यूपी में 'ब्राह्मण' पर फिर बवाल, BHU के पेपर में पूछा ऐसा सवाल, सोशल मीडिया से लेकर शंकराचार्य तक विवाद में कूदे

Varanasi News: उत्‍तर प्रदेश में 'ब्राह्मण' पर फिर बवाल हो गया है. बीएचयू के MA इतिहास के पेपर में ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ पर पूछे गए प्रश्न पर विवाद खड़ा हो गया है. सोशल मीडिया के साथ राजनीतिक दलों ने भी ब्राह्मणों को निशाना बनाए जाने पर सवाल उठाया है.

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  • बीएचयू के MA परीक्षा में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर विवादित प्रश्न ने छात्र और प्रोफेसरों में विरोध
  • कई छात्रों और प्रोफेसरों ने प्रश्न की भाषा और विषय को आपत्तिजनक और एक विशेष वर्ग के खिलाफ बताया है
  • काशी विद्वत परिषद और बीएचयू के कुछ प्रोफेसर भी इस प्रश्न के आधार और उपयुक्तता पर सवाल उठा रहे हैं
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वाराणसी:

वाराणसी के बीएचयू में एमए इतिहास के चौथे प्रश्न पत्र में पूछा गया एक सवाल अब चर्चा का विषय बन गया है. प्रश्न पत्र में छात्रों से पूछा गया कि "ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति को कैसे बाधा पहुंचाई?" सवाल सामने आते ही सोशल मीडिया से लेकर अकादमिक जगत तक बहस शुरू हो गई है. बीएचयू के प्रोफेसर से लेकर छात्र तक इस प्रश्न को गलत बताकर विरोध कर रहे है, तो वहीं कुलपति कहते है इस बारे में बाद में बात करेंगे. इससे पहले समाजवादी पार्टी नेता राजकुमार भाटी के बयान ब्राह्मणों पर दिये गए बयान, यूजीसी और घूसखोर पंडित जैसे मुद्दों पर विवाद हो चुका है. 

'ऐसे प्रश्न तैयार करने वाले वामपंथी विचार धारा से जुड़े'

बीएचयू के इतिहास विभाग की परीक्षा में पूछे गए विवदास्‍पद सवाल को लेकर छात्र और प्रोफेसर दोनों ही विरोध जताते नजर आ रहे हैं. कई छात्रों का कहना है कि प्रश्न की भाषा आपत्तिजनक है और यह एक विशेष वर्ग को निशाना बनाने जैसा प्रतीत होता है. वहीं कुछ प्रोफेसरों ने भी इस सवाल को अनुचित बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई है. ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर सुभाष पांडे का कहना है कि ये प्रश्न बिल्कुल निराधार है. ऐसे प्रश्न तैयार करने वाले वामपंथी विचार धारा से जुड़े है.

कब-कब 'ब्राह्मण' को लेकर विवाद 

  • समाजवादी पार्टी के प्रवक्‍ता राजकुमार भाटी ने पिछले दिनों एक कहावत सुनाई थी, जिसमें ब्राह्मण समाज के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था. 
  • हाल ही में नेटफ्लिक्स की एक प्रस्तावित फिल्म/वेब सीरीज का टाइटल था, जिसके कारण देशभर में भारी विवाद हुआ. इस टाइटल और फिल्म के कंटेंट पर ब्राह्मण समाज की भावनाओं को आहत करने का आरोप लगा. 
  • यूजीसी द्वारा शिक्षण संस्थानों में जातिगत और अन्य प्रकार के भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम बनाए गए. ब्राह्मण और अन्य सवर्ण संगठनों का आरोप है कि ये नियम सामान्य वर्ग के खिलाफ हैं और इनके जरिए सवर्णों को झूठे मुकदमों में फंसाने का खतरा बढ़ गया है. 

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद भी भड़के

बीएचयू की परीक्षा में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर पूछे गए सवाल पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद भड़क गए हैं. अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा, "भाजपा की सरकार हिन्दू समाज को बांटने का कार्य शुरू कर चुकी है. एक जाति को दूसरी जाति के सामने खड़ा कर लड़ा रहे हैं. हारे चाहे, जो नुकसान तो हिंदुओं का ही है. हिंदू अब आपस में नही लड़ेगा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सदा से भगवान के अंग रहे है और रहेंगे. हिंदुओ के बीच कोई फूट नहीं डाल सकता और जो डाल रहे हैं उन्हें हम ठुकराने वाले हैं.

कुलपति ने विवाद पर क्‍या कहा?

काशी विद्वत परिषद ने भी इस प्रश्न पर सवाल खड़ा किया है. काशी विद्वत परिषद के मंत्री और बीएचयू में प्रोफेसर विनय पांडे का कहना है कि इस तरह के प्रश्न का आधार क्या है और बीएचयू इस तरह के प्रश्न पत्र तैयार करने के बिल्कुल भी पक्ष में नहीं है. मामला बढ़ने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन भी सवालों के घेरे में आ गया है. हालांकि, इस पूरे विवाद पर जब कुलपति  प्रो. अजित चतुर्वेदी से सवाल किया गया तो उन्होंने फिलहाल सीधे तौर पर कुछ भी कहने से बचते हुए कहा कि इस विषय पर बाद में बात की जाएगी.

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बीएचयू इतिहास विभाग की प्रोफेसर भी सवाल के पक्ष में नहीं

विवादित प्रश्न पत्र पर उठे बवाल के बाद बीएचयू के उसी इतिहास विभाग की प्रोफेसर अनुराधा सिंह का कहना है कि ये प्रश्न किस काल को देखते हुए तैयार किया गया ये अभी कहना मुश्किल है, लेकिन इस तरह के सवाल नहीं होने चाहिए. इसके पक्ष में मैं भी नहीं हूं. वहीं, बीएचयू के छात्र अभिनव शंकर पांडेय ने कहा कि अब यह मामला केवल एक परीक्षा के सवाल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अकादमिक स्वतंत्रता, इतिहास की व्याख्या और धार्मिक-सामाजिक संवेदनाओं को लेकर नई बहस छेड़ चुका है. छात्र अब इस तरह के सिलेबस के खिलाफ है. उनका कहना है मालवीय जी की बगिया में इस तरह के प्रश्न नहीं होने चाहिए.

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