- AI Impact Summit 2026 भारत मंडपम में शुरू हो गया है.
- AI इम्पैक्ट समिट 16 फरवरी से शुरू होकर 20 फरवरी 2026 तक चलेगा.
- भारत की इसमें भूमिका सिर्फ यूजर की नहीं बल्कि नियम बनाने वाला देश बनने की कोशिश की भी होगी.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, शासन व्यवस्था, रोजगार और समाज के भविष्य को आकार देने वाली ताकत बन चुकी है. इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत में आयोजित हो रहा AI इम्पैक्ट समिट 2026 दुनिया के बड़े नीति-निर्माताओं, टेक लीडर्स, शोधकर्ताओं और उद्योग जगत को एक मंच पर लाने जा रहा है. यह समिट न सिर्फ टेक्नोलॉजी इनोवेशन की चर्चा करेगा, बल्कि इस सवाल का भी जवाब तलाशेगा कि AI को सुरक्षित, नैतिक और समावेशी तरीके से कैसे इस्तेमाल किया जाए.
यह समिट ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया AI को लेकर दो बड़े सवालों से जूझ रही है- पहला, AI विकास की रफ्तार इतनी तेज है कि क्या समाज, कानून और संस्थाएं उसके साथ तालमेल बिठा पा रही हैं? दूसरा, AI का फायदा सिर्फ कुछ देशों और कंपनियों तक सीमित रहेगा या यह वैश्विक विकास का साझा साधन बनेगा? भारत इस समिट के जरिए खुद को न सिर्फ टेक्नोलॉजी उपभोक्ता बल्कि AI गवर्नेंस और वैश्विक नीति निर्माण में नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करना चाहता है.
AI समिट क्यों जरूरी है?
AI अब हर क्षेत्र में गहराई से प्रवेश कर चुका है- स्वास्थ्य सेवाओं में डायग्नोसिस, शिक्षा में पर्सनलाइज्ड लर्निंग, खेती में स्मार्ट फार्मिंग, उद्योगों में ऑटोमेशन, वित्त में रिस्क एनालिसिस, सुरक्षा में सर्विलांस सिस्टम और शासन में ई-गवर्नेंस.
लेकिन इसके साथ ही बड़े खतरे भी सामने आए हैं: नौकरियों पर असर और स्किल में बड़ा अंतर, डेटा प्राइवेसी और साइबर सुरक्षा, डीपफेक, गलत सूचना और चुनावी हस्तक्षेप, AI एल्गोरिद्म में भेदभाव और पक्षपात, इंसानी नियंत्रण से बाहर जाती टेक्नोलॉजी का डर.
लिहाजा, यह समिट केवल टेक्नोलॉजी की चर्चा नहीं करेगी, बल्कि नीति, नैतिकता, मानवाधिकार और लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ी बातें भी यहां होंगी. भारत इस समिट के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि AI का विकास सिर्फ ताकतवर देशों का खेल नहीं होना चाहिए, बल्कि यह ऐसा क्षेत्र बने जहां ग्लोबल साउथ की आवाज, जरूरतें और चुनौतियां भी केंद्र में हों.
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भारत की भूमिका
अब तक AI पर वैश्विक बहस ज्यादातर अमेरिका, यूरोप और चीन के इर्द-गिर्द घूमती रही है. लेकिन भारत जैसे देश के सामने विशाल आबादी, विकासशील अर्थव्यवस्था, डिजिटल डिवाइड, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विभिन्न भाषाएं और सामाजिक संरचना को लेकर अलग-अलग चुनौतियां हैं. भारत चाहता है कि AI का इस्तेमाल केवल कॉर्पोरेट मुनाफे या सैन्य ताकत बढ़ाने तक सीमित न रहे, बल्कि यह गरीबी घटाने, सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर बनाने और शासन को अधिक पारदर्शी बनाने का औजार बने.
AI समिट के जरिए भारत यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह AI फॉर गुड का मॉडल पेश कर सकता है. वह डेमोक्रेटिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गवर्नेंस का उदाहरण बन सकता है और ग्लोबल साउथ की चिंताओं को वैश्विक एजेंडे में ला सकता है.
AI समिट के मुख्य एजेंडे
AI और वैश्विक शासन. समिट का सबसे अहम मुद्दा यह है कि AI के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम और ढांचे कैसे बनें? आज AI टेक्नोलॉजी सीमाओं से नहीं बंधी है पर कानून अब भी राष्ट्रीय स्तर तक सीमित हैं. इससे डेटा सुरक्षा, साइबर अपराध, डीपफेक, एल्गोरिद्मिक से जुड़े भेदभाव जैसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वय की भारी कमी दिखती है.
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समिट की चुनौतियां
इस समिट को लेकर जहां एक साथ कई बड़ी उम्मीदें मौजूद हैं वहीं चुनौतियां भी कम नहीं हैं. सबसे बड़ी चुनौती आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रसार द्रुत गति से बदलना है. सरकारें नीति तो बना लेंगी पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में बदलाव उससे कहीं तेज होना तय है. ऐसे में बनाए गए नियमों के बहुत जल्दी अप्रासंगिक होने का बहुत बड़ा खतरा है. सबसे पहले तो नियमों को बनाना ही मुश्किल होगा क्योंकि इस पर टेक कंपनियां सहमति देंगी ये मुश्किल लगता है. विकासशील देशों में संसाधन की कमी और रिसर्च के लिए बुनियादी ढांचों की गैर-उपलब्धता भी बड़ी चुनौती है. इन सब के बावजूद समिट के आयोजन का पहल एक अच्छी शुरुआत है और यहां मानवता के विकास और भविष्य को लेकर चर्चा, परिचर्चा के साथ-साथ कुछ अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश होगी.
हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या यह केवल बयानबाजी या घोषणाओं तक ही सीमित न रह जाए. उम्मीद है कि इससे एक ठोस अंतरराष्ट्रीय फ्रेमवर्क उभर कर आए, इसी में इस एआई समिट 2026 की सफलता का मूलमंत्र छिपा है. कुछ ठोस नतीजे निकले तो यह समिट अपने आप में ऐतिहासिक साबित होगा और इससे विकसित देशों के साथ इस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में विकासशील देशों के कंधे-से-कंधा मिलाकर चलने की दिशा तय होगी. इस पूरे बहस के केंद्र में खुद भारत है जो दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि वो इस नई टेक्नोलॉजी का केवल उपभोक्ता नहीं बल्कि इसके भविष्य का एक शिल्पकार भी है.














