राज्य सरकारों की ओर से की गई लोकलुभावन घोषणाओं, लोगों के बैंक खाते में नकद रुपये भेजने पूंजीगत व्यय प्रभावित होने से उनका राजस्व घाटा बढ़ रहा है. संसद में गुरुवार को पेश आर्थिक समीक्षा में इस बात को लेकर चिंता जताई गई है. समीक्षा में जोर देते हुए कहा गया कि राज्य स्तर पर किसी भी प्रकार की राजकोषीय अनुशासनहीनता का सीधा असर देश की उधारी लागत पर पड़ता है.
'राज्यों का बढ़ता राजस्व घाटा
संसद में पेश बजट-पूर्व दस्तावेज में कहा गया है,''जहां केंद्र सरकार ने रिकॉर्ड सार्वजनिक निवेश के साथ अपने खर्च को संतुलित रखा है, वहीं कई राज्यों में बढ़ते राजस्व घाटे और बिना शर्त नकद अंतरण वृद्धि को बढ़ावा देने वाले खर्च को प्रभावित कर रहे हैं, जो नए जोखिम पैदा कर रहे हैं.''
समीक्षा में यह भी कहा गया है कि कई राज्यों में बिना शर्त नकद अंतरण (यूसीटी) योजनाएं तेजी से बढ़ रही हैं और अब राज्य-स्तरीय कल्याणकारी खर्च का एक बड़ा हिस्सा बन गई हैं. विशेष रूप से महिलाओं के लिए चल रही इन योजनाओं पर वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है.
देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता असर
चूंकि अब भारतीय सरकारी बॉन्ड वैश्विक निवेशकों के लिए भी उपलब्ध हैं और निवेशक सरकार की वित्तीय स्थिति का लगातार मूल्यांकन कर रहे हैं, इसलिए राज्य स्तर पर कमजोर वित्तीय अनुशासन अब केवल स्थानीय समस्या नहीं रह गया है. इसका असर सीधे देश की सरकारी उधारी लागत पर पड़ता है.
समीक्षा में कहा गया है,''व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखें तो, राज्य स्तर पर किसी भी प्रकार की राजकोषीय अनुशासनहीनता का असर देश की सरकारी उधारी पर भी पड़ता है. जब बाजार पूरे देश के स्तर पर सरकारी ऋण का मूल्यांकन करते हैं, तो लगातार बढ़ते राजस्व घाटे या राज्य स्तर पर बढ़ते खर्च देश के बॉन्ड की ब्याज दर को प्रभावित कर सकते हैं.''
समीक्षा में यह भी कहा गया, "केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर समान रूप से वित्तीय अनुशासन बनाए रखना बहुत जरूरी है. वित्तीय नीतियों का उद्देश्य सिर्फ स्थायी खर्च बढ़ाना नहीं होना चाहिए, बल्कि उत्पादन क्षमता और आमदनी बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए."
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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)













