Guru Ravidas Ji Ke Doe: सनातन परंपरा में माघ मास की पूर्णिमा को न सिर्फ स्नान-दान से जुड़ी माघी पूर्णिमा व्रत के लिए बल्कि जाने-माने संत और समाज सुधारक संत रविदास की जयंती के लिए भी जाना जाता है. गुरु रविदास जिन्हें रैदास भी कहा जाता है, उन्होंने अपनी भक्ति आंदोलन के जरिए समाज के भेद-भाव को दूर करने का बीड़ा उठाया था. संत रविदास ने लोगों को मन की ताकत को समझाते हुए अपने दोहों के जरिए जो सीख दी, वो आज भी लोगों को जीवन जीने की सही दिशा प्रदान कर रही है. आइए उन दोहों को पढ़कर उनका सही अर्थ जानने और समझने का प्रयास करते हैं.
1. मन चंगा तो कठौती में गंगा
संत रविदास जी का यह सबसे प्रसिद्ध दोहा है, जिसके जरिए वे प्रत्येक इंसान को मन की ताकत को समझाने का प्रयास कर रहे हैं. इस दोहे के जरिए संत रविदास कहते हैं कि जिस इंसान का मन पवित्र और निर्मल होता है, वह कोई भी छोटा या बड़ा कार्य करता हो, उसे गंगा की तरह पवित्र और पूजनीय होता है.
2. ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय.
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥
संत रविदास जी इस दोहे के जरिए दुनिया को बताने का प्रयास कर रहे हैं कि आदमी अपने वाणी और व्यवहार से पूरे जग को जीत सकता है. संत रविदास कहते हैं कि हमें जब हम लोगों से विनम्रता के साथ मधुर वचन बोलते हैं तो न सिर्फ दूसरों को शांति मिलती है, बल्कि स्वयं को भी सुख मिलता है.
3. करम बंधन में बन्ध रहियो फल की ना तज्जियो आस
कर्म मानुष का धर्म है सत् भाखै रविदासण.
संत रविदास जी इस दोहे के जरिए जग को सीख देते हैं कि व्यक्ति को अपने कार्य को ईमानदारी के साथ करते रहना चाहिए और फल की इच्छा नहीं करना चाहिए क्योंकि कर्म करना ही व्यक्ति का धर्म है, जबकि फल व्यक्ति के भाग्य पर निर्भर करता है.
4. का मथुरा का द्वारका, का काशी हरिद्वार.
रैदास खोजा दिल आपना, तउ मिलिया दिलदार.
संत रविदास जी इस दोहे के जरिए समझाना चाहते हैं कि हरिद्वार और काशी जैसे तीर्थों से पहले व्यक्ति को अपने मन में ईश्वर को खोजना चहिए क्योंकि सच्चे मन में ही प्रभु का वास होता है. संत रविदास के अनुसार बाहरी आडंबर की बजाय व्यक्ति आत्मज्ञान से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है.
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5. कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै
संत रविदास जी कहते हैं कि ईश्वर की भक्ति व्यक्ति को बड़े सौभाग्य से प्राप्त होती है, लेकिन यह उसी की सफल होती है जो अभिमानरहित होता है. यदि आपके भीतर तिल मात्र भी अभिमान नहीं है तो बड़ी आसानी से आप सफल होते हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे एक बड़ा हाथी चीनी के दाने को नहीं उठा पाता है, लेकिन एक चींटी उसे बड़ी आसानी से इकट्ठा करके चलती है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)














