मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद राज्य की सियासत गरमाई हुई है. चुनावी हलफनामे में एक तकनीकी जानकारी छिपाने को आधार बनाकर भले ही उनका पर्चा खारिज हो गया हो, लेकिन इस झटके के बाद मीनाक्षी नटराजन का अंदाज और उनका राजनीतिक स्टाइल एक बार फिर चर्चा में है. राहुल गांधी की कोर टीम का हिस्सा रहीं नटराजन को जहां उनके समर्थक उसूलों पर चलने वाली नेता बताते हैं, वहीं कांग्रेस का ही एक खेमा उनके इस रवैये को राजनीति के लिहाज से 'अव्यावहारिक' मानता है. नामांकन रद्द होने के बाद हवाई सफर छोड़ रात की ट्रेन से दिल्ली रवाना होने वाली मीनाक्षी नटराजन के इस सियासी सफर, संगठन में उनके प्रभाव और इस पूरे विवाद की कहानी कई मायनों में दिलचस्प है.
सोनिया गांधी की नजरों में कैसे आईं मीनाक्षी नटराजन
मीनाक्षी नटराजन के मुख्यधारा की राजनीति में आने का किस्सा साल 1998 से जुड़ा है. 20 अगस्त 1998 को राजीव गांधी की जयंती के मौके पर कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई द्वारा दिल्ली में गर्ल्स स्टूडेंट कन्वेंशन का आयोजन किया गया था. कार्यक्रम की मुख्य अतिथि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी थीं. उस समय की एनएसयूआई अध्यक्ष अलका लांबा स्वास्थ्य कारणों से कार्यक्रम स्थल पर कुछ देरी से पहुंचीं, तब तक सोनिया गांधी वहां आ चुकी थीं. अलका लांबा की गैर मौजूदगी में एक एनएसयूआई सचिव ने सोनिया गांधी का स्वागत किया और उन्हें मंच तक ले गईं.
सादगी और भाषण कला से बनाई पहचान
मूल रूप से तमिल मीनाक्षी नटराजन का परिवार करीब सौ साल पहले मध्य प्रदेश के रतलाम में बस गया था. उनके पिता केमिकल फैक्ट्री में कर्मचारी थे और मां शिक्षिका थीं. इंदौर विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने छात्र राजनीति में भाग लिया और एनएसयूआई से जुड़ीं. सादगी से भरी मीनाक्षी को भाषण देने की कला बखूबी आती थी और इसी वजह से वह बहुत जल्दी कांग्रेस नेतृत्व की नज़रों में आ गईं. तीन साल एनएसयूआई का राष्ट्रीय अध्यक्ष रहने के बाद मीनाक्षी नटराजन को 2002 से 2005 तक मध्य प्रदेश यूथ कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. इसके बाद 2008 में वह कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव बनीं और उन्हें एनएसयूआई का सह प्रभारी बनाया गया. ठीक उसी समय कांग्रेस महासचिव बने राहुल गांधी एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के प्रभारी बने थे, जिनके नीचे मीनाक्षी नटराजन ने पहले एनएसयूआई और फिर यूथ कांग्रेस के सह प्रभारी की भूमिका निभाई.
जब बचे हुए चुनावी खर्च की रकम पार्टी को लौटा दी
साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्हें मध्य प्रदेश की मंदसौर सीट से कांग्रेस उम्मीदवार बनाया गया. इस सीट पर लगातार बीस सालों से बीजेपी के सांसद रहे लक्ष्मी नारायण पांडे को पराजित कर मीनाक्षी नटराजन लोकसभा पहुंचीं.
वोरा ने यह बात कांग्रेस नेतृत्व तक पहुंचाई और इसके बाद नटराजन की गांधीवादी छवि और मजबूत होती चली गई. जिसके बाद वह राहुल गांधी की टीम का अहम चेहरा मानी जाने लगीं. हालांकि, मीनाक्षी मंदसौर से 2014 और 2019 का चुनाव नहीं जीत पायीं और 2024 में उन्होंने चुनाव ही नहीं लड़ा.
तेलंगाना की प्रभारी और सरकार के लिए असहज स्थितियां
साल 2013 में उन्हें कांग्रेस के राजीव गांधी पंचायती राज संगठन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई और वह लंबे समय तक पर्दे के पीछे काम करती रहीं. उनकी मुख्यधारा में वापसी 2022 में हुई जब उन्हें कांग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) का सदस्य बनाया गया और फिर पिछले साल फरवरी में उन्हें पार्टी ने तेलंगाना का प्रभारी नियुक्त किया. प्रभारी बनने के बाद भी मीनाक्षी नटराजन लो प्रोफाइल बनी रहीं. सार्वजनिक रूप से वह ना के बराबर बोलती हैं, लेकिन कई मुद्दों पर उनके अडिग और सख्त रूख से तेलंगाना की कांग्रेस सरकार को भी असहज होना पड़ा है. पार्टी ने इस बार के राज्यसभा चुनाव में उन्हें मध्यप्रदेश से उम्मीदवार बनाया था, लेकिन नामांकन पत्र में एक तकनीकी ख़ामी के आधार पर उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई, जिस पर कांग्रेस ने बीजेपी पर “सीट चोरी” का आरोप लगाया है.
तेलंगाना से जुड़े उस अदालती मामले को जानिए
जिस मामले में मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द हुआ, उसकी पूरी कहानी उनके एक करीबी सहयोगी ने साझा की है. दरअसल, 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में मीनाक्षी नटराजन को पर्यवेक्षक बनाया गया था. तब नारायणपेट विधानसभा सीट से कांग्रेस की टिकट के प्रबल दावेदार एक नेता के ख़िलाफ़ एक महिला ने उन तक शिकायत पहुंचाई थी. मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए मीनाक्षी ने पार्टी से उस नेता का टिकट काटने का अनुरोध किया था. बाद में टिकट उसी नेता के परिवार से एक महिला को मिला, जिन्होंने चुनाव में जीत दर्ज की. इसके बाद जब मीनाक्षी को राज्य का प्रभारी बनाया गया, तो शिकायतकर्ता महिला अपने पुराने मामले में मीनाक्षी नटराजन पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाने लगी. वह कभी मांग करती कि उस नेता को पार्टी से निकाले जाने का सबूत दिया जाए, तो कभी सवाल उठाती कि महिला विधायक को पार्टी महासचिव क्यों बनाया गया.
क्या यह मीनाक्षी नटराजन की बड़ी लापरवाही थी?
सूत्रों के मुताबिक, मीनाक्षी नटराजन ने शिकायतकर्ता महिला को कानूनी सहायता लेने और पार्टी की अनुशासन समिति में शिकायत दर्ज कराने का सुझाव दिया था, लेकिन महिला सीधे अदालत चली गई. इसी मामले से जुड़ा एक नोटिस मीनाक्षी नटराजन को भेजा गया था, जिसका जवाब उन्होंने दे दिया था लेकिन इस कानूनी मामले का जिक्र अपने हलफनामे में करना जरूरी नहीं समझा.
इस पर जब यह सवाल उठा कि क्या मीनाक्षी नटराजन से लापरवाही हुई है, तो उनके करीबियों का कहना है कि वह तीन बार ख़ुद चुनाव लड़ चुकी हैं और कई लोगों को लड़वा चुकी हैं, ऐसे में उन्हें हलफ़नामे की अहमियत अच्छी तरह पता है.
राज्यसभा नहीं, जनसभा में रहना है पसंद
नामांकन रद्द होने को लेकर जब सहयोगी से पूछा गया कि क्या यह मीनाक्षी नटराजन के लिए बड़ा झटका है, तो उन्होंने बताया कि वह हमेशा कहती रही हैं कि 'मुझे राज्यसभा नहीं जनसभा में रहना पसंद है.' सहयोगी ने यह भी खुलासा किया कि मंगलवार सुबह मीनाक्षी ने उस महिला के स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई, जिसने उनकी राज्यसभा उम्मीदवारी पर ग्रहण लगा दिया. बहरहाल, मीनाक्षी नटराजन के ऐसे व्यवहार को कांग्रेस में एक खेमा अव्यावहारिक करार देता है और ऐसे लोगों को संगठन में अहमियत दिए जाने के ख़िलाफ़ नज़र आता है. सूत्रों के मुताबिक, मध्य प्रदेश कांग्रेस के कुछ अहम नेताओं ने पार्टी नेतृत्व को पहले ही आगाह किया था कि मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी का स्थानीय स्तर पर विरोध हो सकता है.
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रात में ही ट्रेन से दिल्ली रवाना हुईं मीनाक्षी नटराजन
कांग्रेस आलाकमान ने शुरुआत में राज्य के नेताओं को मीनाक्षी की जीत सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश दिए थे. यहां तक कि क्रॉस वोटिंग की आशंका में कांग्रेस मध्यप्रदेश के अपने विधायकों को बेंगलुरु भेज रही थी, लेकिन उनका विमान उड़ता इससे पहले ही नटराजन का पर्चा रद्द हो चुका था. अब इस मामले को लेकर कोर्ट जाने की रणनीति बना रही कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को आनन-फानन में दिल्ली बुलाया है. मीनाक्षी रात को ही ट्रेन से दिल्ली के लिए निकल गईं, क्योंकि खर्चों पर काबू रखने के लिए वह हवाई यात्रा से हमेशा परहेज़ करती हैं. वह अपना निजी खर्चा पूर्व सांसद के तौर पर मिलने वाली पेंशन और ख़ुद की लिखी कुछ किताबों की कमाई से निकालती हैं. इन वजहों से कांग्रेस में कई लोग मीनाक्षी नटराजन को एक पहेली की तरह देखते हैं, लेकिन उनके करीबियों का मानना है कि आज के दौर में उसूलों पर चलने वाले ऐसे नेता बेहद विरले होते हैं. अब देखना होगा कि चुनाव आयोग या अदालत से उन्हें आगे क्या राहत मिल पाती है.
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