Maa Durga Ne Mahishasur ka Vadh Kaise Kiya: चैत्र नवरात्रि का आज दूसरा दिन है. माता की भक्ति के इन नौ दिनों में भक्त पूजा-पाठ माता के पुण्य दर्शन और शक्ति की आराधना में लीन रहते हैं. श्रीमद देवीभागवतम् में माता की महिमा का महर्षि वेद व्यास ने विस्तार से वर्णन किया है. इन्हीं पौराणिक कथाओं में एक अध्याय है महिषासुर के वध का. महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था, जिसे ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु न तो किसी देवता से होगी, न मानव से और न ही किसी पशु से. उसे विश्वास था कि कोई 'स्त्री' तो उसे कभी मार ही नहीं पाएगी, इसलिए उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर इंद्र सहित सभी देवताओं को वहां से निकाल दिया.
यह भी पढ़ें: Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि में किस देवी की पूजा से कौन सी पूरी होती है कामना?
मां दुर्गा का प्राकट्य
परेशान देवगण ब्रह्मा जी के नेतृत्व में भगवान विष्णु और महादेव के पास पहुंचे. देवताओं का कष्ट सुनकर त्रिदेवों और अन्य देवताओं के शरीर से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई, जिससे मां दुर्गा का प्राकट्य हुआ.
देवी दुर्गा को भगवान शिव ने त्रिशूल दिया. भगवान विष्णु ने चक्र दिया तो इंद्र ने वज्र और वरुण ने शंख दिया. हिमालय ने देवी को सवारी के लिए सिंह भेंट किया. श्रीमद देवीभागवतम् के 5वें खंड के 18वें अध्याय में महिषासुर के वध का पूरा वर्णन है. महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित 18 हजार श्लोकों के इस महापुराण में जो कथा है वो इस प्रकार है.
महिषासुर युद्धक्षेत्र में पूरे दलबल के साथ देवी दुर्गा से लड़ने पहुंचा. पहले उसने अपनी मीठी-मीठी बातों से देवी को अपने पक्ष में करना चाहा, लेकिन देवी ने उसे साफ कहा कि हे मूर्ख! या तो पाताल लोक में जा या युद्ध कर. हे राक्षस! जब भी धर्मात्माओं को इस पृथ्वी पर कष्ट भोगना पड़ता है, मैं उनकी रक्षा के लिए रूप धारण करती हूं. देवताओं ने तुम्हारे नाश के लिए मुझसे प्रार्थना की है, इसलिए मैं तुम्हें मारने तक चैन से नहीं बैठूंगी. इसलिए या तो युद्ध करो या असुरों के धाम पाताल में जाओ.
देवी की बातें सुन दानव ने अपना धनुष उठाया और युद्ध में आ गया. वो पूरे बल से देवी पर बाण चलाने लगा. देवी ने भी क्रोधित होकर लोहे की नोक वाले बाण चलाए और असुर के बाणों को चकनाचूर कर दिया. उनके बीच युद्ध इतना भयंकर हो गया कि देव और दानव दोनों भयभीत हो गए.
दुर्धरा, त्रिनेत्र और अंधक का वध
इस भयंकर युद्ध के बीच, राक्षस दुर्धरा युद्ध में आ गया और उसने देवी पर अत्यंत विषैले और पत्थरों पर तेज किए हुए बाण चलाए. भगवती इससे बहुत क्रोधित हुईं और उन्होंने दुर्धरा पर तेज बाणों की बौछार कर दी. दुर्धरा इस प्रकार प्रहार पाकर युद्ध के मैदान में पर्वत की चोटी की तरह मृत गिर पड़ा.
तीरों और शस्त्रों में कुशल कुख्यात राक्षस त्रिनेत्र ने जब उसे मरा हुआ देखा, तो वह युद्ध करने के लिए आगे आया और देवी पर सात तीर चलाए. इससे पहले कि ये तीर देवी तक पहुंच पाते, देवी ने अपने नुकीले तीरों से उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर दिया और अपने त्रिशूल से त्रिनेत्र का वध कर दिया.
त्रिनेत्र का वध होते ही, अंधक तुरंत युद्धक्षेत्र में आया और लोहे की अपनी गदा से उसने भगवती के वाहन सिंह के सिर पर जोरदार प्रहार किया. सिंह ने उस शक्तिशाली अंधक को भी मार डाला. अपने नाखूनों से महिषासुर के असुरों को नोंचकर क्रोधित होकर उनका मांस खाना शुरू कर दिया.
कभी सिंह, कभी हाथी तो कभी भैंसा बना महिषासुर
महिषासुर इन असुरों की मृत्यु देखकर हैरान था. उसने देवी अंबिका पर नुकीले बाण चलाने शुरू कर दिए. देवी अंबिका ने उसके बाणों को अपने पास आने से पहले ही दो टुकड़ों में काट दिया और अपनी गदा से महिषासुर की छाती पर प्रहार किया. देवताओं का सबसे बड़ा दुश्मन महिषासुर गदा के इस प्रहार से बेहोश हो गया, परंतु अगले ही पल होश में आकर उसने माता के सिंह के सिर पर प्रहार किया. सिंह ने अपने नाखूनों से उस असुर को नोंच डाला. तब महिषासुर ने मनुष्य का रूप त्यागकर सिंह का रूप धारण कर लिया और अपने पंजों से देवी के सिंह पर टूट पड़ा और अपने नाखूनों से उसे घायल कर दिया.
महिषासुर के इस हमले से देवी बहुत क्रोधित हुईं और उन पर भयंकर, तीखे और विषैले सांपों के समान बाणों की बौछार करने लगीं. तब असुर ने सिंह रूप त्यागकर नर हाथी का रूप धारण कर लिया, जिसकी कनपटी से रस रिस रहा था और वह अपनी सूंड से पर्वतों की चोटियों को उछालने लगा. पर्वतों की चोटियों को अपनी ओर आते देख देवी ने अपने तीखे बाणों से उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर दिया और हंसने लगीं. दूसरी ओर, देवी के सिंह ने हाथी महिषा के सिर पर छलांग लगाई और अपने पंजों से दउसे चीर-फाड़ कर दिया.
देवी के सिंह को मारने के लिए महिषा ने अपना हाथी रूप त्यागकर सरभ (आधा सिंह और आधा पक्षी) का रूप धारण कर लिया, जो सिंह से भी अधिक शक्तिशाली और भयानक था. सरभ को देखकर देवी क्रोधित हुईं और उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी से सरभ के सिर पर प्रहार किया. सरभ ने भी देवी पर आक्रमण कर दिया. उनका युद्ध भयंकर हो गया. तब महिषासुर ने भैंस का रूप धारण किया और अपने सींगों से भगवती पर प्रहार किया. उस भयानक, डरावने रूप वाले असुर ने अपनी पूंछ हिलाते हुए दुबली-पतली देवी पर हमला करना शुरू कर दिया. उस हिंसक असुर ने अपनी पूंछ से पर्वत की चोटियों को पकड़ लिया और उन्हें गोल-गोल घुमाते हुए देवी पर फेंक दिया.
अपनी ताकत पर इतराता महिषासुर और देवी का वार
महिषासुर अब अपनी शक्ति पर इतरा रहा था. उसने कहा कि देवी! युद्धक्षेत्र में स्थिर रहो. मैं आज तुम्हें मृत्यु के घाट उतार दूंगा. तुम अज्ञानी हो, क्योंकि तुम मुझसे लड़ने के लिए उत्सुक हो. वास्तव में, तुम अपने बलवान होने के भ्रम में हो. तुम्हारा यह विचार बिल्कुल निराधार है. मैं पहले तुम्हें मारूंगा और फिर उन अभिमानी देवताओं को मारूंगा जो मेरे समुख सामने एक स्त्री को खड़ा करके मुझे हराना चाहते हैं.
जवाब में देवी ने कहा कि हे तुच्छ प्राणी ! तू बेधर्मी है. तू देवताओं को सताता है और मुनियों को भयभीत करता है. मैं निश्चय ही आज तेरा वध कर दूंगी. ये कहकर, क्रोधित होकर देवी ने महिषासुर का वध करने के लिए मदिरा से भरा स्वर्ण प्याला उठाया और बार-बार पिया. फिर उन्होंने अपने हाथों में त्रिशूल लेकर उसका पीछा किया, जिससे सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुए.
देवताओं ने देवी पर पुष्पों की वर्षा की और उनकी स्तुति की और दुंदुभी बजाकर जय-जयकार की. ऋषि, सिद्ध, गंधर्भ, पिशाच, उरग और किन्नर स्वर्गलोक से युद्ध देख रहे थे और अत्यंत प्रसन्न हुए. दूसरी ओर, पाखंडी महिषासुर ने विभिन्न जादुई रूप धारण किए और देवी पर बार-बार प्रहार किया. तब क्रोधित देवी चंडिका ने लाल आंखों से उस दुष्ट महिषासुर के सीने पर अपने तीखे त्रिशूल से प्रहार किया.त्रिशूल के प्रहार से वह राक्षस बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा. परंतु अगले ही क्षण उठकर उसने देवी पर जोर से प्रहार किया और असुर ऐसा करते हुए जोर से हंसा और इतनी ज़ोर से दहाड़ा कि सारे देवता उस आवाज से भयभीत हो गए.
तब देवी ने उत्तम धुरी और हजार तीलियों वाले तेजस्वी चक्र को ऊपर उठाया और सामने खड़े असुर से ऊंचे स्वर में कहा:-- हे मूर्ख! देखो! यह चक्र आज तेरा गला काट देगा. एक क्षण रुक, मैं तुझे तुरंत मृत्यु के घाट उतार रही हूं. यह कहकर देवी मां ने चक्र को फेंका. पल भर में उस अस्त्र ने दानव का सिर धड़ से अलग कर दिया. उसके गले से रक्त की गर्म धाराएं ऐसे बह निकलीं जैसे लाल बलुआ पत्थर से रंगे पहाड़ों से जल की उग्र धाराएं निकलती हैं. उस असुर का सिर कटा शरीर एक क्षण के लिए इधर-उधर हिला और फिर जमीन पर गिर गया. देवताओं के अपार हर्ष के साथ विजय की गूंज सुनाई दी. अत्यंत शक्तिशाली सिंह भागते हुए सैनिकों को ऐसे खाने लगा मानो वह बहुत भूखा हो. दुष्ट महिषासुर के वध के बाद, जो राक्षस जीवित बचे थे वे भयभीत होकर पाताल लोक भाग गए. पृथ्वी पर सभी देवता, ऋषि, मनुष्य और अन्य संत दुष्ट राक्षस की मृत्यु से अत्यंत प्रसन्न हुए.














