अवमानना मामला: न्यायाधीशों के खिलाफ ‘अपमानजनक’ टिप्पणी के लिए वकील ने उच्च न्यायालय से माफी मांगी

वकील की बिना शर्त माफी के अनुरोध की याचिका पर शीर्ष अदालत ने 12 जनवरी को सुनवाई की. इस दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि उसने उच्च न्यायालय और जिला अदालतों के जिन न्यायाधीशों पर आरोप लगाए थे और अगर वह उनके समक्ष व्यक्तिगत रूप से हलफनामे पर बिना शर्त माफी दाखिल करता है तो उसके अनुरोध पर विचार किया जा सकता है.

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नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय और राष्ट्रीय राजधानी की जिला अदालतों के कई न्यायाधीशों के खिलाफ ‘अपमानजनक, अनुचित और बेबुनियाद आरोप' लगाने वाले जिस वकील को आपराधिक अवमानना ​​के आरोप में छह महीने की कैद की सजा सुनाई गई थी, उसने उच्च न्यायालय से बिना शर्त माफी मांगी है. वकील को नौ जनवरी को मामले में दोषी ठहराया गया था जिसके बाद से वह हिरासत में है. उसने उच्च न्यायालय से कहा कि उसका न्यायाधीशों को बदनाम करने का इरादा नहीं था और वह भविष्य में सावधानी बरतेगा.

वकील ने अवमानना मामले में अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देते हुए एक अपील दायर की थी, जिसकी सुनवाई के दौरान उसने न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति शलिन्दर कौर की पीठ के समक्ष एक हलफनामा दायर कर उच्चतम न्यायालय के निर्देश के अनुरूप बिना शर्त माफी मांगी.

हलफनामे में कहा गया है, ‘‘उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित निर्देश के अनुसार अवमाननाकर्ता ने बिना शर्त माफी मांगते हुए एक हलफनामा सौंपा है, जिसमें उसने कहा है कि उसका इरादा किसी न्यायाधीश को बदनाम करने का नहीं था और अब से वह अतिरिक्त सावधानी बरतेगा या उससे जो गलती हुई है उसे लेकर अतिरिक्त सतर्क रहेगा.''

उच्च न्यायालय ने मंगलवार को पारित एक आदेश में कहा, ‘‘गलती अनजाने में हुई और न्याय के लिए माफी आवश्यक है. इसलिए इस अदालत को अवमाननाकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों पर दया दिखानी चाहिए. इसके अलावा हलफनामे में उसने इस अदालत के समक्ष वचन दिया है कि वह भविष्य में ऐसी कोई गलती/त्रुटि नहीं करेगा. इसलिए हलफनामा रिकॉर्ड पर लिया जाता है.''

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उच्च न्यायालय ने कहा कि आदेश की एक प्रति अवमाननाकर्ता को प्रदान की जाए. इसने अपनी रजिस्ट्री को बिना किसी देरी के एक प्रति उच्चतम न्यायालय को भेजने का भी निर्देश दिया. वकील को छह महीने जेल की सजा सुनाने के अलावा उच्च न्यायालय ने उस पर 2,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था और निर्देश दिया था कि उसे हिरासत में लिया जाए तथा तिहाड़ जेल के अधीक्षक को सौंप दिया जाए.

वकील की बिना शर्त माफी के अनुरोध की याचिका पर शीर्ष अदालत ने 12 जनवरी को सुनवाई की. इस दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि उसने उच्च न्यायालय और जिला अदालतों के जिन न्यायाधीशों पर आरोप लगाए थे और अगर वह उनके समक्ष व्यक्तिगत रूप से हलफनामे पर बिना शर्त माफी दाखिल करता है तो उसके अनुरोध पर विचार किया जा सकता है.

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मामला 19 जनवरी को शीर्ष अदालत के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है. वकील ने जुलाई 2022 में उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश के समक्ष एक याचिका दायर की थी, जिसमें कई न्यायाधीशों पर ‘मनमाने ढंग से या पक्षपातपूर्ण तरीके से' कार्य करने का आरोप लगाया गया था. उसने अपनी याचिका में न्यायाधीशों का नाम भी लिया था.

उसके बाद एकल पीठ ने उसे अवमानना का नोटिस जारी किया था और निर्देश दिया था कि मामले को खंडपीठ के समक्ष भेजा जाए. अपने फैसले में उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कहा था कि चूंकि अपमानजनक आरोप लगाने वाला वकील अदालत का एक अधिकारी है, इसलिए ऐसे कृत्यों की ‘दृढ़ता से' पड़ताल किया जाना आवश्यक है.

उच्च न्यायालय द्वारा माफी मांगने का अवसर दिए जाने के बावजूद उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया था और उच्च न्यायालय एवं जिला अदालतों के न्यायाधीशों के खिलाफ अपनी टिप्पणियों पर अड़ा रहा था.
 

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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