World Cancer Day: कैंसर को अक्सर एक व्यक्ति की बीमारी माना जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि कैंसर कभी अकेले किसी एक इंसान को नहीं होता. उसके साथ पूरा परिवार बीमार हो जाता है मन से, दिल से और हालात से. विश्व कैंसर दिवस पर हम सर्वाइवर्स की हिम्मत को सलाम करते हैं, इलाज पूरा होने की खुशियां मनाते हैं, लेकिन उस दर्द को शायद ही कोई देख पाता है जो मरीज के पीछे खड़े परिवार और देखभाल करने वाले हर दिन चुपचाप सहते हैं. यह एक ऐसी मानसिक लड़ाई है, जिसके जख्म दिखाई नहीं देते, लेकिन बहुत गहरे होते हैं.
केयरगिवर्स का अनदेखा मानसिक बोझ:
कैंसर मरीजों की देखभाल करने वाले परिवारों पर भावनात्मक बोझ बहुत ज्यादा होता है, लेकिन सारा फोकस मरीज पर होने की वजह से उनके मानसिक दर्द को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. डर, थकान, कर्ज, अनिश्चित भविष्य और अकेलापन ये सब कैंसर के साथ बिना बुलाए घर में आ जाते हैं.
सब पूछते हैं बच्चा कैसा है, कोई यह नहीं पूछता मैं कैसी हूं!
कीमोथेरेपी से लेकर पूरी प्रक्रिया तक केयरगिवर्स भी मानसिक रूप से थक जाते हैं. हालांकि, सामान्यतौर पर लोग सिर्फ कैंसर पेशेंट्स के बारे में हाल-चाल लेते हैं. लेकिन, उसके पीछे संघर्ष कर रहे लोगों का हाल अक्सर नजरअंदाज किया जाता है.
रातों-रात बदल जाती है केयरगिवर की जिंदगी:
कैंसर के साथ केयरगिवर की जिंदगी एक ही झटके में बदल जाती है. उन्हें ऐसे मेडिकल शब्द सीखने पड़ते हैं, जिन्हें वे कभी जानना नहीं चाहते थे. उन्हें मुस्कुराना सीखना पड़ता है, तब भी जब उनका अपना दिल अंदर से टूट रहा होता है. कई बार परिवार भी बिखर जाते हैं.
जब बीमारी के साथ रिश्ते भी टूट जाते हैं
कैंसर का असर सिर्फ शरीर और मन पर ही नहीं, रिश्तों पर भी होता है. ये एक ऐसा दुश्मन है, जिससे परेशान होकर लोग रिश्तों को भी त्यागने पर मजबूर हो जाते हैं. कई बार ये रिश्तों में दूरियां लाने तक इंसान को तोड़ देता है.
अस्पताल दूसरा घर और कभी न खत्म होने वाला डर
अस्पताल धीरे-धीरे दूसरा घर बन जाते हैं. दवाइयों की गंध, मशीनों की आवाजें और लंबा इंतजार, ये सब केयरगिवर्स के दिमाग पर गहरी छाप छोड़ते हैं. हर कीमो के साथ उम्मीद आती है और हर रिपोर्ट के साथ डर.
मजबूत दिखना पड़ता है, अंदर से हर दिन टूटता शरीर
रोज-रोज की जद्दोजहद के बीच इंसान को खुद के लिए और कैंसर पेशेंट्स के लिए मजबूत दिखना पड़ता है. लेकिन, हालात ऐसे होते हैं उनकी सारी रुचियां, इच्छाएं और शरीर सब टूट चुका होता है.
पैसा कैंसर का सबसे खामोश लेकिन खतरनाक दुश्मन...
इलाज का खर्च पहाड़ की तरह खड़ा हो जाता है. बचत खत्म हो जाती है, कर्ज बढ़ता जाता है. कई परिवार इलाज बीच में इसलिए नहीं छोड़ते कि वे हार मान लेते हैं, बल्कि इसलिए कि उनके पास कोई रास्ता नहीं बचता.
विश्व कैंसर दिवस पर एक जरूरी सवाल
कैंसर के केयरगिवर्स हर दिन मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक जंग लड़ते हैं. वे थकान के बावजूद प्यार करते हैं, टूटते हुए भी उम्मीद थामे रहते हैं. इस विश्व कैंसर दिवस पर सिर्फ मरीजों को नहीं, उनके परिवारों को भी देखिए.
क्योंकि कैंसर से बचना सिर्फ मरीज की कहानी नहीं है, यह उन परिवारों की भी कहानी है जो चुपचाप दर्द सहते हुए हर दिन साथ खड़े रहते हैं
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)













