करियर, महंगाई और तनाव! दिल्ली का बर्थ रेट गिरकर 14 पहुंचा, जानें बच्चे कम पैदा होने के पीछे की सच्चाई

Delhi Birth Rate: आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि दिल्ली एक बड़े डेमोग्राफिक बदलाव (Demographic Transition) के दौर से गुजर रही है, जिसका सीधा असर भविष्य की सेहत और सामाजिक ढांचे पर पड़ सकता है.

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साल 2024 में दिल्ली की बर्थ रेट घटकर 14 प्रति हजार जनसंख्या रह गई है.

देश की राजधानी दिल्ली हमेशा से तेज रफ्तार जिंदगी, बेहतर मेडिकल सुविधाओं और आधुनिक सोच के लिए जानी जाती रही है. लेकिन, अब दिल्ली से जुड़ा एक ऐसा आंकड़ा सामने आया है, जिसने हेल्थ एक्सपर्ट्स और नीति-निर्माताओं दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. एनसीटी दिल्ली सरकार की आधिकारिक रिपोर्ट, दिल्ली में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण पर वार्षिक रिपोर्ट – 2024 और दिल्ली का डेमोग्राफिक स्वास्थ्य, रजिस्टर्ड जन्म और मृत्यु का विश्लेषण 2024 के अनुसार, साल 2024 में दिल्ली की बर्थ रेट घटकर 14 प्रति हजार जनसंख्या रह गई है. यह न सिर्फ पिछले साल से कम है, बल्कि देश के औसत से भी काफी नीचे है.

यह आंकड़ा साफ संकेत देता है कि दिल्ली एक बड़े डेमोग्राफिक बदलाव (Demographic Transition) के दौर से गुजर रही है, जिसका सीधा असर भविष्य की सेहत और सामाजिक ढांचे पर पड़ सकता है.

क्यों गिर रही है दिल्ली की बर्थ रेट?

हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह बदलती लाइफस्टाइल है. आज के युवा पहले करियर, आर्थिक स्थिरता और बेहतर जीवन स्तर को प्राथमिकता दे रहे हैं. शादी की उम्र बढ़ रही है और बच्चे करने का फैसला और भी देर से लिया जा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में ज्यादातर महिलाएं 25 से 29 साल की उम्र में पहली बार मां बन रही हैं, जबकि कम उम्र में मां बनने के मामले लगातार घट रहे हैं.

छोटे परिवार की बढ़ती सोच

डेटा बताता है कि 2024 में दिल्ली में 50 प्रतिशत से ज्यादा जन्म पहले बच्चे के रूप में दर्ज हुए. यानी लोग दो या तीन बच्चों के बजाय एक या ज्यादातर दो बच्चों तक ही सीमित रहना चाह रहे हैं. इसकी वजह बढ़ती महंगाई, बच्चों की पढ़ाई का खर्च, हेल्थकेयर की लागत और बेहतर परवरिश की चाह मानी जा रही है.

सेहत पर क्या पड़ता है असर?

गिरती बर्थ रेट का असर सिर्फ जनसंख्या पर नहीं, बल्कि हेल्थ सिस्टम पर भी पड़ता है. कम जन्म का मतलब है कि आने वाले वर्षों में बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ेगा. रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में पहले से ही 65 साल से ऊपर के लोगों में मौतों का प्रतिशत 40% से ज्यादा है. ऐसे में भविष्य में जेरियाट्रिक केयर, हार्ट डिजीज, डायबिटीज और दूसरी उम्र से जुड़ी बीमारियों का बोझ बढ़ सकता है.

महिलाओं की शिक्षा और जागरूकता

रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि महिलाओं की शिक्षा का सीधा संबंध कम बच्चों से है. पढ़ी-लिखी महिलाएं परिवार नियोजन को बेहतर तरीके से समझती हैं और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देती हैं. यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसके साथ ही गिरती बर्थ रेट पर संतुलन बनाना भी जरूरी है.

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क्या यह चिंता की बात है?

हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि गिरती बर्थ रेट अपने आप में बुरी नहीं है, लेकिन अगर यह लगातार बहुत नीचे जाती रही तो वर्किंग पॉपुलेशन घटने, हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव बढ़ने और सामाजिक संतुलन बिगड़ने का खतरा हो सकता है.

आगे क्या करना जरूरी है?

जरूरत है कि सरकार और समाज मिलकर ऐसी नीतियां बनाएं, जो वर्क-लाइफ बैलेंस, मैटरनिटी सपोर्ट, चाइल्ड केयर फैसिलिटी और हेल्थ सिक्योरिटी को मजबूत करें. इससे लोग बिना डर और दबाव के परिवार बढ़ाने का फैसला कर सकें.

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कुल मिलाकर, दिल्ली की 14 की बर्थ रेट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलती सोच और लाइफस्टाइल का आईना है. समय रहते संतुलन बनाना ही आने वाली पीढ़ियों की सेहत और भविष्य के लिए सबसे जरूरी कदम होगा.

(यह लेख दिल्ली में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण पर वार्षिक रिपोर्ट - 2024 और दिल्ली का जनसांख्यिकीय स्वास्थ्य: पंजीकृत जन्म और मृत्यु का विश्लेषण, 2024 (अर्थशास्त्र और सांख्यिकी निदेशालय और मुख्य रजिस्ट्रार, जन्म और मृत्यु कार्यालय, एनसीटी दिल्ली सरकार) में आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है.)

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