- आंध्र प्रदेश के CM चंद्रबाबू नायडू ने तीसरे बच्चे पर 30,000 और चौथे बच्चे पर 40,000 रुपये देने की घोषणा की है
- भारत में जन्म दर घटने के बावजूद आबादी बढ़ रही है और 2050 तक 167 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है
- बढ़ती आबादी के कारण भारत में पानी, रोटी, मकान और अन्य बुनियादी जरूरतों की गंभीर किल्लत होने की आशंका है
India Population Policy: आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने राज्य की घटती आबादी को बढ़ाने के लिए एक नया तरीका निकाला है. उन्होंने ऐलान किया है कि तीसरा बच्चा होने पर 30 हजार और चौथा होने पर 40 हजार रुपये दिए जाएंगे. नायडू इससे पहले दूसरा बच्चा होने पर 25 हजार रुपये देने का ऐलान भी कर चुके हैं.
शनिवार को एक रैली में नायडू ने कहा कि 'मैंने एक नया फैसला लिया है. हम तीसरे बच्चे के जन्म के तुरंत बाद 30,000 और चौथे बच्चे के जन्म पर 40,000 रुपये देंगे. क्या यह सही फैसला नहीं है?'
चंद्रबाबू नायडू का कहना है कि कुछ दंपति एक ही बच्चा करना पसंद कर रहे हैं. लोग दूसरा बच्चा तभी चाहते हैं जब उनका पहला बच्चा लड़का न हो. उनका कहना है कि इस कारण राज्य की जनसंख्या बढ़ने की दर घट रही है.
नायडू अकेले नहीं हैं जिन्होंने इस तरह का ऐलान किया है. दक्षिण के राज्यों के मुख्यमंत्री अक्सर आबादी बढ़ाने की वकालत करते रहे हैं. दो साल पहले तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने तो यहां तक कह दिया था कि लोगों को 16-16 बच्चे पैदा करना चाहिए. इतना ही नहीं, हिंदू संगठन भी ज्यादा बच्चे पैदा करने की वकालत करते हैं. कई हिंदू संगठन ज्यादा बच्चे पैदा करने पर इनाम देने का ऐलान कर चुके हैं.
इसकी जरूरत क्या है?
लेकिन सवाल उठता है कि इसकी जरूरत क्या है? वह भी तब भारत की आबादी लगातार बढ़ रही है. भारत आबादी के मामले में चीन से भी आगे निकल चुका है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2050 तक भारत की आबादी बढ़कर 167 करोड़ हो जाएगी.
2011 में जब आखिरी बार जनगणना हुई थी, तब भारत की आबादी 121 करोड़ के पार चली गई थी. इससे पहले 2001 की जनगणना में भारत की आबादी 102 करोड़ थी. यानी 10 साल में भारत की आबादी लगभग 18% बढ़ गई थी.
यह सब तब है जब भारत की महिलाओं की फर्टिलिटी रेट में लगातार गिरावट आ रही है. नीति आयोग की एक रिपोर्ट बताती है कि 1950 के दशक में एक भारतीय महिला औसतन 6 बच्चों को जन्म देती थी. तब फर्टिलिटी रेट 5.9 था. 2025-30 के बीच यह गिरकर 2.05 होने का अनुमान है. जबकि, 2050-55 में यह और गिरकर 1.79 होने का अनुमान है. इसका मतलब हुआ कि 2050-55 तक ज्यादातर घरों में एक बच्चा ही होगा.
आबादी बढ़ाने पर जोर इसलिए दिया जाता है, क्योंकि जन्म दर कम होने पर बुजुर्गों की आबादी बढ़ती है. 2023 में संयुक्त राष्ट्र की 'इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023' आई थी. इसमें अनुमान लगाया गया था कि 2022 तक भारत की आबादी में 14.9 करोड़ बुजुर्ग थे. 2050 तक बुजुर्गों की आबादी बढ़कर 34.7 करोड़ हो जाएगी. यानी, 2022 तक भारत की आबादी में लगभग 10 फीसदी बुजुर्ग थे लेकिन 2050 तक यह दोगुने होकर 20.8 फीसदी हो जाएंगे.
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पर क्या संभाल पाएंगे इतनी आबादी का बोझ?
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, भारत में हर दिन 63 हजार से ज्यादा बच्चे पैदा होते हैं. UNICEF का डेटा बताता है कि भारत में सालभर 2.5 करोड़ बच्चे पैदा होते हैं. यह आंकड़ा न्यूजीलैंड की आबादी से भी 5 गुना ज्यादा है. न्यूजीलैंड की आबादी 52 लाख के आसपास है.
चिंता की बात यह है कि भारत में दुनिया की 18% आबादी रहती है लेकिन हमारे पास सिर्फ 2.4% जमीन ही है. नतीजा छोटी जगह पर लोग खचाखच भरे होते हैं. इसे 'पॉपुलेशन डेंसिटी' कहते हैं. यह लगातार बढ़ रही है. 2001 तक देश में एक किलोमीटर के दायरे में 324 लोग रहते थे. 2011 में यह बढ़कर 382 हो गया. वर्ल्ड बैंक का डेटा बताता है कि 2023 तक भारत में पॉपुलेशन डेंसिटी बढ़कर 484 हो गई है. यानी, अब भारत में एक किलोमीटर के दायरे में लगभग 500 लोग रहते हैं.
बड़े शहरों में तो एक-एक किलोमीटर के दायरे में हजारों लोग रहते हैं. तेलंगाना सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि मुंबई में एक किलोमीटर के दायरे में 28,508 लोग रहते हैं. जबकि, दिल्ली में 11,313 और हैदराबाद में 18,161 लोग रहते हैं.
रोटी-कपड़ा और मकान कहां से लाएंगे?
इंसान की तीन मूलभूत जरूरतें हैं- रोटी, कपड़ा और मकान. आबादी बढ़ने पर इन तीनों का संकट खड़ा हो जाएगा. कैसे?
रोटी की समस्या: भारत में हर साल अनाज की अच्छी पैदावार होती है लेकिन बहुत से लोगों को खाना नहीं मिलता है. संयुक्त राष्ट्र की 'फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन द वर्ल्ड 2025' की रिपोर्ट बताती है कि अब भी 58.65 करोड़ भारतीय हेल्दी डाइट नहीं ले पाते हैं. इसके मुताबिक, 17.21 करोड़ भारतीय अब भी कुपोषित हैं. इसका बड़ा कारण ज्यादा आबादी है. जब आबादी बढ़ेगी तो रोटी की समस्या भी बढ़ेगी.
पानी की किल्लत: ज्यादा आबादी अपने साथ पानी की किल्लत भी लेकर आएगी. दिसंबर 2024 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि आबादी बढ़ने के कारण 2021 तक हर व्यक्ति के लिए 1,486 क्यूबिक मीटर पानी था. 2031 तक यह घटकर 1,367 क्यूबिक मीटर हो जाएगा. बढ़ती आबादी के सामने पानी की किल्लत इसलिए भी होगी, क्योंकि नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया था कि दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे 21 शहरों में 2030 तक ग्राउंडवॉटर पूरी तरह खत्म हो जाएगा.
मकान कहां से आएंगे: 2011 तक 17 लाख से ज्यादा भारतीय बेघर थे. आबादी बढ़ने के कारण बेघरों की संख्या बढ़ रही है. इसके अलावा, शहरीकरण तेजी से हो रहा है. वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि 2050 तक 95 करोड़ से ज्यादा भारतीय शहरों में रह रहे होंगे. इनके लिए घरों की जरूरत होगी. 2070 तक 14.4 करोड़ नए घरों की जरूरत होगी. आबादी बढ़ने से झुग्गी-बस्तियां बढ़ती हैं. 2011 तक शहरों में रहने वाले 18.3% लोग झुग्गी-बस्ती में रहते थे. जबकि, 2001 तक 17.4% शहरी आबादी झुग्गी-बस्ती में रहती थी.
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और क्या-क्या परेशानी लाएगी ज्यादा आबादी?
ज्यादा आबादी कई सारी परेशानियां लेकर आती है. लोगों को न तो अच्छी शिक्षा मिलेगी और न अच्छा इलाज.
वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, साल 2000 तक भारत में अस्पतालों में हर एक हजार लोगों पर 2.1 बेड थे. लेकिन 2021 तक यह आंकड़ा घटकर 1.6 पर आ गया. इसी तरह, शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ की रिपोर्ट बताती है कि 2024-25 तक देशभर में 1.04 लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे थे, जहां सिर्फ एक ही टीचर था. इन स्कूलों में 33.76 लाख से ज्यादा छात्र पढ़ रहे थे.
ज्यादा आबादी होने से रोजगार का संकट भी खड़ा होगा. आंकड़े बताते हैं कि भारतीय युवाओं में बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ रही है. केंद्र सरकार की रिपोर्ट बताती है कि इसी साल जनवरी से मार्च के बीच 15 से 29 साल के युवाओं में बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ी है. जनवरी में युवाओं में बेरोजगारी दर 14.7% थी, जो फरवरी में बढ़कर 14.8% और फिर मार्च में और ज्यादा बढ़कर 15.2% हो गई.
क्लाइमेट चेंज भी एक बड़ी समस्या है, जो आबादी बढ़ने के साथ-साथ और बड़ी समस्या बन जाएगा. आबादी ज्यादा होगी तो अमीर और गरीब के बीच भी खाई बढ़ने का खतरा होगा. ज्यादा आबादी मतलब ज्यादा रिसोर्स लेकिन भारत में इन सबकी कमी है.
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