Baisakhi 2026: बैसाखी का पर्व उत्तर भारत में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. यह समय रबी की फसल, खासकर गेहूं की कटाई का होता है. किसान अपनी मेहनत की फसल घर लाने की खुशी में यह त्योहार मनाते हैं और भगवान और प्रकृति को धन्यवाद करते हैं. इसके अलावा धार्मिक दृष्टि से भी यह दिन बहुत खास माना जाता है. इसी दिन सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करते हैं. ऐसे में बैसाखी को वैशाख संक्रांति और मेष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है. इसके अलावा उत्तराखंड में इसे 'बिखोती' और ओडिशा में 'महा विशुव संक्रांति' के नाम से जाना जाता है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य देव को ग्रहों का राजा माना गया है. जब सूर्य अपनी राशि बदलते हैं, तो इसका प्रभाव सभी राशियों और पृथ्वी पर पड़ता है. इस दिन लोग सूर्य देव की पूजा करते हैं और जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना करते हैं.
कब है बैसाखी 2026? (Baisakhi 2026 Date)
हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र माह के बाद वैशाख का महीना आता है और वैशाख माह के पहले दिन को बैसाखी कहा जाता है. पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में बैसाखी का पर्व मंगलवार, 14 अप्रैल को मनाया जाएगा. इसी दिन सूर्य देव सुबह लगभग 9 बजकर 31 मिनट पर मेष राशि में प्रवेश करेंगे.
बैसाखी 2026 पूजा का शुभ मुहूर्तमंगलवार, 14 अप्रैल को पुण्यकाल सुबह 5 बजकर 56 मिनट से लेकर शाम 3 बजकर 55 मिनट तक रहेगा. इस समय स्नान, दान और पूजा को विशेष फलदायी माना जा रहा है. उत्तराखंड में 'बिखोती' का आयोजन 14-15 अप्रैल को किया जाएगा, जिसमें लाटू देव की पूजा का विशेष प्रावधान है. इस दिन देवताओं को अनाज से बने प्रसाद चढ़ाए जाते हैं और मंदिरों के बाहर सांस्कृतिक मेलों का भी आयोजन किया जाता है.
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इतिहास और धार्मिक महत्वबैसाखी को सिखों का नववर्ष भी कहा जाता है. मान्यता है कि वर्ष 1699 में इस दिन सिखों के दसवें और अंतिम गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी. ऐसे में खासकर पंजाब और हरियाणा के क्षेत्रों में बैसाखी को खूब जश्न के साथ मनाया जाता है. सिख समुदाय के लोग इस दिन गुरुद्वारों में जाकर अरदास करते हैं और गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनते हैं.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)














