Hanuman Jayanti 2026: पृथ्वी पर आखिर कहां रहते हैं पवनपुत्र हनुमान? जानें बजरंगी के पवित्र पर्वत का रहस्य

Hanuman Jayanti 2026 on April 1 or 2: सनातन परंपरा में अतुलित बल के धाम माने जाने वाले पवनपुत्र हनुमान जी पृथ्वी पर आखिर कहां रहते हैं? महाभारतकाल में गदाधारी भीम की जिस पवित्र पर्वत पर हनुमान जी से मुलाकात हुई थी, वो कहां पर स्थित है? लाखों-करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े इस हनुमत धाम का रहस्य जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. 

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Hanuman Jayanti 2026: गंधमादन पर्वत कहां है?
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Hanuman Jayanti 2026 Gandhamadan Parvat Kaha Hai: हिंदू धर्म में शक्ति के पुंज कहलाने वाले श्री हनुमान जो को भगवान श्री राम का अनन्य भक्त और भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है. मारुतिनंदन हनुमान जी उन अष्टचिरंजीवी में से एक हैं, जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है और वे हर युग में पृथ्वी पर मौजूद रहते हैं. कलयुग में तो महावीर बजरंगी की साधना शीघ्र ही फलदायी मानी गई है. मान्यता है कि सच्चे मन से सुमिरन करने वाले साधक की मदद करने के लिए हनुमान जी दौड़े चले आते हैं. सभी संकटों को पलक झपकते हरने वाले हनुमान जी का आखिर पृथ्वी पर कहां रहते हैं? आखिर कहां है आस्था का हनुमत धाम, आइए इसे विस्तार से जानते हैं. 

आखिर कहां है ये गंधमादन पर्वत? 

भागवत पुराण के अनुसार कलयुग में सभी संकटों को हरने वाले हनुमान जी गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं. श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत (Sanskrit) विश्वविद्यालय के पौरोहित विभाग के प्रोफेसर रामराज उपाध्याय के अनुसार विष्णु पुराण और वायु पुराण में आस्था के इस हनुमत धाम को कैलाश पर्वत के उत्तर दिशा में सुमेरू पर्वत के पास स्थित माना गया है. धर्म के जानकार मानते हैं कि यह दिव्य पर्वत सिद्ध ऋषि-मुनियों की तपस्थली है, जहां पर आम आदमी का पहुंचना मुश्किल है. प्रो. उपाध्याय के अनुसार पाली, त्रिपटक और अन्य बौद्ध साहित्य में भी गंधमादन का उल्लेख मिलता है.

कुबेर समेत यक्ष और अप्सराएं करती हैं यहां वास

गंधमादन पर्वत को तमाम धार्मिक ग्रंथों में अत्यंत ही पवित्र और दिव्य स्थान माना गया है. जहां पर यक्ष, यक्षिणी, किन्नर, अप्सराएं आदि निवास करती हैं. तैत्तिरेय आरण्यक में कुबेर देवता को उत्तर दिशा का अधिपति मानते हुए उनका निवास गंधमादन पर्वत पर बताया गया है. कुबेर देवता को गुह्यकाधिपति और वैश्रवण भी कहा गया है. महाभारत के शल्य पर्व में गुह्यकों को यक्ष भी कहा गया है. जिससे कुबेर देवता का यक्षों से संबंध होने की पुष्टि होती है. 

बजरंगी ने गंधमादन पर्वत को ही क्यों बनाया अपना धाम? 

पवनपुत्र हनुमान आज भी जिस गंधमादन पर्वत पर अपने आराध्य प्रभु श्री राम की भक्ति में लीन माने जाते हैं, माना जाता है कि वह कैलाश मानसरोवर और बद्रीनाथ धाम के बीच स्थित है. भागवत पुराण की कथा के अनुसार जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम पृथ्वी से बैकुंठलोक को प्रस्थान करने के लिए चले तो उन्होंने हनुमान जी को बुलाकर उन्हें पृथ्वी पर ही वास करने के लिए कहा. इसके बाद शक्ति के पुंज कहलाने वाले हनुमान जी ने इस पवित्र और दिव्य गंधमादन पर्वत को अपने रहने के लिए स्थान चुना. 

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हनुमान जी ने इसी गंधमादन पर्वत पर ही भीम का तोड़ा था घमंड 

पंडित रामराज उपाध्याय के अनुसार महाभारत के वनपर्व में गंधमादन पर्वत का उल्लेख मिलता है. यह वही पर्वत है हां पर महाभारतकाल में भीम और हनुमान जी की भेंट हुई थी. महाभारत के वनपर्व से जुड़ी कथा के अनुसार पांडव अज्ञातवास के दौरान जब उत्तराखंड पहुंचे तो द्रौपदी के पास एक सहस्त्रदल कमल का पुष्प उड़कर आया. जिसे उठाकर जब द्रौपदी ने सूंघा तो उसकी खुशबू पर वह मोहित हो गईं. फिर उन्होंने भीम को उसे तोड़कर लाने को कहा. 

जब भीम सहस्त्रदल कमल को ढूंढ़ते हुए गंधमादन पर्वत पर पहुंचे तो वहां उन्होंने रास्ते में एक बूढ़े वानर को अपनी पूंछ को फैलाकर लेटा हुआ पाया. जब भीम ने वानर से रास्ते हट जाने को कहा. तब वानर ने कहा मैं तो नहीं हटता, अगर तुम चाहो तो मेरी पूंछ हटाकर जा सकते हो. इसके बाद महाबली भीम बहुत कोशिश के बाद भी उस वानर की जब पूंछ नहीं हटा पाए तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया और वे पहचान गये कि वह बूढ़ा वानर और कोई नहीं पवनपुत्र हनुमान जी हैं. इस तरह हनुमान जी ने भीम के अहंकार को दूर करके बल के साथ विनम्रता के महत्व को बताया. 

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तब भगवान परशुराम भी पहुंचे थे गंधमादन पर्वत

पं. रामराज के अनुसार त्रिपुरारहस्य नामक ग्रंथ में वर्णन मिलता है कि भगवान परशुराम पहले महेंद्र पर्वत पर रहते थे, लेकिन जब उन्होंने अपना सब कुछ भगवान श्री राम को समर्पित कर दिया तो उसके बाद आध्यात्मिक शांति के लिए वे भगवान दत्तात्रेय से दीक्षा लेकर गंधमादन पर्वत पर रहने के लिए चले गये थे. 

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इन स्थानों पर भी बजरंगी करते हैं निवास 

यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्, वाष्पवारि परिपूर्ण लोचनं, मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्. अर्थात् पृथ्वी पर जहां कहीं भी भगवान श्री रघुनाथ यानि भगवान राम का भजन-कीर्तन और मंत्र जप आदि होता है, वहां पर मारुतिनंदन हमेशा मौजूद रहते हैं. 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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