EU-India FTA: क्यों भारत-यूरोप का यह समझौता बन सकता है सबसे बड़ा गेमचेंजर

भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौता सिर्फ एक ट्रेड डील नहीं बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और रणनीतिक साझेदारियों में से एक बताया जा रहा है. मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा यह समझौता कैसे बन सकता है सबसे बड़ा आर्थिक और कूटनीतिक गेमचेंजर?

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  • इस समझौते से भारत में यूरोप की हाई टेक मशीनरी, ऑटोमोबाइल, केमिकल और ग्रीन टेक्नोलॉजी आने का रास्ता बनेगा.
  • भारत के श्रम प्रधान उत्पादों की मांग भी बढ़ेगी. सही समय पर डिलीवरी और लास्ट माइल लॉजिस्टिक्स आसान होगा.
  • इससे डिमांड बढ़ेगा, व्यापार के व्यावधान कम होंगे, नए खरीदार नेटवर्क बनेंगे और इससे रोजगार में भी वृद्धि होगी.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेयेन ने नई दिल्ली में आज भारत-यूरोप मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किया है. समझौते पर दोनों पक्षों के दस्तखत के बाद कुछ प्रक्रियाएं और होंगी उसके बाद अगले साल से यह लागू हो जाएगा. इसे 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाले समझौते, एक गेमचेंजर के रूप में देखा जा रहा है. 

यह समझौता इसलिए खास है क्योंकि यह दुनिया की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाओं (यूरोप और भारत) को जोड़ता है. एक तरफ यूरोप का सबसे संगठित और तकनीकी रूप से उन्नत बाजार है तो दूसरी ओर भारत जैसा युवा, तेजी से बढ़ता और दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है. तो चलिए बताते हैं कि आखिर यह डील भारत और यूरोप दोनों के लिए कैसे गेमचेंजर बन सकता है. करीब 20 सालों से बात चल रही थी पर अब जाकर यह समझौता क्यों हुआ? इस डील का फायदा सबसे अधिक किस सेक्टर को मिलेगा और कैसे यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डालेगा.

EU-भारत FTA डील अभी क्यों?

भारत और EU के बीच FTA पर बातचीत पहली बार 2007 में शुरू हुई थी, लेकिन कृषि और डेयरी सेक्टर खोलने पर बात नहीं बन रही थी. दवाओं के पेटेंट नियमों पर भी असहमति थीं. इसके अलावा पर्यावरण और लेबर सेक्टर के मानकों, डेटा प्राइवेसी और डिजिटल नियमों पर भी सहमति नहीं थी. लिहाजा 2013 में दोनों समहों के बीच यह बातचीत थम गई थी. इधर भारत में सत्ता परिवर्तन हुआ और उधर दुनिया में अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार शुरू हुआ. भारत ही नहीं यूरोपीय देशों में भी चीन पर निर्भरता बढ़ी जो कि समय के साथ अर्थव्यवस्थाओं के मुनासिब नहीं रहा. जब 24 फरवरी 2022 को रूस और युक्रेन के बीच संघर्ष शुरू हुआ और उसने युद्ध का शक्ल अख्तियार किया तब सप्लाई चेन की कमजोरियां सामने आने लगीं. पहले से अमेरिका-चीन के बीच तनाव चल ही रहा था. इसने अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गंभीर असर डाला. 

इस सब के बीच यूरोप को एक भरोसेमंद, लोकतांत्रिक और स्थिर साझेदार चाहिए था और भारत को एक बड़े, स्थायी और प्रीमियम बाजार की तलाश थी. यूरोपियन यूनियन अपने सप्लाई चेन के मजबूत बनाने के लिए इंडो-पैसिफिक में चीन पर निर्भरता कम करना चाह रहा था तो साथ ही वो भारत के करीब 1.4 अरब लोगों के तेजी से बढ़ते बाजार तक भी अपनी आसान पहुंच बनाना चाहता था. इसमें यूरोपीय संघ और भारत दोनों में रोजगार की संभावनाएं थीं. 

अब जबकि यह समझौता हो गया है तो भारत में यूरोप की हाई टेक मशीनरी, ऑटोमोबाइल, केमिकल और ग्रीन टेक्नोलॉजी आने का रास्ता बनेगा. वहीं भारत के श्रम प्रधान उत्पादों (कपड़ा, फार्मा आदि) की मांग भी बढ़ेगी. सही समय पर डिलीवरी और लास्ट माइल लॉजिस्टिक्स को आसान बनाया जा सकता है. इस समझौते से यूरोपीय संघ और भारत के बीच डिमांड बढ़ेगा, व्यापार में आने वाले व्यावधान कम होंगे, और यूरोप में नए खरीदार नेटवर्क बनेंगे और इससे रोजगार में भी वृद्धि होगी. 

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Photo Credit: AFP

मदर ऑफ ऑल डील्स क्यों कहा जा रहा है?

यूरोपीय संघ और भारत मिलकर दुनिया की लगभग 20% जीडीपी, 17% वैश्विक व्यापार और 25% से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं.
इतने बड़े पैमाने पर दो लोकतांत्रिक शक्तियों का आर्थिक गठबंधन पहले कभी नहीं हुआ. इसलिए इसे सिर्फ ट्रेड डील नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक ढांचा बदलने वाला समझौता कहा जा रहा है. यह सिर्फ टैरिफ में कटौती का डील नहीं है बल्कि श्रमिकों के अधिकारों, पर्यावरण मानकों, डिजिटल डेटा सुरक्षा और सप्लाई चेन में पारदर्शिता वाला समझौता है. इसे आधार बनाकर भविष्य के वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियम तय हो सकते हैं.

कूटनीतिक असर

इस वैश्विक सप्लाई-चेन शिफ्ट और भारत के उभार का सबसे बड़ा असर राजनीतिक और कूटनीतिक ताकत पर पड़ेगा. भारत अब सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार बन रहा है जिससे अमेरिका, यूरोप, जापान और इंडो-पैसिफिक देशों के साथ उसकी बातचीत की हैसियत बढ़ेगी. चीन पर निर्भरता घटने से भारत को वैश्विक फैसलों, व्यापार नियमों और सुरक्षा ढांचे में ज्यादा प्रभाव मिलेगा और वह विकासशील देशों की आवाज बनकर नई विश्व व्यवस्था को आकार देने की स्थिति में आ जाएगा.

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चीन पर निर्भर ग्लोबल सप्लाई चेन को तोड़ेगी

कोरोना और युद्ध ने दिखाया कि अगर दुनिया एक ही देश पर बहुत ज्यादा निर्भर हो जाए, तो पूरी व्यवस्था चरमरा सकती है. इसीलिए यूरोप अब 'चीन प्लस वन' की नीति पर काम कर रहा है. यानी चीन के अलावा एक और बड़ा, भरोसेमंद उत्पादन केंद्र चाहिए. अपने मजबूत आईटी और फार्मा सेक्टर के साथ ही यहां मौजूद दुनिया की सबसे युवा और सबसे बड़ी आबादी, श्रमबल और यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने इसे यूरोप के लिए सबसे विश्वसनीय विकल्प बना दिया. 

वैश्विक संतुलन की धुरी बनता भारत

दुनिया पहले से दो देशों अमेरिका और चीन पर बहुत अधिक निर्भर है. अब तेजी से उभरती और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बनने की ओर तेजी से अग्रसर भारत को पूरी दुनिया अमेरिका, चीन से इतर तीसरे विकल्प के रूप में देख रही है. यूरोपीय यूनियक के साथ एफटीए डील भारत को इसी तीसरे ध्रुव के रूप में मजबूती देगा और इंडो-पैसिफिक में चीन पर निर्भरता को कम करेगा. बता दें कि इंडो पैसिफिक में भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान मिलकर क्वाड के जरिए चीन के प्रभाव को संतुलित करने में जुटे हैं. 

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भारत के लिए यह डील क्यों गेम-चेंजर है?

अब सीधे बात करते हैं भारत के फायदे की जो कि केवल सरकार या कंपनियों तक सीमित नहीं है बल्कि इसका सीधा लाभ आमजनों तक पहुंचेगा. 
सबसे पहले तो यह यूरोप के प्रीमियम बाजारों तक भारतीय उत्पादों की पहुंच को आसान बनाएगा जो दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक ब्लॉक भी है. अब तक वहां भारतीय उत्पादों पर बहुत अधिक टैक्स लगा करता था. इसकी वजह से वहां भारतीय कपड़े, इंजीनियरिंग के सामन, ऑटो पार्ट्स्, दवाएं, चमड़े, कृषि उत्पाद आदि प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते थे. इस समझौते के बाद अब इन पर टैक्स या तो खत्म हो जाएगा या बहुत कम हो जाएगा. उद्योग जगत के अनुमान के मुताबिक इससे भारत का यूरोपीय संघ को निर्यात 40% से 60% तक बढ़ सकता है. इसका मतलब है कि फैक्ट्रियों में ज्यादा ऑर्डर आएंगे तो उत्पादन बढ़ेगा ही और इससे रोजगार पैदा होंगे.

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Photo Credit: PTI

विदेशी निवेश और रोजगार में जबरदस्त उछाल

यूरोपीय संघ पहले से ही भारत का एक बड़ा निवेशक है, लेकिन फ्री ट्रेड एग्रिमेंट के बाद यूरोपीय कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना और आसान हो जाएगा. खास कर ग्रीन एनर्जी, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल्स, हेल्थकेयर और फाइनेंस के क्षेत्र में  निवेश बढ़ने की संभावना है. इससे देश में मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अवसर बढ़ेंगे साथ ही अरबों डॉलर का निवेश आ सकता है. 

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इससे भारत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा. यूरोपीय कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाकर यहीं उत्पादन करेंगी. उत्पादन होगा तो सप्लाई भी होगी. इससे भारत वैश्विक सप्लाई चेन का अहम हिस्सा बना जाएगा. सर्विस सेक्टर और प्रोफेशनल्स को इससे बड़ा फायदा होगा. सर्विस सेक्टर भारत की असली ताकत है. आईटी, फाइनैंस, कंसल्टिंग, हेल्थ और एजुकेशन के क्षेत्र इस डील से लाभान्वित होंगे.  संभावना ये भी है कि यूरोपीय संघ के साथ हुए इस समझौते के तहत भारतीय प्रोफशनल्स को यूरोपीय संघ में काम करने में आसानी होगी. वीजा नियमों में भी ढील दी जा सकेगी और डिजिटल सेवाओं को मान्यता मिलेगी. तो यह डील सर्विस सेक्टर के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है.

भारत को वैश्विक व्यापार में ज्यादा ताकतवर बनाएगी

यूरोपीय संघ जैसे बड़े ब्लॉक के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और भी मजूबत होगी. इसका सकारात्मक असर आने वाले समय में अन्य देशों के साथ होने वाले व्यापार समझौतों पर पड़ेगा. भारत बेहतर शर्तों के साथ ये समझौते कर पाने की स्थिति में होगा. यानी अब भारत बड़े देशों के साथ अपनी शर्तों पर भी ट्रेड करने की स्थिति में होगा. 

यूरोप को क्या लाभ होगा?

जहां यूरोप को भारतीय बाजारों तक पहुंच मिलेगी वहीं इसकी कारें, मशीनरी, मेडिकल डिवाइस, दवाएं, लग्जरी आइटम्स आदि को भी भारतीय बाजारों में कम टैक्स के साथ बेचने का बढ़िया मौका मिलेगा. यूरोपीय संघ लंबे समय से कहता आया है कि उसे रणनीतिक स्वायत्ता चाहिए. यानी उसे किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर नहीं रहना है. भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के साथ यूरोपीय यूनियन की सप्लाई चेन मजबूत होगी. चीन पर निर्भरता कम होगी. इंडो पैसेफिक में यूरोप की स्ट्रैटेजिक मौजूदगी बढ़ेगी.

यूरोपीय यूनियन दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन ट्रांजिशन प्रोजेक्ट चला रहा है. इसका लक्ष्य 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 55% की कटौती करना और 2050 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करना है. भारत भी सोलर एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रॉनिक व्हिकल, क्लीन टेक में बड़ा निवेश कर रहा है. इस डील से दोनों को ग्रीन सप्लाई चेन बनने में मदद मिलेगी. एफटीए से नियम पारदर्शी होंगे तो यूरोपीय कंपनियों को भारत में फैक्ट्रियां लगाने, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने, रिसर्च और इनोवेशन सेंटर खोलने में भरोसा मिलेगा.

किस सेक्टर में कैसे बदलेगा खेल?

टेक्सटाइल और एपैरल- यूरोपीय संघ के देशों में भारतीय कपड़ों पर भारी टैक्स लगता है. एफटीए के बाद अब ये टैक्स या तो हटा दिए जाएंगे या बहुत कम रह जाएंगे. वस्त्र उद्योग के अनुमान के मुताबिक इससे निर्यात में तत्काल 20 फीसद तक तो भविष्य में 30 फीसद तक इजाफा हो सकता है. मांग के साथ उत्पादन बढ़ेगा तो बड़ी संख्या में रोजगार भी बढ़ेंगे. इस सेक्टर में बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों से मुकाबले में भारत को बढ़त हासिल होगी.

ऑटोमोबाइल और मैन्युफैक्चरिंग- भारत में यूरोपीय कारों पर एफटीए के बाद 10 फीसद तक ही लगेगा जो फिलहाल 110% तक है. इससे भारत में लोग सस्ती कारें खरीद सकेंगे. भारत में मैन्युफैक्चरिंग भी बढ़ाएंगी. ऑटो सेक्टर में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा.

फार्मा और हेल्थकेयर- भारत दुनिया की फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड है. यहां की जेनरिक दवाएं अब यूरोपीय बाजारों तक आसानी से पहुंच सकेंगी. हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी में साझेदारी बढ़ेगी. पेमेंट के नियम क्या होंगे इस पर अभी डिटेल आना बाकी है लेकिन बैलेंस बनने की उम्मीद है.

आईटी और डिजिटल सेवाएं- ईयू को डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के लिए बड़ी संख्या में स्किल्ड प्रोफेशनल्स चाहिए, और भारत के पास यह ताकत प्रचुर मात्रा में मौजूद है. एफटीए से आईटी सेवाओं का विस्तार बढ़ेगा. स्टार्टअप में सहयोग और डेटा एवं डिजिटल नियमों में तालमेल बनेगा.

ग्रीन टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर- ईयू और भारत दोनों ग्रीन हाइड्रोजन, सोलर, सेमीकंडक्टर जैसे सेक्टर में सप्लाई चेन बनाना चाहते हैं. एफटीए से इसे व्यवस्थित तरीके से किया जा सकेगा.

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