- ईरान में देशव्यापी विरोध प्रदर्शन दशकों पुराने जनता के टकराव का नतीजा हैं, न कि केवल एक घटना की प्रतिक्रिया.
- 1979 की क्रांति के बाद महिलाओं की आजादी सीमित हुई और वही आज आंदोलनों की सबसे बड़ी ताकत बन गई हैं.
- आर्थिक संकट, राजनीतिक दमन और युवाओं की हताशा ने विरोध को स्थायी रूप दे दिया है.
ईरान में जब भी सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन दिखते हैं, तो उन्हें सिर्फ किसी एक घटना की प्रतिक्रिया समझ लेना बड़ी भूल होगी क्योंकि ये आंदोलन अचानक पैदा नहीं होते उनके पीछे दशकों का इतिहास, सत्ता और समाज के बीच टकराव, धर्म की भूमिका, विदेशी हस्तक्षेप, आर्थिक असमानता और आधी आबादी की व्यक्तिगत आजादी के सिमटते दायरे होते हैं. आज जो गुस्सा सड़कों पर दिखाई देता है, वह एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का नतीजा है, जिसकी जड़ें बीसवीं सदी की शुरुआत से ही ईरान की आबोहवा में समाहित हैं. ईरान को समझने के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि यहां की सत्ता धर्म, सेना, 1979 की क्रांति और वैचारिक मतभेदों के साथ गहराई से जुड़ी है. यही कारण है कि हर आंदोलन पूरे सिस्टम के खिलाफ खड़ा होता है.
मोहम्मद रजा पहलवी
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शाह के दौर से शुरू होती है असंतोष की कहानी
आधुनिक ईरान के विरोधों की पहली मजबूत नींव शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासनकाल में पड़ी. शाह खुद को एक आधुनिक, पश्चिमी सोच वाला शासक मानते थे. उन्होंने शिक्षा, उद्योग, महिलाओं के अधिकार और शहरी विकास पर जोर दिया. महिलाओं को वोट का अधिकार मिला, पर्दा हटाने को प्रोत्साहित किया गया और पश्चिमी लाइफस्टाइल को अपनाने की कोशिश हुई. लेकिन इस ऊपर से थोपी गई आधुनिकता ने समाज के बड़े हिस्से को असहज कर दिया.
रजा पहलवी
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पुराने दौर की याद और आज की हकीकत
इन प्रदर्शनों में एक बात ने सबका ध्यान खींचा. इस प्रदर्शन के दौरान लोग ईरान के दिवंगत शाह के निर्वासित बेटे रजा पहलवी का नाम लेने लगे. एक वक्त था जब यह नाम लेना भी खतरे से खाली नहीं था. लेकिन आज लोग नारे लगा रहे हैं और कह रहे हैं कि यह आखिरी लड़ाई है. असल में यह रजा की वापसी की मांग से ज्यादा उस दौर की याद है जब महिलाओं को ज्यादा आजादी थी. जब हिजाब जरूरी नहीं था. जब महिलाएं सड़कों पर खुलकर चल सकती थीं. हां वह दौर भी पूरी तरह आदर्श नहीं था. वहां भी दबाव था. वहां भी सत्ता सख्त थी. लेकिन आज के मुकाबले लोग उसे ज्यादा खुला मानते हैं.
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पहलवी दौर और महिलाओं की जिंदगी
जब पहलवी परिवार सत्ता में था तब ईरान तेजी से बदल रहा था. शहर आधुनिक हो रहे थे. शिक्षा फैल रही थी. महिलाओं को वोट का हक मिला. वे पढ़ रही थीं. काम कर रही थीं. तेहरान को लोग ‘पश्चिम एशिया का पेरिस' कहते थे. यह सब सच था. लेकिन यह भी सच है कि उस दौर में बोलने की आजादी सीमित थी. विरोध सहन नहीं किया जाता था. फिर भी आज की युवा पीढ़ी खासकर महिलाएं उस दौर को एक तुलना के रूप में देखती हैं. वे कहती हैं कि कम से कम तब हमारी जिंदगी पर इतना नियंत्रण नहीं था.














