क्या आपको पता है Insulin का पहला इंजेक्शन किसे लगा था? आज ही के दिन रचा गया था इतिहास

11 जनवरी 1922 की यह घटना केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता नहीं थी, बल्कि यह मानव जिज्ञासा, अनुसंधान और करुणा की जीत थी. आज भी यह दिन चिकित्सा विज्ञान में आशा, नवाचार और जीवनरक्षा का प्रतीक माना जाता है.

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Insulin discovery : 11 जनवरी 1922 को लियोनार्ड थॉम्पसन को इंसुलिन की पहली खुराक दी गई.

First insulin injection : आज से करीब 100 साल पहले, अगर किसी को डायबिटीज (मधुमेह) हो जाती थी, तो उसे मौत का फरमान माना जाता था. उस वक्त डॉक्टरों के पास इसका कोई इलाज नहीं था. लेकिन 11 जनवरी 1922 को चिकित्सा जगत में एक ऐसा चमत्कार हुआ, जिसने करोड़ों लोगों की जिंदगी बदल दी. यह कहानी है उस पहली सुई की, जिसने मौत के मुंह में जा रहे एक 14 साल के बच्चे को नई जिंदगी दी थी।

लियोनार्ड थॉम्पसन: वो बच्चा जो इतिहास बन गया

 इस ऐतिहासिक उपलब्धि के केंद्र में था 14 वर्षीय लियोनार्ड थॉम्पसन, जो टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित था. उस दौर में डायबिटीज का कोई प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं था. मरीजों को बेहद सख्त डाइट पर रखा जाता था, जिससे वे धीरे-धीरे कमजोरी और कुपोषण का शिकार हो जाते थे. डॉक्टरों के पास बीमारी को रोकने या नियंत्रित करने का कोई ठोस उपाय नहीं था. ऐसे में लियोनार्ड थॉम्पसन की हालत भी तेजी से बिगड़ रही थी और जीवन की उम्मीद लगभग समाप्त हो चुकी थी.

चार वैज्ञानिकों की मेहनत लाई रंग

इसी समय कनाडा के टोरंटो विश्वविद्यालय में डॉक्टर फ्रेडरिक बैंटिंग और उनके सहयोगी चार्ल्स बेस्ट, जेम्स कॉलिप और जॉन मैकलियोड एक ऐसे हार्मोन पर काम कर रहे थे, जिसे अग्न्याशय (पैंक्रियास) से निकाला गया था. इस हार्मोन को बाद में 'इंसुलिन' नाम दिया गया. कई असफल प्रयोगों और तकनीकी कठिनाइयों के बाद वैज्ञानिक एक शुद्ध रूप में इंसुलिन तैयार करने में सफल हुए.

रातों-रात बदली दुनिया

11 जनवरी 1922 को लियोनार्ड थॉम्पसन को इंसुलिन की पहली खुराक दी गई. शुरुआती परिणाम पूरी तरह आदर्श नहीं थे, लेकिन कुछ ही दिनों में सुधरे हुए इंसुलिन ने चमत्कारी असर दिखाया. मरीज के रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रित होने लगा, उसकी हालत में तेजी से सुधार आया, और वह मौत के मुहाने से वापस लौट आया. यह क्षण चिकित्सा इतिहास का निर्णायक मोड़ बन गया.

इस सफलता के बाद इंसुलिन का उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू हुआ और जल्द ही यह दुनिया भर में मधुमेह के इलाज का आधार बन गया. जो बीमारी कभी लाइलाज मानी जाती थी, वह अब नियंत्रित की जा सकने वाली स्थिति बन गई. लाखों मरीजों को एक सामान्य, सक्रिय और लंबा जीवन जीने का अवसर मिला.

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11 जनवरी 1922 की यह घटना केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता नहीं थी, बल्कि यह मानव जिज्ञासा, अनुसंधान और करुणा की जीत थी. आज भी यह दिन चिकित्सा विज्ञान में आशा, नवाचार और जीवनरक्षा का प्रतीक माना जाता है.

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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