा किया है कि नोटबंदी ने माओवादी संगठन के 30 करोड़ रुपये बर्बाद कर दिए थे और उनके अपने ही लोग करोड़ों लेकर भाग गए थे. जानिए स्वतंत्रता सेनानी के पोते के बागी बनने और नोटबंदी की उस 'अंदरूनी चोट' की पूरी कहानी.

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  • साल 2016 की नोटबंदी ने नक्सल संगठनों के लिए करीब पच्चीस से तीस करोड़ रुपये के भारी नुकसान का कारण बनी थी
  • पूर्व नक्सली कमांडर भूपति ने नोटबंदी को नक्सल आंदोलन के लिए तबाही से कम नहीं बताया है
  • भूपति के अनुसार नक्सलियों के सहयोगियों ने भी संगठन को करोड़ों रुपये लेकर धोखा दिया था
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Naxal Leader Bhupathi: साल 2016 की नोटबंदी ने केवल शहरों में काला धन रखने वालों को ही नहीं, बल्कि जंगलों में बैठे नक्सली कमांडरों को भी तगड़ा झटका दिया था. नोटबंदी के 10 साल से अधिक वक्त गुजर जाने के बाद अब  पूर्व नक्सली कमांडर और 'पोलित ब्यूरो' के पूर्व सदस्य भूपित ने इसे कबूल किया है. उनके मुताबिक नोटबंदी नक्सल संगठनों के लिए किसी तबाही से कम नहीं थी. NDTV की मुंबई टीम से खास बातचीत में भूपति ने बताया कि उस वक्त उनके संगठन के करीब 25 से 30 करोड़ रुपये मिट्टी में मिल गए थे. इतना ही नहीं भूपति के मुताबिक नक्सल संगठनों से सहानुभूति रखने वालों ने भी उन्हें करोड़ों का चूना लगाया था. हमारे संवाददाता संजय तिवारी से भूपति ने विस्तार से बात की. भूपति से हुए सवाल और उसके जवाब के बारे में हम आगे बताएंगे. पहले ये जान लेते हैं कि भूपित है कौन?  

6 करोड़ का इनामी नक्सली रहा है भूपति

स्वतंत्रता सेनानी के पोते से लेकर माओवादी संगठन की सबसे ताकतवर इकाई 'पोलित ब्यूरो' के सदस्य तक का सफर तय करने वाला भूपति उर्फ वेणुगोपाल उर्फ सोनू दादा कभी नक्सलियों का सबसे बड़ा 'दिमाग' माना जाता था. करीब तीन दशक तक घने जंगलों में खौफ का पर्याय रहे इस 6 करोड़ के इनामी कमांडर का एक दौर में ऐसा रसूख था कि उसके एक इशारे पर पूरे भारत का नक्सली नेटवर्क हिल जाता था. अपनी तेजतर्रार रणनीतियों और संगठन में गहरा पैठ रखने वाले भूपति का कभी भारतीय सेना में जाने का सपना था, लेकिन किस्मत ने उसे विद्रोह की राह पर धकेल दिया.वही 'सोनू दादा' 15 अक्टूबर 2025 को गढ़चिरौली में अपनी AK-47 सौंपकर मुख्यधारा में लौटा आया है.

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 सवाल: नोटबंदी का नक्सली संगठन पर असल में क्या असर पड़ा था?

भूपति: यह हमारे लिए एक बहुत बड़ा सेटबैक (झटका) था. देश की बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए 30 करोड़ शायद कम लगें, लेकिन हमारे संगठन के लिए यह बहुत बड़ी रकम थी. हमारा करीब 25 से 30 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

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सवाल: फिल्म 'धुरंधर' में भी यही दिखाया गया है, क्या वह सच है?

भूपति: हां, 'धुरंधर' फिल्म में नोटबंदी का जो असर दिखाया गया है, वह एकदम हकीकत है. हमने अपनी आंखों से वह बर्बादी देखी है.

सवाल: क्या नोट बदलने में आपको अपनों ने ही धोखा दिया?

भूपति: बिल्कुल. हमने नोट सुरक्षित रखने और बदलने के लिए कई लोगों को करोड़ों रुपये दिए थे, लेकिन वो सब गायब हो गए. हमने किसी को एक करोड़ रुपये दिए, तो वह उसे लेकर भाग गया. किसी और को कुछ दिया, तो वह भी वापस नहीं आया. लोग पैसा डकार गए और हमें दोहरा झटका लगा.

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सवाल: पैसों की किल्लत का संगठन के दैनिक जीवन पर क्या असर हुआ?

भूपति: जंगल में सर्वाइवल के लिए भी पैसा चाहिए. अगर आपको इनर वियर भी खरीदना है, तो बिना पैसे के नहीं मिलता. जब हमारे पुराने नोट रद्दी हो गए, तो बहुत बुरा वक्त आया.

सवाल: फिर उस संकट के समय संगठन कैसे चला?

भूपति: हम जनता के पास गए. हमने उनसे साफ़ कहा कि हमारे पास अब नोट नहीं बचे हैं, सब नोटबंदी में खत्म हो गया है. फिर जनता से मिली मदद और राशन के सहारे ही काम आगे बढ़ा.

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