ईरान में क्या हो रहा है? सड़क पर संग्राम से सत्ता में बेचैनी, भारत के लिए क्यों अहम तेहरान

ईरान में सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन चल रहा है. लोग इतने नाराज हैं कि सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे हैं. आखिर क्या वजह है कि ईरान में आम जनता 12 दिनों से सड़कों पर उतरी हुई है और भारत पर ईरान संकट से क्या असर पड़ सकता है?

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  • ईरान की सड़कों पर उठी आग अब सत्ता के दरवाजे तक पहुंच चुकी है.
  • प्रतिबंधों और महंगाई ने जनता को विरोध के लिए मजबूर कर दिया है.
  • ईरान की अस्थिरता भारत की तेल सुरक्षा और रणनीतिक योजनाओं के लिए बड़ा खतरा बन रही है.
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ईरान की राजधानी तेहरान समेत कई बड़े शहरों में सरकार के खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं. सोशल मीडिया पर आए वीडियो बताते हैं कि हजारों-लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं. यहां #IranProtests और #IranRevolution ट्रेंड कर रहा है. इसे 2022 और 2009 के बाद ईरान में धार्मिक सत्ता (क्लेरिकल एस्टैब्लिशमेंट) के खिलाफ सबसे बड़ा शक्ति-प्रदर्शन माना जा रहा है.  गुरुवार शाम राजधानी तेहरान और देश के दूसरे सबसे बड़े शहर मशहद में हुए ये प्रदर्शन ज्यादातर शांतिपूर्ण रहे. शुरुआती घंटों में सुरक्षा बलों ने इन्हें तितर-बितर नहीं किया लेकिन कुछ ही देर बाद पूरे देश में इंटरनेट बंद कर दिया गया.

‘खामेनेई हटो', ‘शाह जिंदाबाद' के लगे नारे

वीडियो में प्रदर्शनकारी ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई को हटाने और निर्वासित पूर्व शासक के बेटे रेजा पहलवी की वापसी की मांग करते सुने जा सकते हैं. इस दौरान ‘तानाशाह मुर्दाबाद', ‘यह आखिरी जंग है, पहलवी लौटेंगे', ‘डरो मत, हम सब साथ हैं' जैसे नारे लगाए गए और कई जगहों पर लोग फ्लाईओवर पर चढ़कर सीसीटीवी कैमरे हटाते हुए भी देखे गए.

Photo Credit: AFP

ईरान में क्यों हो रहा है विरोध प्रदर्शन?

मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक यह लगातार 12वां दिन है जब ईरान अशांति की चपेट में है. इस विरोध प्रदर्शन की वजह है- ईरानी मुद्रा रियाल में रिकॉर्ड गिरावट, आसमान छूती महंगाई और बेरोजगारी, जरूरी चीजों आम आदमी की पहुंच से बाहर होना, खाने पीने के सामान और दवाइयों की कीमतें कई गुना महंगा होना. लोगों की शिकायत है कि सरकार प्रतिबंधों का बहाना बनाकर जवाबदेही से बच रही है.  इस जबरदस्त आर्थिक बदहाली के बीच ईरान के 21 प्रांतों के 100 से ज्यादा शहरों और कस्बों में सड़कों पर लोग जनसैलाब बन कर उतर आए हैं.

मौतें, गिरफ्तारियां और गोलियां

अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट न्यूज एजेंसी (HRANA) का दावा है कि इस प्रदर्शन के 12वें दिन तक 42 लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें पांच नाबालिग और 8 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं. इस दौरान 2270 से अधिक लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है. नॉर्वे स्थित ईरान ह्यूमन राइट्स (IHR) के मुताबिक मृतकों की संख्या 45 तक पहुंच गई है, जिनमें 8 नाबालिग शामिल हैं. वहीं बीबीसी फारसी के मुताबिक 22 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है.
पश्चिमी शहर देजफुल से आए वीडियो में सुरक्षाबलों पर भीड़ पर गोली चलाने के आरोप भी लगे हैं. ईरान के कुर्द बहुल इलाकों—इलाम, केरमानशाह और लोरेस्तान में इस हड़ताल का व्यापक असर देखने को मिला है. कुर्द मानवाधिकार संगठन हेंगा के मुताबिक इन इलाकों में 17 प्रदर्शनकारी मारे गए, इनमें अधिकांश लोग कुर्द और लोर समुदाय से हैं.

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ट्रंप का अल्टीमेटम, रेजा पहलवी का आह्वान

अमेरिका में रह रहे रेजा पहलवी ने सोशल मीडिया पर कहा, आज रात लाखों ईरानियों ने अपनी आजादी की मांग की. मेरे बहादुर हमवतन सड़कों पर हैं.” उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी धन्यवाद दिया और यूरोपीय नेताओं से ईरानी सरकार पर दबाव बनाने की अपील की.
उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ चेतावनी दी, “अगर ईरानी सरकार प्रदर्शनकारियों को मारती है, तो हम बहुत सख्त कार्रवाई करेंगे.”

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Photo Credit: AFP

ईरान की सरकारी मीडिया का दावा

ईरानी सरकारी मीडिया ने प्रदर्शनों के पैमाने को कम करके दिखाने की कोशिश की लेकिन सोशल मीडिया पर आए फुटेज ने उनकी इरादे नाकाम कर दिए. सरकारी मीडिया ने कई खाली सड़कों के वीडियो डालकर दावा किया कि कहीं कोई प्रदर्शन हुआ ही नहीं. वहीं इंटरनेट निगरानी संस्था नेटब्लॉक्स के मुताबिक ईरान देशव्यापी इंटरनेट ब्लैकआउट की चपेट में है, जिसका मकसद लोगों की आवाज को दबाया जाना है. 

Photo Credit: NDTV

ईरान संकटः अब तक क्या क्या हुआ?

28 दिसंबर 2025: तेज आर्थिक गिरावट और ईरान की मुद्रा रियाल के रिकॉर्ड निम्म स्तर पर जाने के चलते तेहरान के ग्रैंड बाजार में व्यापारियों की हड़ताल और विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ. सोशल मीडिया पर उनका समर्थन और एमेनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक हजारों की संख्या में आम जनता भी सड़कों पर उतरी.

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29 दिसंबर 2025: लगातार दूसरे दिन बाजार बंद रहे. विरोध प्रदर्शन केवल व्यापारियों तक सीमित नहीं रहा. इस सरकार विरोधी प्रदर्शन में छात्र भी शामिल हुए.

30 दिसंबर 2025: विरोध के तीसरे दिन. दुकानदारों, छात्रों और आम जनता का यह प्रदर्शन कई अन्य शहरों में शुरू हुआ. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ जबरदस्त नारेबाजी की गई. प्रदर्शनकारी आर्थिक मुद्दों के साथ राजनीतिक बदलाव की मांग भी करने लगे.

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31 दिसंबर 2025: सुरक्षा बलों ने कई इलाकों में फायरिंग की. अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के मुताबिक कुछ प्रदर्शनकारियों की मौतें हुईं.

1 जनवरी 2026: विरोध देश के कई अन्य शहरों तक फैल गया. मानवाधिकार संगठनों ने कई प्रदर्शनकारियों की मौत की पुष्टि की.

2–3 जनवरी 2026: पश्चिम ईरान के इलम में सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर सशस्त्र प्रतिक्रिया दी. कई लोगों के मरने और घायल होने के मामले सामने आए. खामेनेई मुर्दाबाद के नारे लगाए गए.

4–6 जनवरी 2026: विरोध अब 31 प्रांतों और 100 से अधिक शहरों तक फैल गया. कई विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक भवनों और प्रमुख सड़कों पर प्रदर्शन हुए. सुरक्षा बलों ने बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया.

7–8 जनवरी 2026: सरकार ने पूरे देश में इंटरनेट बंद कर दिया ताकि विरोध प्रदर्शन में शामिल लोग आपस में बातचीत न कर सकें और इस तरह इसे रोका जा सके. इसके बावजूद 12वें दिन भी ये प्रदर्शन जारी रहे. कुछ आगजनी की घटना की रिपोर्ट्स भी सामने आईं. विरोध प्रदर्शन में मरने वालों की संख्या बढ़ी.

9 जनवरी 2026 (वर्तमान स्थिति): मानवाधिकार समूहों ने और अधिक गिरफ्तारियां और हिंसा की रिपोर्ट्स जारी कीं. इंटरनेट कटौती के बावजूद देशव्यापी प्रदर्शन जारी. 

Photo Credit: AFP

आखिर शुरू कैसे हुआ आंदोलन?

यह विरोध प्रदर्शन बीते साल 28 दिसंबर से शुरू हुआ था. तब तेहरान में रियाल की भारी गिरावट के खिलाफ प्रदर्शन किया गया था. पिछले एक साल में रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, महंगाई 40% के पार है और परमाणु कार्यक्रम को लेकर लगे प्रतिबंधों, भ्रष्टाचार और बदइंतजामी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं. उस प्रदर्शन में सबसे पहले तेहरान के दुकानदारों ने भाग लिया था फिर जल्द ही उसमें आम जनता भी शामिल हो गई. सड़क पर बड़ी तादाद में छात्र और महिलाएं भी इस प्रदर्शन के साथ हो लिए. 

आवाम की आवाज

अमेरिका के टेक्सास से रैपर @ak_ar3hi ने अपने एक्स हैंडल के जरिए संदेश दिया, "यह दुनिया के लिए अरजेंट मैसेज है. ईरान में इस्लामिक सरकार गिर रही है और उसने इंटरनेट बंद कर दिया है क्योंकि लाखों ईरानी सड़कों पर हैं. इस जनआंदोलन के बारे में जागरूकता फैलाने में हमें आप सब की जरूरत है."

सोशल मीडिया पर एक वीडियो में एक ईरानी महिला यह कहती दिख रही हैं कि, “हम यहां बुरे हाल में जी रहे हैं. हमें यहां न भविष्य दिखता है, न कहीं जाने की स्थिति में हम है, हालात बहुत खराब हैं.”

एक अन्य महिला ने कहा, “हमसे हमारे सपने छीन लिए गए हैं पर हमारी आवाज अब भी जिंदा है.”

Photo Credit: AFP

ईरान के आर्थिक संकट में घिरने की वजह

ईरान के पास तेल और प्राकृतिक गैस का बहुत बड़ा भंडार है. पर अमेरिकी प्रतिबंधों ने उसके अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है. ईरान के पास दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार है, पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल परीक्षण और पश्चिम एशिया में उसके बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका ने बैंकिंग, तेल और व्यापार पर सख्त पाबंदियां लगाई हैं. इसकी वजह से वो खुले बाजार में तेल नहीं बेच पा रहा है. इससे सरकार की आमदनी घटी और विकास परियोजनाएं ठप हो गई हैं. बैंकिंग प्रतिबंधों से ईरान अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली (SWIFT) से लगभग कट गया. नतीजा यह हुआ कि आयात-निर्यात महंगा हो गया, दवाइयां और जरूरी सामान की कीमतें बेतहासा बढ़ गई हैं. विदेशी निवेश रुकने से रोजगार घटा, रियाल की कीमत गिरी और महंगाई 40% से ऊपर चली गई. यही आर्थिक दबाव आज सड़कों पर गुस्से और विरोध की सबसे बड़ी वजह बन गया है.

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2022 में महसा अमीनी की मौत पर हुआ था पिछला बड़ा आंदोलन

यह आंदोलन 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हुए प्रदर्शनों के बाद सबसे बड़ा माना जा रहा है. सितंबर 2022 में धार्मिक मामलों की पुलिस ने ईरानी महिला महसा अमीनी को गिरफ्तार किया था. उन पर सिर को ढंकने के एक सख्त नियम का पालन नहीं करने का आरोप था. उसके बाद महसा अमीनी को पुलिस वैन में बुरी तरह पीटने का आरोप लगा जिसके बाद वो कोमा में चली गईं और उनकी मौत हो गई. हालांकि पुलिस का कहना था कि उनकी मौत गिरफ्तार किए जाने के बाद हार्टि फेलियर से हुई थी.

अमीनी के अंतिम संस्कार के समय कथित तौर पर कुछ महिलाओं ने विरोध में अपने हिजाब उतार दिए जबकि ईरान में हिजाब पहनना अनिवार्य है. उनकी मौत के विरोध में पूरे ईरान में तब हिजाब विरोधी प्रदर्शन हुए थे जिसमें 550 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, 20 हजार से अधिक गिरफ्तारी भी हुई थी. एक साल बाद ही ईरान ने उन प्रदर्शन में शामिल तीन लोगों को फांसी पर लटका दिया था.

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2009 में भी सड़कों पर उतरा था बड़ा जनसैलाब

साल 2009 में भी ईरान में एक बड़ा जनसैलाब सड़कों पर उतरा था. तब 1953 में छात्रों की मौत की वर्षगांठ के लिए कुछ समारोह आयोजित किए जाने थे. ईरान में 1953 में अमरीका के विरोध में एक छात्र प्रदर्शन हुआ था. उस विरोध प्रदर्शन के दौरान कई छात्रों की मौत हुई थी. उसकी याद में वहां एक वार्षिक छात्र दिवस मनाया जाता है.

जून 2009 में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव के बाद ईरान में विपक्षी कार्यकर्ताओं ने ये प्रदर्शन शुरू किए थे. तब भी ‘तानाशाही मुर्दाबाद' और 'डरो नहीं हम सब साथ हैं' के नारे लगे थे. विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि मतदान में धांधली की गई है और उस दौरान व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे. तब कई लोग मारे गए थे.

विपक्षी नेता आयतुल्लाह हुसैन अली मुंतजेरी

विपक्षी नेता आयतुल्लाह हुसैन अली मुंतजेरी  राष्ट्रपति चुनाव में महमूद अहमदीनेजाद की जीत को धांधली बताया था और चेतावनी दी थी कि ईरान धीरे-धीरे तानशाही बनने की दिशा में जा रहा है.

फिर उसी साल दिसंबर के महीने में मुंतजेरी की मौत हो गई तो वहां काफी तनाव बढ़ गया. हजारों की तादाद में लोग मुंतजेरी को अलविदा करने पहुंचे. ईरान की सरकार ने स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को इस अंतिम संस्कार की रिपोर्टिंग करने से रोक दिया था. कई जगहों पर शोक सभाएं आयोजित की गई थीं. जिसे रोके जाने की बात भी सामने आई थी. उसी दौरान पुलिस फायरिंग में कुछ लोगों की मौत हुई थी. हालांकि मुंतजेरी के बेटे ने उनकी मौत की वजह प्राकृतिक कारणों को बताया था. मुंतजेरी 87 वर्ष के थे.

भारत के लिए ईरान संकट के मायने

ईरान में बढ़ता संकट भारत के लिए सिर्फ एक विदेशी राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि इसके रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक मायने जुड़े हैं. तेल, ऊर्जा, पोर्ट कनेक्टिवी और मध्य पूर्व में संतुलन को देखते हुए यह भारत के लिए मायने रखता है. इसे इन पहलुओं में समझा जा सकता है.

ऊर्जा सुरक्षा पर असरः ईरान भारत का पारंपरिक तेल आपूर्तिकर्ता रहा है. अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा ईरान से लेता था, क्योंकि तेल सस्ता मिलता था और उसके भुगतान में लचीलापन था. भारत उसे रुपये में भी भुगतान करता था. अगर ईरान का संकट और गहराता है या पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ती है, तो इससे तेल कीमतें बढ़ेंगी यानी भारत का आयात बिल बढ़ेगा. निश्चित रूप से इससे देश में महंगाई पर सीधा असर पड़ेगा.

होर्मुज स्ट्रेट रूट की अहमियत: ईरान संकट का असर पूरे पश्चिम एशिया पर पड़ता है. इसराइल के साथ उसके दशकों से चल रहे विवाद से यह क्षेत्र पहले ही तनावग्रस्त है. अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद करने की धमकी भी देता रहा है. यह वो रूट है जिससे होकर दुनिया के 20 फीसद कच्चे तेल का आवागमन होता है. अगर ईरान ने होर्मुज को बंद किया तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार बाधित होगी और तेल की कीमते बेतहाशा बढ़ेंगी क्योंकि इससे लॉजिस्टिक का खर्च बढ़ जाएगा. होर्मुज से होकर भारत का 60 फीसद तेल गुजरता है लिहाजा इसका सीधा असर यहां के व्यापार पर पड़ेगा. साथ ही चीन और जापान जैसे देश भी इससे प्रभावित होंगे.

चाबहार पोर्ट: ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए बेहद अहम है. ईरान के दक्षिणी तट पर सिस्तान-बालूचिस्तान प्रांत में स्थित चाबहार बंदरगाह को भारत और ईरान ने मिलकर विकसित किया है. यही रास्ता भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ता है. इस रास्ते से व्यापार करने पर भारत का लॉजिस्टिक्स खर्च कम होता है. पाकिस्तान को बायपास करने का यही विकल्प है. अगर ईरान में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है या सत्ता परिवर्तन होता है, तो चाबहार प्रोजेक्ट की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. इससे भारत की कनेक्टिविटी रणनीति कमजोर हो सकती है.

नागरिक और कूटनीति संकटः ईरान में हजारों की संख्या में भारतीय छात्र, बिजनेसमैन और प्रोफेशनल्स रहते हैं. यहां अस्थिरता बढ़ने पर उन्हें वहां से सुरक्षित निकालना भी कूटनीतिक संतुलन के लिए भारत की चुनौती बन जाएगा.