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जब अमिताभ-विनोद में छिड़ी थी जंग, 70s का यह एक्टर बना 'साइलेंट सुपरस्टार', चुपके से तहस-नहस किया बॉक्स ऑफिस

70 का दशक हिंदी सिनेमा में स्टारडम की नई परिभाषा लिख रहा था. एक तरफ अमिताभ बच्चन अपनी एंग्री यंग मैन इमेज के साथ छाए हुए थे, दूसरी तरफ विनोद खन्ना तेजी से मजबूत दावेदार बनकर उभर रहे थे. इसी दौर में एक ऐसा एक्टर भी था, जिसने बिना ज्यादा शोर किए अपनी अलग पहचान बना ली.

जब अमिताभ-विनोद में छिड़ी थी जंग, 70s का यह एक्टर बना 'साइलेंट सुपरस्टार', चुपके से तहस-नहस किया बॉक्स ऑफिस
अमिताभ-विनोद के दौर में यह एक्टर चुपचाप बना था ‘हिट मशीन’

70 का दशक हिंदी सिनेमा में स्टारडम की नई परिभाषा लिख रहा था. एक तरफ अमिताभ बच्चन अपनी एंग्री यंग मैन इमेज के साथ छाए हुए थे, दूसरी तरफ विनोद खन्ना तेजी से मजबूत दावेदार बनकर उभर रहे थे. इसी दौर में एक ऐसा एक्टर भी था, जिसने बिना ज्यादा शोर किए अपनी अलग पहचान बना ली. हम बात कर रहे हैं जितेंद्र की, जिन्होंने सफेद जूतों और अपने यूनिक डांसिंग स्टाइल के साथ खुद को इंडस्ट्री के सबसे भरोसेमंद और महंगे सितारों में शामिल कर लिया था. क्या थी कहानी और कैसे किया उन्होंने ऐसा, आइए जानते हैं.

जब बदल रहा था बॉलीवुड का मिजाज 

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70 के दशक के बीच तक आते-आते हिंदी सिनेमा का मिजाज बदल चुका था. राजेश खन्ना का रोमांटिक दौर ढलान पर था और दर्शक नई तरह की कहानियों और नए एक्टर्स को ज्यादा तवज्जो दे रहे थे. इसी समय जितेंद्र अपने करियर के ऐसे मोड़ पर थे, जहां उन्हें नई पहचान की जरूरत थी. शुरुआत में जितेंद्र को उनके एनर्जेटिक डांस और खास अंदाज के लिए ‘जंपिंग जैक' कहा जाता था. लेकिन 1974 के बाद उन्होंने अपने काम में बदलाव किया. बिदाई और खुशबू जैसी फिल्मों ने यह दिखाया कि वह सिर्फ डांस और हल्के-फुल्के रोल्स तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गहराई वाले किरदार भी निभा सकते हैं. वहीं धरम वीर जैसी फिल्मों ने उन्हें बड़े स्तर पर लोकप्रिय बनाए रखा.

साउथ के साथ जुड़कर बना ‘हिट फॉर्मूला'

जितेंद्र की सफलता की असली कहानी यहीं से शुरू होती है. उन्होंने साउथ इंडियन फिल्ममेकर्स के साथ लगातार काम करना शुरू किया. कई फिल्मों के हिंदी रीमेक में उन्होंने लीड रोल निभाया. इन फिल्मों का बजट कंट्रोल में रहता था और कमाई मजबूत होती थी. जहां उस समय बड़े सितारे साल में दो या तीन फिल्में करते थे, वहीं जितेंद्र आठ से दस फिल्मों के साथ थिएटर में मौजूद रहते थे. यह लगातार दिखने वाली मौजूदगी उन्हें डिस्ट्रीब्यूटर्स का फेवरेट बना रही थी.

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1980 में मिला मेहनत का पूरा फल

साल 1980 जितेंद्र के करियर का बड़ा मोड़ साबित हुआ. उनकी फिल्म आशा ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया. इसी दौरान विनोद खन्ना ने फिल्मों से दूरी बना ली, जिससे इंडस्ट्री में एक खाली जगह बनी. इस मौके का फायदा जितेंद्र ने पूरी तरह उठाया. उनकी डिमांड तेजी से बढ़ी और वह फीस के मामले में अमिताभ बच्चन को टक्कर देने लगे. कई प्रोजेक्ट्स में वह सबसे महंगे स्टार्स में गिने जाने लगे.

डिसिप्लिन और काम का तरीका बना पहचान

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जितेंद्र की सफलता सिर्फ फिल्मों की संख्या तक सीमित नहीं थी. उनका काम करने का तरीका भी चर्चा में रहता था. वह समय पर सेट पर पहुंचते, दिन में दो शिफ्ट में काम करते और लगातार कई प्रोजेक्ट्स संभालते थे. उनकी इसी मेहनत का असर यह हुआ कि स्वर्ग नरक, ज्योति बने ज्वाला और जुदाई जैसी फिल्मों ने उन्हें हर घर तक पहुंचा दिया.

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उस दौर में भले ही नंबर वन की रेस में अमिताभ बच्चन आगे थे, लेकिन जितेंद्र ने बिना ज्यादा शोर किए अपनी अलग ताकत खड़ी कर ली थी. 1974 से 1979 के बीच रखी गई मजबूत नींव ने 1980 तक उन्हें उस मुकाम पर पहुंचा दिया, जहां वह इंडस्ट्री के सबसे भरोसेमंद और हाई-वैल्यू स्टार बन चुके थे.

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