Fatty Liver Lifestyle Changes: फैटी लिवर को अक्सर लोग मेडिकल रिपोर्ट की छोटी-सी गड़बड़ी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. क्योंकि शुरुआत में न दर्द होता है, न कोई खास लक्षण इसीलिए इसे साइलेंट डिजीज कहा जाता है. लेकिन यह साइलेंस खतरनाक हो सकता है. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यही समस्या आगे चलकर NASH (नॉन-अल्कोहोलिक स्टीटोहेपेटाइटिस), फाइब्रोसिस और यहां तक कि सिरोसिस जैसी गंभीर स्थितियों में बदल सकती है. सोशल मीडिया पर Runningradiologist नाम के पेज पर डॉक्टर हर्ष व्यास ने एक केस शेयर किया, जो सिर्फ वजन घटाने की कहानी नहीं, बल्कि मेटाबोलिक रिवर्सल की मिसाल है. उन्होंने बताया कि एक मरीज का पहला अल्ट्रासाउंड ग्रेड-2 फैटी लिवर दिखा रहा था. लेकिन 6 महीने बाद वही लिवर लगभग नॉर्मल नजर आया.
Add image caption here
सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि:
- उन्होंने कोई दवा नहीं ली थी.
- कोई महंगा सप्लीमेंट नहीं लिया गया.
- डाइट में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया.
सिर्फ दो चीजें एड की गईं और नतीजे चौंकाने वाले रहे.
क्या थे वे दो बदलाव?
1. हफ्ते में एक बार 24–36 घंटे का वाटर फास्ट
मरीज अपनी बेसल मेटाबोलिक रेट (BMR) के अनुसार ही कैलरी ले रहा था. डाइट संतुलित थी. बस हफ्ते में कम से कम एक बार 24 से 36 घंटे का वाटर फास्ट एड किया गया.
2. हफ्ते में 4–5 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग
सिर्फ वॉक या हल्की एक्सरसाइज नहीं, बल्कि मसल बिल्डिंग और रेजिस्टेंस ट्रेनिंग पर फोकस किया गया.
शरीर में क्या हुआ बदलाव?
फास्टिंग के दौरान
- जब आप लंबे समय तक नहीं खाते, तो शरीर पहले लिवर में जमा ग्लाइकोजन को एनर्जी के रूप में इस्तेमाल करता है.
- ग्लाइकोजन खत्म होते ही शरीर जमा फैट को तोड़ना शुरू करता है.
- लिवर में जमा ट्राइग्लिसराइड्स (फैट) कम होने लगते हैं.
यानि शरीर स्टोरेज मोड से फैट बर्निंग मोड में शिफ्ट हो जाता है.
स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का असर
- मसल्स अपना ग्लाइकोजन इस्तेमाल करती हैं.
- इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ती है.
- ग्लूकोज ज्यादा मसल्स में उपयोग होता है.
इससे एक्स्ट्रा ग्लूकोज लिवर में जाकर नया फैट नहीं बनाता. यानी फैटी लिवर की जड़ पर असर पड़ता है.
रिसर्च क्या कहती है?
साइंस डेली की एक रिपोर्ट में नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज़ वाले मरीजों में ग्लाइसेमिक, हेपेटिक, एंथ्रोपोमेट्रिक और क्लिनिकल मार्कर पर इंटरमिटेंट फास्टिंग के असर के बारे में बताया गया है. ऐसी ही कई क्लिनिकल ट्रायल्स की कई सिस्टमेटिक रिव्यू में पाया गया है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग से:
- लिवर फैट कम होता है.
- इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर होती है.
- SGPT/ALT जैसे लिवर एंजाइम घटते हैं.
- सूजन (इंफ्लेमेटरी मार्कर्स) कम होते हैं.
जब फास्टिंग को एक्सरसाइज के साथ जोड़ा गया, तो इंट्राहेपेटिक ट्राइग्लिसराइड में लगभग 5–6% तक कमी देखी गई. कुछ स्टडीज में सिर्फ 8–12 हफ्तों में फैटी लिवर स्कोर और BMI दोनों में सुधार पाया गया.
फैटी लिवर की कोई जादुई गोली नहीं है, अगर लाइफस्टाइल नहीं बदली, तो यह धीरे-धीरे NASH, फाइब्रोसिस और सिरोसिस की ओर बढ़ सकता है. शुरुआत में यह साइलेंट है, लेकिन आखिरी स्टेज बिल्कुल साइलेंट नहीं होती.
अगर आप बिगिनर हैं तो कैसे करें शुरुआत?
- 12–14 घंटे की फास्टिंग से शुरुआत करें.
- धीरे-धीरे 16 घंटे तक बढ़ाएं.
अगर आप पूरी तरह स्वस्थ हैं:
- मेडिकल सुपरविजन में 24 घंटे का फास्ट शुरू कर सकते हैं.
- हफ्ते में 1 बार या कम से कम 15 दिन में 1 बार.
साथ ही:
- हफ्ते में 4–5 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग.
- शुगर और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट कम करें
- बैलेंस डाइट लें.
यह सिर्फ वजन घटाने की कहानी नहीं थी, यह मेटाबोलिक हेल्थ की वापसी थी. मेडिकली मॉनिटर्ड फास्टिंग, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और बैलेंस डाइट मिलकर लिवर में फैटी बदलावों को तेजी से सुधार सकते हैं.
फैटी लिवर को हल्के में न लें. दवा से ज्यादा असरदार है आपका रूटीन. आज छोटे स्टेप लीजिए, ताकि कल आपको गंभीर बीमारी का सामना न करना पड़े.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)














