भाजपा राज्यसभा में पहली बार बहुमत के करीब पहुंच रही है. यह उसके लिए ही नहीं बल्कि बीते 40 सालों के संसदीय इतिहास में भी एक रिकॉर्ड है. भाजपा की उच्च सदन में बढ़ती ताकत के पीछे उसकी दोतरफा रणनीति है. इस पर वह लगातार काम कर रही है और टीएमसी के साथ भी ऐसा ही दिखा है. तृणमूल कांग्रेस के तीन राज्य सभा सांसदों से इस्तीफा दिलवा कर और उनके इस्तीफे से खाली सीटों पर उपचुनाव में उन्हें ही अपना उम्मीदवार बना कर भाजपा ने राज्य सभा में अपने ऑपरेशन का एक और चरण को पूरा कर लिया है.
संसद के ऊपरी सदन में अपनी संख्या बढ़ाने का उसका यह ऑपरेशन पिछले 12 वर्षों से चल रहा है, जिसे दो तरह से अंजाम दिया जा रहा है. इस तरह अब तक विपक्ष के 20 से भी अधिक सांसद भाजपा के खेमे में आ चुके हैं. इसके बूते भाजपा की राज्य सभा में अब तक की सर्वाधिक संख्या भी होने जा रही है. भाजपा मनोनीत और निर्दलीयों के सहयोग से साधारण बहुमत और सहयोगी दलों के साथ दो-तिहाई बहुमत के करीब भी पहुंच रही है. हालांकि 17 राज्यों में खुद की सरकार और 22 राज्यों में सहयोगियों के साथ सत्ता में होने का भी उसे लाभ मिला है जिसके कारण राज्य सभा में उसकी ताक़त बढ़ी है. राज्य सभा में ऑपरेशन दो तरह से चलाया जा रहा है.
यह ऑपरेशन इस तरह से होता है कि संविधान की दसवीं अनुसूची या दलबदल कानून का उल्लंघन न हो और भाजपा के पाले में आने वाले सांसदों की सदस्यता न जाए. जिन विपक्षी दलों में टूट के लिए जरूरी दो-तिहाई सांसदों की संख्या पूरी हो जाती है वहां वे भाजपा में विलय कर देते हैं. जैसा कि तेलुगु देशम पार्टी और आम आदमी पार्टी के मामलों में हुआ. इन मामलों में उपचुनाव की आवश्यकता नहीं पड़ती. जिन विपक्षी दलों में टूट के लिए दो-तिहाई सांसद नहीं जुट पाते हैं, वहां एक-एक कर सांसदों से इस्तीफा दिलाया जाता है ताकि उनके इस्तीफे से उपचुनाव हो. यहां यह ध्यान रखा जाता है कि यह विपक्षी दलों के सांसद भाजपा शासित राज्यों से ही चुन कर आए हों. इसका मतलब कि जहां विधानसभा में भाजपा को बहुमत हो ताकि उनके इस्तीफे से खाली राज्य सभा सीट पर उपचुनाव होने पर वे भाजपा के टिकट पर दोबारा जीत कर राज्य सभा आ सकें.
ऐसा इसलिए क्योंकि राज्य सभा के उपचुनाव में संख्या बल के हिसाब से सत्तारूढ़ दल की जीत सुनिश्चित मानी जाती है. अगर एक से अधिक सीटों पर उपचुनाव हो तो हर उपचुनाव एक अलग चुनाव के तौर पर कराया जाता है. ऐसे में विपक्षी दल चाह कर भी न तो अपने उम्मीदवार खड़े कर सकते हैं और अगर खड़ा कर भी दें तो उसकी जीत सुनिश्चित नहीं करा सकते. हालांकि हाल में इसका फायदा कांग्रेस को भी मिला जब तमिलनाडु में डीएमके के राज्य सभा सांसद के इस्तीफे से खाली सीट पर हुए उपचुनाव में उसे एक सीट मिल गई क्योंकि सत्तारूढ़ टीवीके ने उसका समर्थन किया.
इस तरह राज्य सभा में दलबदल के दो तरीके देखे गए हैं- पहला है थोक में दलबदल और दूसरा फुटकर में दलबदल। पहले तरीके की बात करें तो 2014 से अब तक कुछ बड़े विपक्षी राजनीतिक दलों में इस तरह की टूट हो चुकी है. 2019 में टीडीपी एनडीए के साथ नहीं थी। तब उसके छह में चार राज्य सभा सांसद टूट कर भाजपा में शामिल हो गए. उस समय वाई.एस चौधरी, सी. एम. रमेश, जी. मोहन राव और टीजी वेंकटेश ने टीडीपी से अलग होकर अपना एक अलग ग्रुप बनाया. यह दसवीं अनुसूची के अनुसार दो तिहाई की संख्या से अधिक थी. इसके बाद यह सभी भाजपा में शामिल हो गए.
AAP को भी लगा था करारा झटका, भाजपा को एक बार में मिले 7 सांसद
इस साल आम आदमी पार्टी के दस में सात राज्य सभा सांसदों ने भी यही रास्ता लिया. राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, विक्रम साहनी और राजेंद्र गुप्ता ने अलग होकर अपना गुट बनाया और उसके बाद भाजपा में विलय कर दिया. यह भी दो तिहाई से अधिक संख्या थी, लिहाजा सभापति ने इस विलय को मान्यता देते हुए उनका नाम भाजपा सांसदों में जोड़ दिया. जिन दलों में यह दो तिहाई की संख्या पूरी नहीं हो सकी, वहां सांसदों से व्यक्तिगत संपर्क कर इस्तीफा दिलाया गया.
24 जुलाई वाले चुनाव से और बढ़ जाएगी भाजपा की ताकत
यह एक लंबी सूची है जिनमें नौ जुलाई को ही भाजपा में शामिल हुए टीएमसी के तीन सांसद सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बारीक शामिल हैं. इन्होंने आठ जून से दस जून के बीच राज्य सभा से इस्तीफा दिया था. इनके इस्तीफे से खाली सीटों पर 24 जुलाई को उपचुनाव होना है. गुरुवार को वे जैसे ही भाजपा में शामिल हुए, उसकी थोड़ी देर बाद ही उन्हें भाजपा ने इन उपचुनावों के लिए अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया. जैसा कि ऊपर बताया गया, तीनों उपचुनाव अलग-अलग होने के कारण भाजपा का भारी संख्या बल इनकी जीत सुनिश्चित कर देगा और वे तीनों ही भाजपा के सांसद के रूप में चुन कर आ जाएंगे. भाजपा ने इस फार्मूले को 2019 में लागू किया था जब उसे अनुच्छेद 370 के खात्मे के लिए राज्य सभा में संख्या बल की आवश्यकता थी. उस समय राज्य सभा में कांग्रेस के चीफ व्हिप भुवनेश्वर कलीता ने इस्तीफा दे दिया था. बाद में वे भाजपा में शामिल हो गए और 2020 में पार्टी के टिकट पर राज्य सभा में आ गए. इसी तरह कांग्रेस सांसद संजय सिंह ने भी जुलाई 2019 में राज्य सभा से इस्तीफा दिया और बाद में बीजेपी के टिकट पर वापस आ गए.
जब सपा को भी राज्यसभा में लगा था बड़ा झटका
समाजवादी पार्टी के नीरज शेखर, सुरेंद्र सिंह नागर और संजय सेठ ने भी इसी तरह इस्तीफा दिया और बाद में उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर राज्य सभा वापस आ गए. यही फार्मूला बीजू जनता दल पर भी लागू किया जब ओडिशा में 2024 में भाजपा की सरकार बनी. उसके बाद से ही ममता मोहंती, सुजीत कुमार, देबाशीष सामंतरे और अमर पटनायक बीजेडी से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुए और बाद में पार्टी के टिकट पर राज्य सभा पहुंचे. इसी तरह विपक्ष की ताकत कमजोर करते हुए वाईएसआरसीपी के दो सांसदों बीडा एम राव और वी राव मोपीदेवी ने अगस्त 2024 में राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद में वे एनडीए के पाले में आ गए.
कैसे एनडीए का भी बढ़ता जा रहा कुनबा
उनके इस्तीफे से खाली सीटों पर एनडीए को बढ़त मिल गई. एनसीपी के भाजपा के साथ आने पर प्रफुल्ल पटेल ने चार साल का कार्यकाल बाकी होने के बावजूद फरवरी 2024 में राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया और तुरंत एनडीए के समर्थन से वापस राज्य सभा आ गए. कांग्रेस के केसी राममूर्ति ने अक्तूबर 2019 में राज्य सभा से इस्तीफा दिया और भाजपा में शामिल हो गए. उसके तुरंत बाद हुए उपचुनाव में वे भाजपा के टिकट पर जीत कर आ गए. इस तरह के भारी दलबदल का ही असर है कि भाजपा राज्य सभा में अपने ऐतिहासिक सर्वाधिक स्तर पर पहुंच गई है। 24 जुलाई के बाद राज्य सभा में भाजपा की संख्या 117 पहुंच जाएगी, जो उसके इतिहास की अब तक की सर्वाधिक संख्या है.
अपने बूते राज्यसभा में बहुमत से सिर्फ 6 सीट दूर भाजपा
इस तरह भाजपा अपने बूते राज्य सभा में साधारण बहुमत यानी 123 से केवल छह दूर रह जाती है. अगर सात मनोनीत और तीन निर्दलीय (परिमल नथवाणी, कार्तिकेय शर्मा और दिलीप रे) को मिला लें तो भाजपा साधारण बहुमत के आंकड़े को पार कर 127 पर पहुंच जाती है. वहीं सहयोगी दलों के साथ यह संख्या दो तिहाई के आंकड़े यानी 164 के करीब पहुंच रही है. भाजपा के सहयोगी दलों में टीडीपी, एआईएडीएमके, जेडीयू और एनसीपी के चार-चार, शिवसेना और यूपीपीएल के दो-दो, आरपीआई ए, एजीपी, एमएनएफ, एनपीपी, आरएलएम और जनसेना पार्टी के एक-एक सांसद हैं. यानी भाजपा के सहयोगी दलों की संख्या 26 है. इस तरह एनडीए का आंकड़ा 153 तक पहुंच गया है जो दो तिहाई के आंकड़े से केवल 11 कम है.