Vikat Sankashti Chaturthi Katha: वैशाख मास की संकष्टी चतुर्थी पौराणिक कथा, भगवान गणेश का मिलेगा आशीर्वाद

Vikat Sankashti Chaturthi Katha: विकट संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के वक्रतुंड रूप की पूजा की जाती है. इस दिन व्रत भी रखा जाता है. इस व्रत से जुड़ी दो प्रमुख पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं.

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विकट संकष्टी चतुर्थी कथा
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Vikat Sankashti Chaturthi Katha: वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की विकट संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के वक्रतुंड रूप की पूजा की जाती है. यह व्रत दुखों को दूर करने वाला माना जाता है, जिसमें चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत तोड़ा जाता है. इस दिन विशेष रूप से कमल गट्टे का हलवा भोग में शामिल करने की मान्यता है. इस व्रत से जुड़ी दो प्रमुख पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. चलिए आपको बताते हैं वैशाख मास की संकष्टी चतुर्थी पौराणिक कथा, जिसे पढ़ने से भगवान गणेश जी का आशीर्वाद मिलता है.

संकष्टी चतुर्थी पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में कामासुर नाम के एक शक्तिशाली दैत्य ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर 'अजेय' होने का वरदान प्राप्त कर लिया था. वरदान पाकर कामासुर अत्यंत अभिमानी हो गया और उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को बंदी बना लिया. जब दुखी होकर देवता भगवान शिव के पास गए, तो उन्होंने बताया कि कामासुर का अंत केवल विघ्नहर्ता गणेश ही कर सकते हैं. देवताओं की प्रार्थना पर भगवान गणेश ने अत्यंत विशाल और तेजस्वी 'विकट' रूप धारण किया और मोर पर सवार होकर युद्ध के लिए निकले.

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गणेश जी के इस भयानक रूप को देखकर कामासुर भयभीत हो गया और उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगी. भगवान गणेश ने उसका घमंड नष्ट कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्त कराया. जिस दिन यह विजय प्राप्त हुई, वह वैशाख मास की चतुर्थी थी, इसलिए इसे 'विकट संकष्टी चतुर्थी' कहा जाता है.

दूसरी पौराणिक कथा

वहीं दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में रंतिदेव नाम के एक अत्यन्त कीर्तिमान एवं पराक्रमी राजा थे. जिस प्रकार अग्नि तृण समूहों को भस्म कर देती है उसी प्रकार वे अपने शत्रुओं को नष्ट कर देते थे. रंतिदेव की मित्रता यम, कुबेर, इन्द्र आदि देवताओं से थी. उन्हीं के राज्य में धर्मकेतु नाम के एक उत्तम ब्राह्मण निवास करते थे. उनकी दो धर्मपत्नियां थीं जिनका नाम सुशीला एवं चञ्चला था.

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सुशीला भगवान गणेश की अनन्य भक्त थी और हमेशा व्रत-उपवास करती थी, जिससे उसका शरीर दुर्बल हो गया था. वहीं चंचला कोई व्रत नहीं करती थी और सुशीला को ताने देती थी कि उसने व्रत करके अपना शरीर खराब कर लिया और फिर भी उसे केवल एक कन्या प्राप्त हुई, जबकि चंचला को पुत्र रत्न मिला था. गणेश जी का वरदान: सुशीला ने दुखी होकर वैशाख संकष्टी चतुर्थी का विधि-विधान से व्रत किया. उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उसे दर्शन दिए और वरदान दिया कि उसकी कन्या के मुख से निरंतर मोती और मूंगा झड़ते रहेंगे और उसे जल्द ही एक विद्वान पुत्र भी प्राप्त होगा. सुशीला की समृद्धि देखकर चंचला को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने सुशीला से क्षमा मांगी. बाद में चंचला ने भी यह व्रत किया और दोनों के घर में सुख-शांति बनी रही.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
 

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