Shukra Pradosh Vrat Ki Puja Vidhi: पंचांग के अनुसार आज माघ मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि है. हिंदू धर्म में इस पावन तिथि को प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है. ऐसे में आज जनवरी महीने का दूसरा और माघ मास का पहला प्रदोष व्रत रखा जाएगा. चूंकि शिव पूजा के लिए अत्यंत ही शुभ और पुण्यदायी मानी जाने वाली त्रयोदशी शुक्रवार के दिन पड़ रही है, इसलिए इसे शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाएगा. आइए औघड़दानी कहलाने वाले भगवान भोलेनाथ की पूजा से जुड़ी उस सरल पूजा विधि के बारे में जानते हैं, जिसे करते ही महादेव का आशीर्वाद बरसता है.
कब करें शुक्र प्रदोष व्रत की पूजा
पंचांग के अनुसार आज शुक्र प्रदोष व्रत की पूजा के लिए सबसे उत्तम समय जिसे प्रदोष काल कहा जाता है, वह सायंकाल 05:43 से प्रारंभ होकर रात्रि को 08:19 तक रहेगा. ऐसे में शुक्र प्रदोष व्रत की पूजा के लिए आज शिव भक्तों को कुल 02 घंटे 36 मिनट मिलेंगे.
शुक्र प्रदोष व्रत की पूजा विधि
शुक्र प्रदोष व्रत का पुण्यफल पाने के लिए आज शिव साधक को दिन में दो बार शिव भगवान का पूजन करना चाहिए. पहली पूजा प्रात:काल स्नान-ध्यान करने के बाद इस व्रत को विधि-विधान से संकल्प लेने के बाद करनी चाहिए फिर दूसरी पूजा सूर्यास्त और रात्रि के संधिकाल यानि प्रदोष काल के समय करनी चाहिए. हिंदू मान्यता के अनुसार प्रदोष काल के समय भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की पूजा विधि-विधान से करने के लिए साधक को तन-मन से पवित्र होकर सबसे पहले महादेव को गंगाजल अर्पित करना चाहिए.
इसके बाद महादेव को बिल्ब पत्र, शमीपत्र, धतूरा, भांग, फल-फूल, धूप-दीप, मिष्ठान आदि अर्पित करने के बाद प्रदोष व्रत की कथा कहनी चाहिए. कथा को कहने या श्रवण करने के बाद रुद्राक्ष की माला से शिव मंत्र का जप करना चाहिए. पूजा के अंत में महादेव की आरती करें और सभी को प्रसाद बांटकर स्वयं भी ग्रहण करें.
शुक्र प्रदोष व्रत की कथा
मान्यता है कि एक नगर में निर्धन विधवा ब्राह्मणी भिक्षा मांगकर अपना गुजारा किया करती थी. एक दिन जब वह भिक्षा मांग रही थी तो उसकी मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हुई. वह राजकुमार उस समय पितृशोक के कारण अत्यंत ही परेशान था. राजकुमार की स्थिति को देखकर उस विधवा ब्राह्मणी को दया आई और वह उसे अपने साथ घर ले गई. इसके बाद वह उसे अपना बेटा मानकर उसे पालने लगी. एक दिन उस निर्धन ब्राह्मणी की मुलाकात शांडिल्य ऋषि से हुई.
तब उसने अपने कष्टों से मुक्ति पाने का उनसे उपाय पूंछा. शांडिल्य ऋषि ने उसे देवों के देव महादेव का आशीर्वाद बरसाने वाले प्रदोष व्रत करने को कहा. इसके बाद उस विधवा ब्राह्मणी ने प्रदोष व्रत को विधि-विधान से करना प्रारंभ किया. मान्यता है कि प्रदोष व्रत के पुण्यफ प्रभाव से उसकी निर्धनता दूर हो गई और एक समय ऐसा भी आया जब शिव कृपा से राजकुमार को अपना राजपाट वापस मिल गया. जिस प्रकार विधवा ब्राह्मणी और राजकुमार के कष्ट दूर हुए, वैसे ही महादेव की कृपा से सभी के कष्ट दूर हों और सभी सुखी हों.
प्रदोष व्रत का फल
रवि प्रदोष व्रत - सुख-सौभाग्य, आरोग्य और लंबी आयु
सोम प्रदोष व्रत - सभी कामनाओं की पूर्ति
मंगल प्रदोष व्रत - रोग-शोक, कष्टों और पापों से मुक्ति
बुध प्रदोष व्रत - बुद्धि, विवेक और बड़े कार्यों में सिद्धि
गुरु प्रदोष व्रत - शत्रुओं पर विजय और सुख-सौभाग्य
शुक्र प्रदोष व्रत - सुख-समृद्धि और सुखी दांपत्य जीवन
शनि प्रदोष व्रत - संतान सुख और सभी प्रकार से कल्याणकारक
प्रदोष व्रत के लाभ
हिंदू मान्यता के अनुसार प्रदोष व्रत को करने वाले साधक पर हर समय शिव कृपा बनी रहती है और उसे जीवन में किसी भी प्रकार का रोग, शोक नहीं रहता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार इस व्रत का सबसे चंद्र देवता ने करके पुण्यलाभ प्राप्त किया था. प्रदोष व्रत के शुभ प्रभाव से चंद्र देवता का क्षय रोग दूर हो गया था. हिंदू मान्यता के अनुसार प्रदोष व्रत को करने से 100 गायों के दान का पुण्यफल प्राप्त होता है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)














