असम विधानसभा चुनाव 2026: कभी ‘किंगमेकर’ बनने का दावा करने वाले बदरुद्दीन अजमल अब कितने अहम?

असम की राजनीति में बदरुद्दीन अजमल का नाम लंबे समय तक ‘किंगमेकर’ के तौर पर लिया जाता रहा है. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस कहानी को झटका दिया. अब 2026 का विधानसभा चुनाव उनके लिए 'अस्तित्व बचाने' की लड़ाई बन चुका है.

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  • 2021 के विधानसभा चुनाव में अजमल की पार्टी ने लोअर असम और बराक वैली में 16 सीटें जीती थीं.
  • लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अजमल अपनी परंपरागत सीट धुबरी से 10 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हार गए.
  • NDTV The Great Brahmaputra Dialogue में अजमल ने हिमंत को संदेश दिया- किसी समुदाय को दबाकर विकास नहीं हो सकता.
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असम की राजनीति में एक अहम किरदार रहे बदरुद्दीन अजमल पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक दिख रहे हैं. The Great Brahmaputra Dialogue में उन्होंने खुलकर ताल ठोकते हुए कहा कि इस बार असम की जनता 'ताला' (AIUDF का चुनाव चिन्ह) को वोट देगी क्योंकि बीजेपी ने 'नाक में दम' कर रखा है. उन्होंने सीधे तौर पर बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि 'बीजेपी को देश से भगाना है', वहीं मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर भी तीखा हमला बोला- पहले इंसान बनिए, लीडर बाद में बनिए… धर्म के नाम पर वोट मत मांगिए. घुसपैठ के मुद्दे पर उन्होंने चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा- अगर बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ होती है तो शूट एट साइट करो. वहीं वक्फ जमीन को लेकर अपने पुराने बयान पर कायम रहते हुए उन्होंने कहा कि 'अगर कोई चुनौती देगा तो सुप्रीम कोर्ट जाएंगे.' 

इन बयानों के साथ साफ है कि अजमल इस चुनाव में अपनी राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की लड़ाई लड़ रहे हैं. असम की राजनीति में बदरुद्दीन अजमल का नाम लंबे समय तक ‘किंगमेकर' के तौर पर लिया जाता रहा है. उनकी पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) ने 2021 के विधानसभा चुनाव में 16 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई थी. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस कहानी को झटका दिया. अजमल अपनी परंपरागत सीट धुबरी से 10 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हार गए- जो उनके राजनीतिक ग्राफ में गिरावट का सबसे बड़ा संकेत माना गया. ऐसे में अब 2026 का विधानसभा चुनाव उनके लिए 'अस्तित्व बचाने' की लड़ाई बन चुका है.

35% मुस्लिम वोट और अजमल की पकड़

असम में मुस्लिम आबादी करीब 35% है, जो पूरे देश में जम्मू-कश्मीर के बाद सबसे ज्यादा है. यही वजह है कि दशकों से अजमल को इस वोट बैंक का सबसे बड़ा ‘गेटकीपर' माना जाता रहा है. हालांकि लोकसभा में हार के बाद सवाल उठे हैं कि क्या उनका प्रभाव कम हो रहा है, लेकिन विधानसभा स्तर पर अभी भी उनकी पकड़ को पूरी तरह खत्म नहीं माना जा रहा.

2021 के विधानसभा चुनाव में अजमल की पार्टी ने लोअर असम और बराक वैली में 16 सीटें जीती थीं. 

कांग्रेस से दूरी, सबसे बड़ी पहेली

जानकार यह भी मानते हैं कि अजमल के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के साथ उनका रिश्ता है. गौरव गोगोई के नेतृत्व में बना विपक्षी गठबंधन ‘असोम सनमिलितो मोर्चा' (ASOM) ने AIUDF से दूरी बना ली है. कांग्रेस की रणनीति साफ है. उनका मानना है कि अजमल के साथ गठबंधन करना बीजेपी को ध्रुवीकरण का मौका देना है. लेकिन अजमल ने कांग्रेस को ही बीजेपी की बी-टीम बता दिया और आरोप मढ़ा कि वो परोक्ष रूप से बीजेपी की मदद कर रही है. अब खबरें हैं कि अजमल नए सहयोगियों की तलाश में हैं, यानी अकेले चुनाव लड़ने और गठबंधन के बीच अब भी रास्ता ढूंढ़ रहे हैं.

वोट कटवा या किंगमेकर

असम की राजनीति में बदरुद्दीन अजमल पर वोट कटवा होने का एक बड़ा आरोप हमेशा लगता रहा है. जानकार कहते हैं कि अगर उनकी पार्टी AIUDF अकेले चुनाव लड़ती है, तो मुस्लिम वोटों के बंटने की आशंका बरकररार रहेगी जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा. लेकिन दूसरी तरफ एक संभावना और भी है कि अगर किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और अजमल की पार्टी ने पिछली बार की तरह ही सीटें जीती तो वो ‘किंगमेकर' बन सकते हैं. हालांकि असम की मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में यह संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती है, लेकिन पूरी तरह इसे खारिज भी नहीं किया जा सकता है.

विकास बनाम पहचान की राजनीति

अजमल इस बार सिर्फ मुस्लिम नेता की छवि से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने स्लोगन दिया है - 'अजमल का वरदान- शिक्षा, चिकित्सा, कृषि और सम्मान.'  इस तरह अजमल ने विकास को मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश की है, तो हिंदू और महिला उम्मीदवारों को टिकट देने का एलान भी साथ ही किया है. उनकी रणनीति सभी वर्गों का प्रतिनिधि बनने की है पर क्या असम की जनता उन्हें इस नए रूप में स्वीकार करेगी?

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हिमंत बनाम अजमल: सीधी टक्कर

बीजेपी जहां अजमल को सांप्रदायिक चेहरा बताती है, वहीं अजमल बीजेपी पर विभाजन की राजनीति का आरोप लगाते हैं.
NDTV के The Great Brahmaputra Dialogue में अजमल ने हिमंत को सीधा संदेश दिया. वे बोले, “धर्म के नाम पर वोट मत मांगिए. किसी एक समुदाय को दबाकर विकास नहीं हो सकता." ऐसे में यह टकराव चुनावी माहौल को और ज्यादा ध्रुवीकरण कर सकता है.

महिलाओं और संगठन पर फोकस

अजमल ने यह भी संकेत दिया है कि उनकी पार्टी महिलाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की कोशिश कर रही है. उन्होंने NDTV से बताया कि 2 महिलाओं को टिकट दिया जा चुका है, एक और को देने की तैयारी की जा रही है. यह कदम उनकी छवि को व्यापक बनाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

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2026: साख की सबसे बड़ी परीक्षा

स्लोगन, संदेश और रणनीति के बीच एक चीज तो स्पष्ट है कि दो साल पहले लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद, 2026 के विधानसभा चुनाव में अजमल की प्रतिष्ठा दांव पर है. उन्हें न केवल मुस्लिम वोट बैंक पर अपनी पकड़ साबित करनी है बल्कि अपने पहले के प्रदर्शन को भी दोहराना होगा. अन्यथा किंगमेकर के दावेदार के कमजोर खिलाड़ी बनने का खतरा है और अगर इस बार प्रदर्शन कमजोर रहा, तो आगे असम की राजनीति में उनकी भूमिका सीमित रह जाने का खतरा है. ऐसे में क्या बदरुद्दीन अजमल अपनी पुरानी ताकत दिखाने में कामयाब होंगे, या परिसीमन और बदले समीकरणों में उलझ कर रह जाएंगे? इसका फैसला तो जनता 9 अप्रैल को करेगी जो 4 मई 2026 को आने वाले नतीजों में उजागर होगा.

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