- चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती और गृह सचिव को हटाकर नए अधिकारियों की नियुक्ति की है
- बंगाली अस्मिता और मतुआ समुदाय के मुद्दे आगामी चुनाव में सियासी प्रचार के मुख्य केंद्र बने हुए हैं
- मतदाता सूची में भारी कटौती से चुनावी परिदृश्य प्रभावित हुआ है, जिससे राजनीतिक दलों को रणनीति बदलनी पड़ी है
चुनाव आयोग निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है. इसी के मद्देनजर विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद कुछ ही घंटों बाद निर्वाचन आयोग ने एक बड़ा कदम उठाते हुए पश्चिम बंगाल के दो शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों- मुख्य सचिव और गृह सचिव को देर रात उनके पद से हटा दिया. चुनाव आयोग ने मुख्य सचिव पद से नंदिनी चक्रवर्ती को हटाकर उनकी जगह दुष्यंत नरियाला को पश्चिम बंगाल का नया मुख्य सचिव नियुक्त किया है. वहीं, संघमित्रा घोष को राज्य के गृह व पर्वतीय मामले विभाग का नया प्रधान सचिव बनाया गया है. चुनाव आयोग के आदेशानुसार, ये दोनों नियुक्तियां तुरंत प्रभाव से लागू होंगी.
पश्चिम बंगाल चुनावों में आक्रामक रवैया और नवीनता हमेशा से चुनाव प्रचार की पहचान रही है. आगामी चुनाव में भी कुछ प्रमुख मुद्दे सियासी प्रचार के केंद्र में होने की संभावना है.
बंगाली अस्मिता : बंगाल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने का मुद्दा सियासी खींचतान के केंद्र में आने से पहले, राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने मुख्य विपक्षी भाजपा शासित राज्यों में बांग्ला भाषी प्रवासियों पर कथित समन्वित हमलों के खिलाफ सड़कों पर, साथ ही अदालतों और संसद में आक्रामक रूप से अभियान चलाया.
भाजपा के खिलाफ आजमाया हुआ ‘बोहिरागोटो' (बाहरी) का मुद्दा तृणमूल के लिए पिछले कुछ चुनावों में कारगर साबित हुआ है. प्रवासी उत्पीड़न के संदर्भ में बंगाली उप-राष्ट्रवाद का मुद्दा, भगवा ब्रिगेड को बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य से अलग-थलग करने और बंगाली ‘अस्मिता' के अग्रदूत होने के दावों के साथ अपनी एक अलग पहचान बनाने के तृणमूल के पिछले प्रयासों का ही विस्तार है. पिछले साल जुलाई में, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में एक रैली का नेतृत्व किया, जिसमें उन्होंने भाजपा पर ‘बंगाली पहचान पर हमले' का आरोप लगाया. बांग्लादेशी होने के संदेह में बंगाल के प्रवासियों को कथित तौर पर प्रताड़ित करने, हिरासत में लेने और देश से निकालने की घटनाओं के बाद से वह भाजपा पर लगातार हमला बोलती रही हैं.
मतुआ मुद्दा : बंगाल की लगभग 50 विधानसभा सीट पर निर्णायक भूमिका निभाने वाला मतुआ समुदाय एक अहम चुनावी गुट के रूप में उभरा है. यह समुदाय अनुसूचित जाति में सूचीबद्ध है. 2021 के विधानसभा चुनाव में, इनमें से अधिकतर सीट भाजपा को मिलीं, जिससे पार्टी को 77 सीट हासिल करने में मदद मिली, और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यह समर्थन आधार काफी हद तक बरकरार रहा.
एसआईआर के दौरान बड़े पैमाने पर नामों को कथित तौर पर हटाए जाने से मतुआ बहुल क्षेत्रों में आशंका घर कर गई. दशकों से वर्तमान बांग्लादेश से पलायन कर आए समुदाय के सदस्यों के बीच पहचान, दस्तावेज़ीकरण और चुनावी समावेशन को लेकर चिंताएं पैदा हो गईं.
शहरी चिंता/ सत्ता विरोधी लहर : कोलकाता की समाजशास्त्र शोधकर्ता रिमझिम सिन्हा ने 2024 में जब आरजी कर अस्पताल में प्रशिक्षु चिकित्सक से दुष्कर्म और हत्या के बाद सोशल मीडिया पर ‘रिक्लेम द नाइट' आंदोलन का आह्वान किया, तो उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनका संदेश जंगल की आग की तरह फैल जाएगा, जिससे शहरी महिलाओं, युवाओं और यहां तक कि वरिष्ठ नागरिकों के बीच राज्य की सत्ता के खिलाफ पनप रहा असंतोष और भड़क उठेगा.
इसके बाद, बंगाल के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए जो महीनों तक चले. इस आंदोलन में पीड़ित परिवार के लिए न्याय, कार्यस्थल पर सुरक्षा सुधार और महिलाओं के रात में सार्वजनिक स्थानों पर जाने के अधिकार की मांग की गई. मुख्य रूप से बंगाल के सरकारी संस्थानों पर तृणमूल कांग्रेस के स्थापित नियंत्रण के खिलाफ निर्देशित यह आक्रोश अभूतपूर्व था.
प्रदर्शनकारियों ने हालांकि राज्य के मुख्य राजनीतिक विपक्ष को प्रदर्शन के दायरे से बाहर रखा था, लेकिन तृणमूल को सामाजिक प्रतिरोध को राजनीतिक रूप लेने से रोकने में चुनौतीपूर्ण समय का सामना करना पड़ा.
उद्योग और रोजगार : विपक्षी भाजपा ने ‘उद्योगों के पलायन' का आरोप लगाते हुए राज्य को ‘उद्योगों का कब्रिस्तान' करार दिया. पार्टी नेताओं का दावा है कि पिछले 14 वर्षों में 6,000 से अधिक कंपनियां बंगाल से बाहर चली गई हैं और उनकी दलील है कि राज्य व्यापार शिखर सम्मेलन से प्राप्त निवेश प्रस्तावों में से केवल लगभग तीन प्रतिशत ही जमीन पर उतर पाए हैं, जिससे राज्य ‘‘मजदूर निर्यात अर्थव्यवस्था'' बन गया है.
हुगली, हावड़ा और उत्तर 24 परगना जैसे जूट उत्पादक जिलों में कच्चे माल की कमी के कारण मिलों के बंद होने और उत्पादन में कटौती होने से उत्पन्न संकट एक प्रमुख कारक बन गया.
सामाजिक कल्याण योजनाएं : तृणमूल सरकार की कई सामाजिक कल्याण योजनाएं चुनावों में अहम भूमिका निभा सकती हैं. बेरोजगार युवाओं, महिलाओं, किसानों, छात्रों, श्रमिकों और हाशिए पर पड़े समुदायों को लक्षित करने वाली इन पहलों ने पिछले चुनावों में सत्तारूढ़ दल को फायदा हुआ और आगामी चुनावों के नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं. इनमें से कई योजनाओं में प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और जमीनी स्तर पर लाभ पहुंचाना शामिल है.
एसआईआर/नागरिकता संबंधी चिंता: एसआईआर के बाद मतदाता सूची के प्रकाशन ने हाल के वर्षों में राज्य में सबसे महत्वपूर्ण चुनावी घटनाक्रमों में से एक को जन्म दिया है, क्योंकि विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची से लगभग 63.66 लाख नाम हटा दिए गए हैं.
मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर मात्र 7.04 करोड़ से कुछ अधिक रह गई है. इस प्रक्रिया ने राज्य के चुनावी परिदृश्य को नाटकीय रूप से बदल दिया है और चुनाव प्रचार शुरू होने के ठीक पहले राजनीतिक अनिश्चितता का एक नया पहलू सामने लाया है.
हटाए गए नामों के अलावा, लगभग 60.06 लाख अतिरिक्त नाम विचाराधीन हैं, जो यह दर्शाता है कि राजनीतिक दलों के चुनाव की तैयारी में जुट जाने के बावजूद मतदाता सूची में अब भी बदलाव हो रहे हैं. इस उथल-पुथल ने राजनीतिक दलों को बूथ स्तर पर अपने समीकरणों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए मजबूर किया है, विशेष रूप से उन जिलों में जहां बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की सूचना मिली है.
नाम हटाए जाने की संख्या कई सीमावर्ती जिलों और शहरी क्षेत्रों में अधिक है जिन्हें चुनावी रूप से संवेदनशील और राजनीतिक रूप से प्रतिस्पर्धी माना जाता है.
घुसपैठ: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 17 जनवरी को मुस्लिम बहुल सीमावर्ती जिले मालदा में एक रैली के दौरान तृणमूल सरकार पर घुसपैठ के मुद्दे को लेकर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर अवैध घुसपैठ से जनसांख्यिकी बदल गई है और दंगों को बढ़ावा मिला है. प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि तृणमूल के ‘‘संरक्षण और सिंडिकेट राज'' के कारण यह फल-फूल रहा है. इसी के साथ उन्होंने स्पष्ट संदेश दे दिया कि भाजपा अपने चुनाव अभियान में ‘घुसपैठियों' के मुद्दे को प्रमुखता से रखेगी.
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भ्रष्टाचार: विपक्षी दलों द्वारा टीएमसी सरकार पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य पर हावी हैं, जिनमें स्कूल भर्ती घोटाला प्रमुख मुद्दा बन गया है.
अप्रैल 2025 में उच्चतम न्यायालय ने भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं के कारण राज्य स्कूल सेवा आयोग द्वारा भर्ती किए गए 25,000 से अधिक शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्तियों को रद्द कर दिया था.
धर्म और ध्रुवीकरण: जैसे-जैसे चुनाव प्रचार गति पकड़ रहा है, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मुकाबले में सांप्रदायिक बयानबाजी और पहचान पर आधारित लामबंदी तेज होगी, और धर्म चुनावी परिदृश्य में एक प्रमुख अंतर्धारा के रूप में उभरेगा.
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बंगाल, जहां ऐतिहासिक रूप से चुनावी चर्चा खुले तौर पर सांप्रदायिक राजनीति से अपेक्षाकृत अछूती रही है, धीरे-धीरे तृणमूल और भाजपा के बीच तीखे वैचारिक टकराव की ओर बढ़ रहा है.














