Low Light Kids Eyesight: आजकल अगर किसी स्कूल की क्लास में नजर दौड़ाएं तो आधे से ज्यादा बच्चे चश्मा लगाए दिख जाते हैं. पहले मायोपिया (नजदीक की चीज साफ, दूर की धुंधली) को परिवार से जुड़ी समस्या माना जाता था, लेकिन अब यह वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती महामारी बन चुकी है. इंटरनेशनल मायोपिया इंस्टीट्यूट के अनुसार, अभी दुनिया की लगभग 30% आबादी मायोपिक है और 2050 तक यह आंकड़ा करीब 50% तक पहुंच सकता है. अब तक इसका मुख्य कारण बढ़ता स्क्रीन टाइम माना जा रहा था. लेकिन, एक नई रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती दी है. यह अध्ययन अमेरिका के SUNY कॉलेज ऑफ ऑप्टोमेट्री के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया और जर्नल सेल रिपोर्ट में प्रकाशित हुआ. इस शोध के अनुसार, समस्या सिर्फ स्क्रीन नहीं, बल्कि कम रोशनी में लंबे समय तक नजदीक से काम करना हो सकती है.
मायोपिया आखिर है क्या?
मायोपिया में व्यक्ति को पास की चीजें साफ दिखाई देती हैं, लेकिन दूर की चीजें धुंधली दिखती हैं. यह समस्या आमतौर पर बचपन और किशोरावस्था में शुरू होती है. इसे चश्मे, कॉन्टैक्ट लेंस या लेजर सर्जरी से ठीक किया जा सकता है, लेकिन सवाल यह है यह इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है?
स्टडी क्या कहती है?
सीनियर रिसर्चर जोस-मनुएल अलोंसो के अनुसार, मायोपिया के पीछे एक बड़ा कारण यह हो सकता है कि आंख की रेटिना तक पर्याप्त रोशनी नहीं पहुंच पा रही. जब हम तेज धूप में बाहर होते हैं, तो पुतली (pupil) सिकुड़ती है ताकि आंख सुरक्षित रहे, लेकिन फिर भी रेटिना तक भरपूर रोशनी पहुंचती है. लेकिन, जब हम घर के अंदर कम रोशनी में मोबाइल, टैबलेट या किताब को लंबे समय तक नजदीक से देखते हैं, तो पुतली दो कारणों से सिकुड़ती है:
1. नजदीक फोकस करने के लिए.
2. रोशनी कम होने के बावजूद फोकस तेज करने के लिए.
इस स्थिति में रेटिना तक रोशनी कम पहुंचती है. लंबे समय तक ऐसा होने से आई ग्रोथ पर असर पड़ सकता है.
नई थ्योरी क्या बताती है?
शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर रेटिना को एडिक्वेट लाइट स्टिमुलेशन (Stimulation) नहीं मिलती, तो आंख के न्यूरल सिग्नलिंग सिस्टम कमजोर पड़ सकते हैं. इससे आंख की लंबाई बढ़ सकती है, जो मायोपिया का मुख्य कारण है.
स्टडी में यह भी पाया गया कि:
- नेगेटिव (माइनस) लेंस पुतली को और सिकोड़ सकते हैं.
- कम दूरी से लंबे समय तक देखने पर यह प्रभाव और बढ़ जाता है.
- पहले से मायोपिक आंखों में यह समस्या ज्यादा गंभीर हो सकती है.
- पलक झपकने से जुड़ी पुतली की प्रतिक्रिया भी मायोपिया में कम पाई गई.
बाहर समय बिताना क्यों फायदेमंद?
पहले से यह साबित हो चुका है कि जो बच्चे ज्यादा समय बाहर धूप में बिताते हैं, उनमें मायोपिया का खतरा कम होता है. इस नई स्टडी के अनुसार, तेज प्राकृतिक रोशनी पुतली को रोशनी के कारण सिकोड़ती है, न कि सिर्फ फोकस के कारण. इससे रेटिना को पर्याप्त प्रकाश मिलता है और आंख का बैलेंस रहती है.
इलाज और नई सोच
मायोपिया के इलाज में एट्रोपिन आई ड्रॉप्स, मल्टीफोकल लेंस और खास ऑप्टिकल डिजाइन का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन, वैज्ञानिक अब तक यह नहीं समझ पाए थे कि ये अलग-अलग तरीके क्यों काम करते हैं.
नई थ्योरी कहती है कि ये सभी तरीके पुतली के सिकुड़ने और फोकसिंग के तनाव को कम करते हैं, जिससे रेटिना तक रोशनी बेहतर पहुंचती है. हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अंतिम निष्कर्ष नहीं है, लेकिन यह एक मजबूत और टेस्ट करने योग्य परिकल्पना है.
भारत के लिए क्या मायने?
भारत में खासकर शहरी बच्चों में स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ा है. ऑनलाइन पढ़ाई, मोबाइल गेम्स और सोशल मीडिया ने बच्चों को घंटों घर के अंदर बैठा दिया है. अगर यह नई थ्योरी सही है, तो हमें सिर्फ स्क्रीन कम करने पर नहीं, बल्कि घर की रोशनी बेहतर करने पर भी ध्यान देना होगा.
क्या कर सकते हैं?
- पढ़ाई या मोबाइल इस्तेमाल करते समय कमरे में पर्याप्त रोशनी रखें.
- रोजाना कम से कम 1–2 घंटे बाहर प्राकृतिक धूप में बिताएं.
- नजदीक से लंबे समय तक देखने के बीच-बीच में ब्रेक लें (20-20-20 नियम अपनाएं).
- जरूरत हो तो डॉक्टर की सलाह से एट्रोपिन ड्रॉप्स या विशेष लेंस का उपयोग करें.
मायोपिया सिर्फ ज्यादा मोबाइल देखने की समस्या नहीं हो सकती. कम रोशनी में लंबे समय तक नजदीक फोकस करना भी बड़ा कारण बन सकता है. यह अध्ययन हमें एक नई दिशा देता है, जहां स्क्रीन के साथ-साथ रोशनी और विजुअल आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)














