असम के आसमान में प्रियंका के लिए चुनौतियां हजार, निपटने के लिए क्या बनाएंगी रणनीति

असम में कांग्रेस को एक मजबूत गठबंधन बनाना भी एक बड़ी चुनौती है.असम में गठबंधन का बड़ा महत्त्व है पिछली बार भी यहां एनडीए बनाम महाजोत जो कांग्रेस का गठबंधन था के बीच चुनाव हुआ पिछली बार एनडीए को 126 विधानसभा सीटों में 75 सीटें मिली थी और कांग्रेस गठबंधन वाली महाजोत को 50 सीट.

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प्रियंका गांधी के सामने कई अहम चुनौतियां हैं
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  • प्रियंका गांधी ने असम के 21 विधायकों, सांसदों, जिला अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों से मुलाकात भी की है.
  • भूपेन वोरा के कांग्रेस छोड़ने से पार्टी को बड़ा झटका लगा है और प्रियंका के लिए संगठन एकजुट करना चुनौती है
  • कांग्रेस असम में बदरूद्दीन अजमल के साथ गठबंधन नहीं करेगी.
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नई दिल्ली:

कांग्रेस महासचिव और असम के स्क्रीनिंग कमिटी की अध्यक्ष प्रियंका गांधी असम के दौरे से दिल्ली आ चुकी हैं और राजधानी में एक बड़ी बैठक की है .यह शायद पहला मौका होगा जब किसी भी प्रदेश के स्क्रीनिंग कमिटी के अध्यक्ष के दौरे को इतना महत्व दिया जा रहा हो. लेकिन इसलिए भी है क्योंकि इससे प्रियंका गांधी का नाम जुड़ा है. स्क्रीनिंग कमिटी के बाकी सदस्य कनार्टक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार,छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल,सांसद इमरान मसूद जैसे बड़े नाम हैं.

प्रियंका गांधी ने असम के 21 विधायकों,3 सांसदों,जिला अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों से मुलाकात की है. मगर असम में प्रियंका गांधी के लिए चुनौतियां भी बड़ी है, जिसमें पार्टी के अंदर बगावत और संगठन की चुनौतियां है.भूपेन वोरा का कांग्रेस छोड़ना पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है.भूपेन वोरा पिछले 30 सालों से कांग्रेस के सदस्य रहे और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी थे.जब से गौरव गोगोई को असम का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है तभी से भूपेन वोरा अपने आप को असहज महसूस कर रहे थे.

भूपेन वोरा ने गौरव गोगोई पर आरोप लगाया है कि वे रकिबुल हुसैन को अधिक तरजीह दे रहे थे.भूपेन वोरा के कांग्रेस छोड़ने के बाद प्रियंका गांधी की सबसे बड़ी चुनौती होगी कि पार्टी को एकजुट रखें क्योंकि पिछले कई सालों में कई विधायक कांग्रेस छोड़कर जा चुके हैं.भूपेन वोरा ने ये घोषणा की है कि 8 मार्च को उनके साथ कई और कांग्रेस नेता पार्टी छोड़ कर बीजेपी में जाऐंगे.फिलहाल कांग्रेस में चुनाव से पहले नेताओं के इस भगदड़ को रोकना प्रियंका गांधी की सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी. दूसरा असम में प्रियंका को बीजेपी के मजबूत संगठन का मुकाबला करना है जिसे हेमंत बिस्वा शर्मा ने खड़ा किया है.एक समय में लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रहने वाले तरूण गोगोई के जाने के बाद कांग्रेस कमजोर होती गई और हेमंत विस्वा शर्मा के नेतृत्व में बीजेपी बढ़ती गई और अब पूरे असम में बीजेपी की पकड़ काफी मजबूत हो चुकी है.

असम में कांग्रेस को एक मजबूत गठबंधन बनाना भी एक बड़ी चुनौती है.असम में गठबंधन का बड़ा महत्त्व है पिछली बार भी यहां एनडीए बनाम महाजोत जो कांग्रेस का गठबंधन था के बीच चुनाव हुआ पिछली बार एनडीए को 126 विधानसभा सीटों में 75 सीटें मिली थी और कांग्रेस गठबंधन वाली महाजोत को 50 सीट.

हालांकि यदि आप वोटों के प्रतिशत को देखें तो एनडीए को 43.9 फीसदी वोट मिले थे,जबकि महाजोत को 42.3 फीसदी यानी अंतर सिर्फ 1.6 फीसदी वोटों का ही था. यहां पर प्रियंका गांधी का नाम काम में आ सकता है अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि कांग्रेस किन पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी क्योंकि यह तो साफ है कि इस बार कांग्रेस बदरूद्दीन अजमल के साथ कोई गठबंधन नहीं करना चाहती है.अजमल को लोकसभा चुनाव में धुबरी सीट पर रकीबुल हुसैन ने 10 लाख वोटों से हराया था.

कांग्रेस बदरूद्दीन अजमल की पार्टी को बीजेपी की बी टीम कह रही है.कांग्रेस इस बार वामदलों के अलावा अखिल गोगोई की रायजोर दल के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी में है.असम में कई और छोटे दल हैं जिसके साथ कांग्रेस गठबंधन कर सकती है .कई जानकारों का मानना है कि असम में कांग्रेस को मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा की आक्रामक शैली वाली राजनीति का जवाब देना मुख्य चुनौती है. इसमें प्रियंका गांधी की अपनी राजनैतिक शैली कारगर हो सकती है क्योंकि प्रियंका गांधी पर सीधी टिप्पणी करने से हेमंत विस्वा शर्मा भी बचना चाहेंगे.

वैसे प्रियंका गांधी के स्क्रीनिंग कमिटी का अध्यक्ष बनाए जाने के वक्त कहा था कि प्रियंका गांधी को कठिन काम दे कर राहुल गांधी ने फंसा दिया मगर प्रियंका गांधी की टीम का कहना है कि उन्हें कठिन काम करने में ही मजा आता है.वैसे चुनौतियां तो कांग्रेस के लिए चुनौतियां तो बहुत है मगर गौरव गोगोई और प्रियंका गांधी को भी मालूम है कि असम में वक्त लगेगा और कांग्रेस ने अपनी स्थिति पहले से अच्छी की तो यह भी उनके लिए जीत ही मानी जाएगी.

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