म्यांमार पर सबसे छोटे अफ्रीकी देश गाम्बिया ने क्यों किया केस- समझिए क्या है पूरा मामला?

एशिया के म्यांमार में हुए रोहिंग्या नरसंहार पर अफ्रीकी के सबसे छोटे देश गाम्बिया ने क्यों किया आईसीजे में केस? रोहिंग्या कौन हैं? यह केस दुनिया के लिए क्या अहमियत रखती है? पढ़ें सभी सवालों के जवाब...

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  • ICJ में म्यांमार के खिलाफ रोहिंग्या नरसंहार का एक मामला सुना जा रहा है जिसे गाम्बिया ने 2019 में दर्ज किया था.
  • गाम्बिया ने म्यांमार पर 1948 के संयुक्त राष्ट्र नरसंहार सम्मेलन के उल्लंघन का आरोप लगाया है.
  • ICJ में चल रही इस सुनवाई पर पूरी दुनिया की नजर है. यह अंतरराष्ट्रीय इंसाफ की विश्वसनीयता की परीक्षा है.
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संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष अदालत अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में म्यांमार के खिलाफ रोहिंग्या नरसंहार का मामला सुना जा रहा है. यह केस पश्चिम अफ्रीका के सबसे छोटे देश गाम्बिया ने दायर किया है. क्षेत्रफल में भारत के त्रिपुरा से कुछ बड़े गाम्बिया का आरोप है कि म्यांमार ने रोहिंग्या मुसलमानों को खत्म करने के इरादे से योजनाबद्ध तरीके से हिंसा, उत्पीड़न और सैन्य कार्रवाई की. 2019 में दर्ज इस मामले की सुनवाई अब हो रही है. म्यांमार लगातार इन आरोपों से इनकार करता रहा है.

रोहिंग्या कौन हैं और विवाद कहां से शुरू हुआ?

रोहिंग्या म्यांमार का एक अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय है. म्यांमार में एक अनुमान के मुताबिक इनकी संख्या 15 से 20 लाख के करीब है. इन मुसलमानों के बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं. इसी वजह से म्यांमार की सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है. हालांकि ये म्यामांर में पीढ़ियों से रह रहे हैं. 2012 से ही म्यांमार के इस इलाके में सांप्रदायिक हिंसा चल रहा है जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं. 

गाम्बिया का कहना है कि इस समुदाय को दशकों से भेदभाव, नफरत और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा. लंबे समय तक उनके खिलाफ ऐसा माहौल बनाया गया, जिसमें उन्हें खतरे के रूप में पेश किया गया. इसी पृष्ठभूमि में 2017 में म्यांमार की सेना ने रखाइन प्रांत में बड़ा सैन्य अभियान चलाया, जिसे इस पूरे मामले का सबसे अहम मोड़ माना जाता है.

2017 में क्या हुआ था?

साल 2017 की सैन्य कार्रवाई के दौरान हजारों रोहिंग्या मारे गए. बड़ी संख्या में गांव तबाह कर दिए गए. हालात इतने भयावह हो गए कि 7 लाख से ज्यादा रोहिंग्या अपनी जान बचाने के लिए म्यांमार छोड़कर बांग्लादेश भागने को मजबूर हुए. गाम्बिया का आरोप है कि यह सामान्य सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक पूरे समुदाय को मिटाने की कोशिश थी. इसी वजह से इसे नरसंहार के दायरे में रखा गया है.

ICJ की पहली सुनवाई के दौरान गाम्बिया के न्याय मंत्री दावदा जालो
Photo Credit: AFP

गाम्बिया ने यह केस क्यों दर्ज किया?

गाम्बिया सीधे तौर पर इस संघर्ष से जुड़ा देश नहीं है. फिर भी उसने यह मामला दायर किया. गाम्बिया के विदेश मंत्री दावदा जालो ने अदालत में कहा कि उनका देश इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानता है. उन्होंने बताया कि गाम्बिया खुद भी अतीत में सैन्य शासन और दमन का अनुभव कर चुका है. इसी वजह से वह समझता है कि अगर अत्याचारों पर समय रहते कार्रवाई न हो, तो हालात और बिगड़ते चले जाते हैं. गाम्बिया ने अदालत को बताया कि उसने कई भरोसेमंद रिपोर्टों की समीक्षा की है, जिनमें एक कमजोर और असहाय समुदाय के खिलाफ बेहद क्रूर हिंसा की पुष्टि होती है.

म्यांमार क्या कहता है?

म्यांमार लगातार इन आरोपों से इनकार करता रहा है. उसका कहना है कि सेना ने उग्रवादी और विद्रोही खतरों के खिलाफ कार्रवाई की थी. उसने संयुक्त राष्ट्र की 2018 की रिपोर्ट को भी खारिज कर दिया था, जिसमें शीर्ष सैन्य अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे. अब आईसीजे की सुनवाई में म्यांमार को भी अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया है. म्यांमार के विदेश मंत्रालय ने बुधवार को कहा कि मुस्लिम रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के साथ किए गए बर्ताव को लेकर इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में नरसंहार का मामला 'गलत और बेबुनियाद' है. कोर्ट ने सोमवार को 2017 की सैन्य कार्रवाई को लेकर गाम्बिया के लगाए गए आरोपों पर तीन हफ्ते तक सुनवाई चलेगी.

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Photo Credit: AFP

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट क्या कहती है?

2018 में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें म्यांमार के शीर्ष सैन्य अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे. रिपोर्ट में कहा गया था कि रखाइन प्रांत में नरसंहार और दूसरे इलाकों में मानवता के खिलाफ अपराध किए गए. हालांकि म्यांमार ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था और कहा था कि सेना ने उग्रवादी और विद्रोही खतरों के खिलाफ कार्रवाई की थी.

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में सुनवाई कैसे हो रही है?

इस समय अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जा रही हैं. गाम्बिया अपनी ओर से आरोप और सबूत पेश कर रहा है. म्यांमार को भी अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा. अदालत ने तीन दिन गवाहों की गवाही के लिए तय किए हैं, जिनमें रोहिंग्या पीड़ित शामिल होंगे. ये सुनवाई बंद कमरे में होगी और मीडिया या आम लोगों को इसकी अनुमति नहीं होगी. 

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इस केस में फैसला कब आएगा?

इस मामले में अंतिम फैसला जल्द आने की उम्मीद नहीं है. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय किसी व्यक्ति को सजा नहीं देता, लेकिन उसका फैसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी असर डालता है. ऐसे फैसले संयुक्त राष्ट्र, सरकारों और वैश्विक संस्थाओं के रुख को प्रभावित करते हैं.

आंग सान सू ची
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आंग सान सू ची की भूमिका क्यों विवाद में है?

म्यांमार की पूर्व नेता आंग सान सू ची की भूमिका भी इस केस में चर्चा में रही है. जब रोहिंग्या नरसंहार के आरोप लगे, तब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सेना का बचाव किया था. इसके चलते मानवाधिकारों की समर्थक के रूप में उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि को भारी नुकसान पहुंचा. बाद में 2021 के सैन्य तख्तापलट में उनकी सरकार गिरा दी गई और उन्हें जेल भेज दिया गया.

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आज रोहिंग्या कहां हैं?

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, सिर्फ बांग्लादेश के कॉक्स बाजार इलाके में ही 10 लाख से ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं. ये दुनिया के सबसे बड़े और सबसे भीड़भाड़ वाले शरणार्थी कैंपों में गिने जाते हैं. कई रोहिंग्या लोग समुद्र के रास्ते मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों तक पहुंचने की कोशिश भी कर चुके हैं.

ढाका में रोहिंग्या मुसलमानों की एक रैली
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रोहिंग्या पीड़ित क्या चाहते हैं?

हेग में अदालत के बाहर पहुंचे रोहिंग्या पीड़ितों ने साफ कहा कि वे सिर्फ न्याय की उम्मीद नहीं कर रहे, बल्कि उसकी मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि म्यांमार के सैन्य नेताओं के खिलाफ ठोस कार्रवाई होनी चाहिए. उनके लिए यह केस सिर्फ कानून की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने भविष्य और पहचान की लड़ाई है.

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यह केस दुनिया के लिए क्यों अहम है?

यह मामला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह एक दशक से ज्यादा समय बाद सुना जा रहा बड़ा नरसंहार केस है. इसे दूसरे मामलों, जैसे गजा युद्ध से जुड़े केस, के लिए भी एक मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है. अदालत के जरिए यह साफ हो सकता है कि नरसंहार की परिभाषा को अंतरराष्ट्रीय कानून में कैसे समझा और लागू किया जाए.

बांग्लादेश में 10 लाख से अधिक रोहिंग्या मुसलमान वहां के कॉक्स बाजार इलाके में बनाए गए शरणार्थी शिविरों में रखे गए हैं
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1948 का नरसंहार कानून क्या कहता है?

गाम्बिया ने म्यांमार पर 1948 के संयुक्त राष्ट्र नरसंहार सम्मेलन के उल्लंघन का आरोप लगाया है. यह कानून नाजी जर्मनी के दौर के बाद बनाया गया था. इसके तहत किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूरी तरह या आंशिक रूप से खत्म करने के इरादे से किए गए अपराध को नरसंहार माना जाता है.

इस केस का असर क्या होगा?

इस केस सिर्फ म्यांमार तक सीमित नहीं रहेगा. यह तय करेगा कि अंतरराष्ट्रीय कानून अत्याचारों के खिलाफ कितना प्रभावी है और क्या ऐसे मामलों में सच में जवाबदेही तय हो सकती है. यही वजह है कि इस सुनवाई को पूरी दुनिया बेहद गंभीरता से देख रही है.

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