भारतीयों के लिए कौन सा नमक सबसे बेस्ट है? पिंक या व्हाइट सॉल्ट कौन सा खाएं, न्यूट्रिशनिस्ट ने बताया जवाब

Healthy Salt Options: राशी चौधरी साफ कहती हैं नमक सिर्फ मसाला नहीं है, यह थायरॉइड की नींव है. इसलिए सही नमक चुनना बहुत जरूरी है. आइए एक्सपर्ट से जानते हैं सही नमक कैसे चुनें.

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Healthy Salt: सबसे अनदेखा किया जाने वाला विकल्प आयोडाइज्ड नमक.

Pink Salt vs White Salt: यह सवाल सुनने में बहुत साधारण लगता है कौन सा नमक सबसे अच्छा है? लेकिन इसके पीछे सेहत से जुड़ा एक बड़ा सच छिपा है. आजकल कई भारतीय घरों में गुलाबी नमक, सेंधा नमक या क्लीन कहे जाने वाले दूसरे विकल्प तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. लोग मानते हैं कि ये ज्यादा प्राकृतिक हैं और इसलिए ज्यादा हेल्दी भी होंगे. लेकिन, क्या वाकई ऐसा है? इसी सवाल का जवाब देने की कोशिश की है न्यूट्रिशनिस्ट राशि चौधरी ने, जिन्होंने हाल ही में इंस्टाग्राम पर इस विषय पर एक अहम पोस्ट शेयर की.

नमक सिर्फ स्वाद नहीं, शरीर की जरूरत है

हम भारतीय रसोई में नमक को बहुत हल्के में लेते हैं. खाना बनाते वक्त बस चुटकी भर डाल दिया और बात खत्म. लेकिन, नमक सिर्फ स्वाद बढ़ाने का काम नहीं करता. यह हमारे शरीर के कई जरूरी कामों से जुड़ा है, खासकर थायरॉइड हार्मोन से. थायरॉइड सही तरीके से काम करे, इसके लिए शरीर को आयोडीन की जरूरत होती है और आयोडीन का सबसे बड़ा स्रोत आम लोगों के लिए आयोडाइज्ड नमक है.

पिंक सॉल्ट, दिखने में अच्छा, फायदे सीमित

राशी चौधरी सबसे पहले पिंक रॉक सॉल्ट की बात करती हैं. यह नमक ट्रेस मिनरल्स जैसे आयरन, पोटैशियम और मैग्नीशियम जरूर देता है. लेकिन, यहां एक बड़ा पेंच है. लैब रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन मिनरल्स का कोई ठोस फायदा पाने के लिए आपको रोज करीब 30 ग्राम (लगभग 6 चम्मच) नमक खाना पड़ेगा, जो न तो सुरक्षित है और न ही संभव. सबसे अहम बात पिंक सॉल्ट में आयोडीन बिल्कुल नहीं होता. यानी यह थायरॉइड हेल्थ को सपोर्ट नहीं करता.

इलेक्ट्रोलाइट्स के लिए ठीक, थायरॉइड के लिए नहीं

इसके बाद वह सेल्टिक सॉल्ट की बात करती हैं, जिसे वह खुद इलेक्ट्रोलाइट्स के लिए पसंद करती हैं. इसमें मैग्नीशियम और कैल्शियम ज्यादा होता है, जिससे कुछ लोगों को हाइड्रेशन बेहतर लग सकता है. लेकिन, यहां भी वही समस्या है आयोडीन की कमी. यानी यह भी अकेले थायरॉइड के लिए पर्याप्त नहीं है.

आयोडाइज्ड नमक, साधारण लेकिन सबसे असरदार

अब आता है सबसे अनदेखा किया जाने वाला विकल्प आयोडाइज्ड नमक. यह भले ही दिखने में फैंसी न हो, लेकिन इसका असर सबसे गहरा है. सिर्फ 1 ग्राम आयोडाइज्ड नमक में करीब 30 माइक्रोग्राम आयोडीन होता है. एक चम्मच नमक रोज की आयोडीन जरूरत का लगभग आधा हिस्सा पूरा कर देता है.

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राशी चौधरी एक अहम इतिहास भी याद दिलाती हैं. 1950 से 70 के दशक में भारत में 3 करोड़ से ज्यादा लोग घेंघा (goitre) से पीड़ित थे. 1983 में जब यूनिवर्सल सॉल्ट आयोडाइजेशन प्रोग्राम शुरू हुआ, तो एक दशक के भीतर थायरॉइड से जुड़ी बीमारियों में 70% से ज्यादा गिरावट आई. उनके शब्दों में एक नीति और एक साधारण नमक ने पूरे देश की थायरॉइड हेल्थ बना दी.

आज के समय में यह क्यों जरूरी है?

राशी चौधरी बताती हैं कि ज्यादातर भारतीयों की डाइट में आयोडीन के दूसरे स्रोत जैसे सी फिश, सीवीड, अंडे या डेयरी रेगुलर रूप से शामिल नहीं होते. ऐसे में अगर कोई बिना विकल्प के आयोडाइज्ड नमक छोड़ देता है, तो शरीर चुपचाप एडजस्ट करता है. धीरे-धीरे थकान, ठंड ज्यादा लगना, वजन बढ़ना, बाल झड़ना, ब्रेन फॉग और लो मूड जैसे लक्षण दिखने लगते हैं. कई बार T3 और T4 रिपोर्ट नॉर्मल रहती हैं, इसलिए समस्या पकड़ में ही नहीं आती.

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सही रास्ता क्या है?

न्यूट्रिशनिस्ट ने सुझाव दिया है कि खाना पकाने के लिए आयोडाइज्ड नमक इस्तेमाल करें, ताकि आयोडीन की जरूरत पूरी हो. Celtic या पिंक सॉल्ट को सीमित मात्रा में सलाद या नींबू पानी में स्वाद और इलेक्ट्रोलाइट्स के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. सुंदर पैकेजिंग या ट्रेंड के चक्कर में शरीर की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज न करें.

आखिर में, राशी चौधरी साफ कहती हैं नमक सिर्फ मसाला नहीं है, यह थायरॉइड की नींव है. सही नमक चुनना फैशन का नहीं, फिजियोलॉजी का फैसला होना चाहिए और अगर शक हो, तो अंदाजा लगाने के बजाय पूरा थायरॉइड पैनल टेस्ट कराना ही समझदारी है.

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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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