अगर सुनेत्रा नहीं तो प्रफुल्ल पटेल क्यों? अजित पवार के रहे 'संकटमोचक' की ताकत और साख पार्टी को दिखाएगी दिशा?

प्रफुल्ल पटेल का राजनीतिक सफर चार बार लोकसभा और छह बार राज्यसभा सांसद के रूप में एक बेहद प्रभावशाली और अनुभवी नेतृत्व का रहा है.उन्होंने 10वीं (1991), 11वीं (1996), 12वीं (1998) और 15वीं (2009) लोकसभा में भंडारा-गोंदिया निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया.

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  • उन्होंने एनसीपी के दो फाड़ के दौरान कानूनी और चुनाव आयोग की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी
  • प्रफुल्ल पटेल ने नागरिक उड्डयन और भारी उद्योग मंत्रालय संभालते हुए केंद्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है
  • सुनेत्रा पवार के विरोध में प्रफुल्ल पटेल को अनुभव और प्रशासनिक कौशल के आधार पर प्राथमिकता दी जा सकती है
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मुंबई:

महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों पॉवर शब्द के इर्द-गिर्द सिर्फ एक ही परिवार की चर्चा है पवार परिवार. लेकिन अजित पवार गुट के भीतर चल रही हलचल इशारा कर रही है कि अगर सुनेत्रा पवार की ताजपोशी में कोई पेंच फंसता है, तो नेक्स्ट इन लाइन सिर्फ एक ही नाम है—प्रफुल्ल पटेल! लेकिन राजनीति में आगे क्या होगा इसके लिए सही समय के आने का इंतजार करना होता है. कहा तो ये भी जाता है कि राजनीति में जो तस्वीर साफ दिख रही हो उसे तब तक साफ नहीं मान लेना चाहिए जब तक उसे लेकर कोई औपचारिक ऐलान ना हो जाए. 

पटेल के पास लंबा प्रशासनिक अनुभव है. पार्टी के भीतर वे एक सर्वमान्य चेहरा हैं. यदि सुनेत्रा पवार के नाम पर परिवारवाद का आरोप लगता है, तो प्रफुल्ल पटेल को आगे कर मेरिट और अनुभव का कार्ड खेला जा सकता है. अजित गुट में इस समय दो विचारधाराएं काम कर रही हैं. एक सोच है कि सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम बनाकर महिला कार्ड और इमोशनल कार्ड खेला जाए, वहीं दूसरी सोच है कि प्रफुल्ल पटेल जैसे अनुभवी हाथ ही महाराष्ट्र के कठिन सियासी समीकरणों में पार्टी को सही दिशा दिखा पाएंगे. 

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