डिजिटल तरक्की की भारी कीमत: जानें AI कैसे दुनिया के जल संकट को और गहरा कर रहा है

यह तकनीक न सिर्फ भारी मात्रा में बिजली की खपत करती है, बल्कि हमारे पीने के पानी पर भी बड़ा दबाव डाल रही है. ऐसे समय में, जब दुनिया की आधी आबादी पहले ही पानी की कमी से जूझ रही है, एआई की यह बढ़ती प्यास चिंता का विषय बनती जा रही है.

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टेक कंपनियों ने 2030 तक “वॉटर पॉजिटिव” बनने का लक्ष्य रखा है, यानी जितना पानी लेंगी उससे ज्यादा वापस लौटाने की कोशिश करेंगी.

How Much Water Does AI Consume : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई आज हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. चैटबॉट से लेकर तस्वीरें बनाने, वीडियो एडिटिंग, ट्रैफिक मैनेजमेंट और मेडिकल रिसर्च तक हर जगह एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. लेकिन इस डिजिटल सुविधा के पीछे एक ऐसा सच छिपा है, जिस पर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं. यह तकनीक न सिर्फ भारी मात्रा में बिजली की खपत करती है, बल्कि हमारे पीने के पानी पर भी बड़ा दबाव डाल रही है. ऐसे समय में, जब दुनिया की आधी आबादी पहले ही पानी की कमी से जूझ रही है, एआई की यह बढ़ती प्यास चिंता का विषय बनती जा रही है.

एआई कितना पानी इस्तेमाल करता है? (How Much Water Does AI Consume?)

ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन के मुताबिक, चैटजीपीटी से एक सवाल का जवाब पाने में लगभग एक चम्मच के पंद्रहवें हिस्से जितना पानी खर्च होता है. सुनने में यह आंकड़ा छोटा लग सकता है, लेकिन हकीकत कुछ और है.

वहीं, अमेरिका में की गई एक स्टडी बताती है कि GPT-3 मॉडल से 10 से 50 सवालों के जवाब देने में लगभग 500 मिलीलीटर पानी लगता है. यानी हर एक जवाब के लिए करीब 2 से 10 चम्मच पानी की खपत होती है.

इस फर्क की वजह यह है कि कुछ अनुमान केवल डेटा सेंटर की कूलिंग में इस्तेमाल होने वाले पानी को गिनते हैं, जबकि कुछ स्टडी में बिजली बनाने में लगने वाला पानी भी शामिल होता है.

एआई पानी का इस्तेमाल कैसे करता है? - How Does AI Use Water?

हम जो भी ऑनलाइन काम करते हैं, जैसे ईमेल भेजना, वीडियो देखना, सर्च करना या एआई से सवाल पूछना ये सब बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स में प्रोसेस होता है. ये डेटा सेंटर्स हजारों कंप्यूटर सर्वरों से भरे होते हैं और कई बार कई फुटबॉल मैदानों जितने बड़े होते हैं.

जब ये सर्वर लगातार काम करते हैं तो बहुत गर्म हो जाते हैं. इन्हें ठंडा रखने के लिए साफ और ताजे पानी का इस्तेमाल किया जाता है. कई कूलिंग सिस्टम में इस्तेमाल हुआ 80% तक पानी भाप बनकर उड़ जाता है, यानी वह दोबारा इस्तेमाल के लायक नहीं रहता.

एआई बनाम सामान्य इंटरनेट इस्तेमाल - AI vs Normal Internet Usage

एआई से जुड़े काम जैसे इमेज जनरेशन, वीडियो बनाना या कॉम्प्लेक्स टेक्स्ट तैयार करना सामान्य इंटरनेट सर्च या ऑनलाइन शॉपिंग के मुकाबले कहीं ज्यादा कंप्यूटिंग पावर मांगते हैं.

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इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, चैटजीपीटी पर एक सवाल पूछना, गूगल सर्च के मुकाबले करीब 10 गुना ज्यादा बिजली खर्च करता है. ज्यादा बिजली का मतलब ज्यादा गर्मी और फिर ज्यादा पानी की जरूरत.

एआई के कारण पानी की खपत कितनी तेजी से बढ़ रही है? (Rising Water Consumption Due to AI)

हालांकि टेक कंपनियां एआई से जुड़े पानी के इस्तेमाल का साफ आंकड़ा नहीं देतीं, लेकिन उनके कुल पानी उपयोग के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं.

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2020 के बाद से गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा के पानी इस्तेमाल में भारी इजाफा हुआ है. गूगल का पानी कंजंप्शन लगभग दोगुना हो चुका है.

IEA का अनुमान है कि 2030 तक डेटा सेंटर्स का पानी इस्तेमाल लगभग दोगुना हो जाएगा, जिसमें बिजली उत्पादन और चिप बनाने में लगने वाला पानी भी शामिल है.

सूखे इलाकों में डेटा सेंटर्स क्यों? - Why Data Centers Are Built in Dry Regions?

पिछले कुछ सालों में स्पेन, चिली, उरुग्वे और अमेरिका के एरिजोना जैसे सूखा प्रभावित इलाकों में डेटा सेंटर्स के खिलाफ विरोध देखने को मिला है. कंपनियों का कहना है कि इन इलाकों में जमीन सस्ती, बेहतर पावर इंफ्रास्ट्रक्चर और सोलर-विंड एनर्जी आसानी से उपलब्ध होती है. इसके अलावा, कम नमी वाले इलाकों में सर्वर में जंग लगने का खतरा भी कम होता है.
लेकिन समस्या यह है कि यही इलाके पानी की सबसे ज्यादा किल्लत झेल रहे हैं.

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क्या कूलिंग के और विकल्प हैं? - Alternative Cooling Solutions

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि ड्राई या एयर कूलिंग सिस्टम अपनाए जा सकते हैं, लेकिन इनमें पानी की जगह ज्यादा बिजली खर्च होती है. कुछ कंपनियां अब “क्लोज्ड लूप” सिस्टम पर काम कर रही हैं, जिसमें पानी बार-बार उड़ता नहीं बल्कि सिस्टम के अंदर ही घूमता रहता है. कुछ देशों में डेटा सेंटर्स से निकलने वाली गर्मी को घरों को गर्म रखने में भी इस्तेमाल किया जा रहा है.

फायदे बनाम पर्यावरण नुकसान - Benefits vs Environmental Cost

एआई का इस्तेमाल खतरनाक मीथेन गैस लीक ढूंढने, ट्रैफिक सुधारने और स्वास्थ्य सेवाओं में मदद के लिए हो रहा है. यूनिसेफ के थॉमस डेविन मानते हैं कि एआई शिक्षा और जलवायु समाधान में बड़ा बदलाव ला सकता है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बिना पारदर्शिता और सीमाओं के एआई का विस्तार पर्यावरण के लिए टिकाऊ यानी सस्टेनेबल नहीं है.

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इस संकट से निपटने का रास्ता (Finding a Way Out)

टेक कंपनियों ने 2030 तक “वॉटर पॉजिटिव” बनने का लक्ष्य रखा है, यानी जितना पानी लेंगी उससे ज्यादा वापस लौटाने की कोशिश करेंगी. लेकिन विशेषज्ञों का साफ कहना है कि जब तक पानी के इस्तेमाल की सही और पारदर्शी रिपोर्टिंग नहीं होगी, समस्या का समाधान मुश्किल है.
एआई भविष्य है, इसमें शक नहीं. लेकिन अगर यह भविष्य पानी के संकट को और गहरा करता है, तो हमें अभी से रुक कर सोचने की जरूरत है.



 

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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