कैमूर : देश के प्राचीनतम मंदिरों में से एक माता मुंडेश्वरी का मंदिर है, जहां बकरे की रक्त विहीन बलि देने की प्रथा है. यह मंदिर बिहार राज्य के कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड के पावरा पहाड़ी पर स्थित है, जो अष्टकोणीय मंदिर है. मंदिर के परागण में माता मुंडेश्वरी विराजमान हैं और शिव के रूप में महामंडलेश्वर है, जो दिन में चार बार रंग बदलते हैं. माता को दर्शन के लिए देश के कई राज्यों से श्रद्धालु आते हैं. विदेशी श्रद्धालु भी माता की अनोखी प्रथा को देखने आते हैं. चावल और फूल के अछत से बकरे की दी जाती है बलि. वैसे तो साल भर श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं, पर चैत्र नवमी और शारदीय नवरात्रि में लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं.
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दूर दूर से आते हैं भक्त
उत्तर प्रदेश के चंदौली से पूरे परिवार के साथ आए अशोक कुमार यादव बताते हैं कि माता मुंडेश्वरी की अद्भुत लीला है , जहां बकरे को चावल फूल से बकरे की बलि दी जाती है. हम हर साल नवरात्रि में माता के दर्शन करने आते हैं.
महिला श्रद्धालु सरिता बताती हैं कि मेरे बेटे दिव्यांस राज को जन्म के ठीक बाद जॉन्डिस हो गया था, तब माता मुंडेश्वरी की मन्नत मांगे थे कि हे माता मेरा बेटा ठीक हो जाएगा तो बकरा चढ़ाएंगे, इसलिए बकरे को लेकर आए हैं.
माता मुंडेश्वरी मंदिर के पुजारी राधेश्याम बताते हैं कि यह मंदिर देश के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है, जो पावरा पहाड़ी पर स्थित है. यह मंदिर अष्टकोणीय मंदिर है. मंदिर के प्रांगण में महा महामंडलेश्वर शिव बिराजमान हैं. मान्यता है कि दिन में तीन से चार बार रंग बदलते हैं. यहां अनोखी प्रथा है कि जहां बकरे बलि दी जाती है. शारदीय नवरा्त्रि हो या चैत्र नवरात्रि में लाखों भक्तों की भीड़ जुटती है.
बलि के बाद भी बकरा रहता है जिंंदा
माता मुंडेश्वरी मंदिर के न्यास मंदिर परिषद के लेखपाल गोपाल कृष्ण का कहना है कि माता के अनूठी प्रथा है, जहां बकरे की अहिंसक बलि दी जाती है. सुरक्षा को लेकर 21 पॉइंट बने हैं, जहां मजिस्ट्रेट और पुलिस बल भी तैनात किया गया. माता के मंदिर को सजाने के लिए थाईलैंड से फूल मंगाए गए हैं. वहीं पश्चिम बंगाल से कारीगर लगे हुए है. नवमी के दिन माता का मंदिर 24 घंटे खुली रहती है.
देश प्राचीन मंदिरों में एक माता मुंडेश्वरी का मंदिर है, जहां अहिंसक बलि देने की प्रथा है यानी कि बकरे को चावल फूल के अछत से बलि देने की प्रथा है, जो देश-विदेश में भी ऐसी प्रथा नहीं है जिसको देखने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है.














