- भारत के पास लाखों टन का रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व है जो सप्लाई शॉक के दौरान तत्काल राहत प्रदान करता है.
- देश के पास रणनीतिक भंडार और कंपनियों के स्टॉक्स मिलाकर लगभग 70 दिनों की ऊर्जा खपत का बैकअप उपलब्ध है.
- भारत ने मिडिल ईस्ट के कई देशों से संवाद बनाए रखकर संतुलित और सक्रिय कूटनीति के जरिए अपने हित सुरक्षित किए हैं.
मिडिल ईस्ट में जारी जंग ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झकझोर दिया है. कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार पहुंच गई हैं और कई देश फ्यूल राशनिंग, महंगाई और सप्लाई संकट से जूझ रहे हैं. लेकिन इस उथल-पुथल के बीच भारत अपेक्षाकृत स्थिर और तैयार नजर आ रहा है. संसद में बयान देते हुए पीएम मोदी ने साफ किया कि सरकार हर चुनौती से निपटने के लिए अलर्ट है और देश के हित सर्वोपरि हैं. उन्होंने कई ऐसे ठोस कारण गिनाए, जिनसे साफ होता है कि भारत इस संकट के सामने क्यों मजबूती से खड़ा है.
पहली वजह- स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR)
भारत ने पहले से ही तेल का बड़ा भंडार तैयार किया हुआ है. पीएम मोदी ने बताया कि देश के पास लाखों टन का रणनीतिक रिजर्व है और इसे लगातार बढ़ाया जा रहा है. यह रिजर्व किसी भी सप्लाई शॉक के दौरान देश को तत्काल राहत देता है और घबराहट से बचाता है.
दूसरी वजह- लंबे समय का एनर्जी बफर
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, रणनीतिक भंडार और ऑयल कंपनियों के स्टॉक्स को मिलाकर भारत के पास करीब 70 से अधिक दिनों की खपत का बैकअप है. यानी अगर सप्लाई प्रभावित भी होती है, तो देश के पास संभलने का समय है.
तीसरी वजह- संतुलित और सक्रिय कूटनीति
पीएम मोदी ने बताया कि उन्होंने ईरान, सऊदी अरब, UAE, कतर समेत कई देशों के नेताओं से बात की है. भारत किसी एक पक्ष पर निर्भर नहीं है, बल्कि हर देश से संवाद बनाए रखकर अपने हित सुरक्षित कर रहा है.
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चौथी वजह- तेल पर निर्भरता कम करने की नीति
पीएम मोदी ने संसद में बताया कि एथेनॉल ब्लेंडिंग के जरिए हर साल करोड़ों बैरल कच्चे तेल की बचत हो रही है. इससे आयात पर दबाव कम हुआ है और देश को झटकों से राहत मिली है.
पांचवीं वजह- रेलवे का विद्युतीकरण और डीजल की बचत
रेलवे के तेजी से इलेक्ट्रिफिकेशन के कारण डीजल की खपत में भारी कमी आई है. इससे ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अब वैकल्पिक स्रोतों से आ रहा है, जो संकट के समय मददगार साबित हो रहा है.
छठी वजह- रिन्यूएबल एनर्जी का विस्तार
भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 250 गीगावाट से ज्यादा हो चुकी है. सोलर, विंड, हाइड्रो और बायोगैस जैसे स्रोतों ने ऊर्जा के विकल्प बढ़ाए हैं, जिससे तेल पर निर्भरता कम हुई है.
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सातवीं वजह- इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और मेट्रो विस्तार
सरकार 15,000 इलेक्ट्रिक बसों और मेट्रो नेटवर्क के विस्तार पर काम कर रही है. इससे शहरों में ईंधन की खपत घट रही है और आयातित तेल पर दबाव कम हो रहा है.
आठवीं वजह- रोजाना मॉनिटरिंग और सख्त निगरानी
पीएम मोदी ने बताया कि एक इंटर-मिनिस्ट्री ग्रुप रोजाना स्थिति की समीक्षा कर रहा है. राज्यों को ब्लैक मार्केटिंग रोकने, सप्लाई बनाए रखने और मजदूरों-गरीबों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं.
नौवीं वजह- संकट प्रबंधन का अनुभव
कोविड-19 जैसे बड़े संकट से निपटने का अनुभव भारत के पास है. उसी मॉडल पर केंद्र और राज्य मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे प्रशासनिक प्रतिक्रिया तेज और प्रभावी बनी हुई है.
दसवीं वजह- खाद्य और कोयला भंडार भी पर्याप्त
पीएम मोदी ने यह भी स्पष्ट किया कि देश के पास पर्याप्त खाद्यान्न और कोयला भंडार है. यानी ऊर्जा के साथ-साथ जरूरी संसाधनों की भी कमी नहीं है, जिससे समग्र संकट का असर सीमित रहेगा.
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अन्य देशों में क्या है स्थिति?
पाकिस्तान
पाकिस्तान इस तेल संकट से निपटने के लिए सख्त कदम उठाने को मजबूर हो गया है. सरकार ने ईंधन बचाने के लिए गैर-जरूरी यात्रा सीमित करने, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने और यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में कटौती जैसे फैसले लिए हैं. आर्थिक संकट से पहले ही जूझ रहे पाकिस्तान के लिए महंगा तेल दोहरी मार बन गया है. एक तरफ विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव, दूसरी तरफ आम लोगों के लिए महंगाई का खतरा है.
चीन
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद चीन भी दबाव में है. उसने घरेलू उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण (price caps) लगाया है और पेट्रोल-डीजल व जेट फ्यूल के निर्यात पर रोक लगाई है. साथ ही, चीन ने कोयले के इस्तेमाल को बढ़ाने और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाने की रणनीति अपनाई है, ताकि आयातित तेल पर तत्काल निर्भरता कम की जा सके.
बांग्लादेश
बांग्लादेश की स्थिति काफी संवेदनशील नजर आ रही है. ईंधन आपूर्ति बनाए रखने के लिए उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ रहा है. पहले जहां त्योहारों के दौरान यात्रा सुचारू रखने के लिए कुछ राहत दी गई थी, अब सरकार फिर से आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भारत, चीन और अन्य साझेदार देशों से तेल हासिल करने की कोशिश कर रही है. यह दर्शाता है कि देश के पास पर्याप्त घरेलू बफर नहीं है.
नेपाल
नेपाल पूरी तरह आयातित ईंधन पर निर्भर है और इस संकट का सीधा असर वहां की जनता पर पड़ा है. नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन ने भारत को भुगतान बनाए रखने और सप्लाई जारी रखने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की है. यानी सरकार के पास सीमित विकल्प हैं. या तो कीमतें बढ़ाए या फिर सप्लाई संकट झेले.
श्रीलंका
श्रीलंका की स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर मानी जा रही है. सरकार को फ्यूल राशनिंग लागू करनी पड़ी है, पेट्रोल-डीजल के दामों में भारी बढ़ोतरी करनी पड़ी है और दैनिक जीवन पर भी पाबंदियां लगानी पड़ी हैं. कई सेक्टरों में काम के घंटे घटाए गए हैं और बिजली बचाने के लिए स्ट्रीट लाइट, नीयॉन साइन और बिलबोर्ड लाइटिंग तक बंद करने के निर्देश दिए गए हैं. यह स्थिति साफ दिखाती है कि आर्थिक रूप से कमजोर देश ऊर्जा संकट में कितनी तेजी से प्रभावित होते हैं.
इन उदाहरणों से साफ है कि जहां कई देश तत्काल और कठोर कदम उठाने को मजबूर हैं, वहीं संकट की तीव्रता हर देश की आर्थिक ताकत, तैयारी और ऊर्जा रणनीति पर निर्भर कर रही है. ऐसे में भारत द्वारा पहले से की गई तैयारी, संतुलित कूटनीति और ऊर्जा के विविध स्रोतों के दम पर इस चुनौती का सामना कर रहा है.













