अब अलग रंग-रूप में दिखेंगी एंटीबायोटिक दवाएं, सरकार का बड़ा फैसला, ताकि आप पहचान सकें सही दवा

एंटीबायोटिक दवाओं की ओवर-द-काउंटर बिक्री देश में एक गंभीर संकट हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर पैकिंग स्तर पर ही एंटीबायोटिक की पहचान सरल तरीके हो जाए तो यह व्यवहारिक बदलाव की दिशा में अहम कदम होगा.

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स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, यह कदम एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) के बढ़ते खतरे को देखते हुए उठाया जा रहा है.

Antibiotics packaging  and ales : केंद्र सरकार एंटीबायोटिक दवाओं के अत्याधिक और गलत इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए बड़ा कदम उठाने जा रही है.इसके लिए एंटीबायोटिक दवाओं को बाजार में अलग पहचान के साथ बेचने की तैयारी है जिससे जनता आसानी से समझ सके कि दी जा रही दवा एंटीबायोटिक है या नहीं. आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसाए, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) को दिशा निर्देश जारी करने के लिए कहा गया है. सरकार का प्रस्ताव है कि एंटीबायोटिक दवाओं की पैकिंग पर खास कोडिंग, रंग संकेत या स्पष्ट मार्किंग की जाए, जिससे मरीज और फार्मासिस्ट दोनों को दवा की क्लास तत्काल समझ में आ सके.

सरकार क्यों उठा रहीं कदम?

स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, यह कदम एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) के बढ़ते खतरे को देखते हुए उठाया जा रहा है. बार-बार और बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेने से बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो रहे हैं, जिससे सामान्य संक्रमण भी जानलेवा बनते जा रहे हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बीते दिनों पीएम नरेंद्र मोदी ने एंटीबायोटिक दवाओं के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए लोगों से इन दवाओं का इस्तेमाल बहुत अधिक जरूरत पड़ने पर ही करने की अपील की.

इन दवाओं की वजह से लोगों में प्रतिरोध विकसित हो रहा है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दिल्ली में एक 80 साल की महिला मरीज को 18 एंटीबायोटिक दवाएं देने के बावजूद एक भी दवा का असर नहीं हुआ. क्योंकि उस महिला ने बीमारी के चलते एंटीबायोटिक दवाओं का इतना सेवन कर लिया जिसकी वजह से रोगाणुरोधी प्रतिरोध विकसित हो गया.

यही वजह है कि सरकार अब राष्ट्रीय स्तर पर इन दवाओं के लिए जागरूकता अभियान शुरू करने जा रहीं है. सूत्रों का कहना है कि अभी बाजार में जो पैकिंग है उससे आम मरीज यह पहचान नहीं कर पाता कि दी गई दवा एंटीबायोटिक है या सामान्य पेनकिलर या सपोर्टिव मेडिसिन. इसी भ्रम का फायदा उठाकर कई जगह बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक खुलेआम बेची जा रही हैं.

इन विकल्पों पर किया जा रहा विचार

जानकारी के अनुसार, सरकार और सीडीएससीओ इस विकल्पों पर विचार कर रहें जिसमें एंटीबायोटिक दवाओं के लिए अलग रंग की पट्टी या बॉक्स, पैकिंग पर स्पष्ट चेतावनी या प्रतीक, क्यूआर कोड या अल्फान्यूमेरिक कोड, जिससे दवा की श्रेणी पहचानी जा सके शामिल हैं.

इसका मकसद यह है कि मरीज खुद भी सतर्क हो और बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेने से बचे. वहीं, केंद्र सरकार ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) से सरल भाषा में आम जनता के लिए संदेश तैयार करने के लिए भी कहा गया है. इन संदेशों का इस्तेमाल सभी जिलों में प्रशासन की ओर से सार्वजनिक मंचों पर किया जाएगा.

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दरअसल, एंटीबायोटिक दवाओं की ओवर-द-काउंटर बिक्री देश में एक गंभीर संकट हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर पैकिंग स्तर पर ही एंटीबायोटिक की पहचान सरल तरीके हो जाए तो यह व्यवहारिक बदलाव की दिशा में अहम कदम होगा. वहीं, चर्चा यह भी है कि अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो दवा कंपनियों को अपनी पैकिंग और लेबलिंग में बदलाव करना होगा. हालांकि सरकार का मानना है कि यह कदम उद्योग से ज्यादा जनस्वास्थ्य हित में है और लंबे समय में इलाज की लागत भी घटाएगा. सरकार का संकेत है कि सीडीएससीओ के साथ अंतिम सहमति बनने के बाद इस प्रस्ताव पर औपचारिक निर्देश जारी किए जाएंगे.

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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