विज्ञापन

67 साल में एक भी बेटी नहीं लांघ सकी स्कूल की दहलीज, सरकारी स्कूल में सिसक रहा 'शिक्षा का अधिकार'

आज जब शिक्षा को लेकर केंद्र व राज्‍य सरकारों की ओर से नित्‍य नई योजनाएं चलाई जा रही हैं, 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' जैसे नारे देश भर में बोले जा रहे हैं, तो एक ऐसा स्‍कूल भी है जहां पिछले कई दशकों से एक भी बेटी का दाखिला नहीं हो सका है.

67 साल में एक भी बेटी नहीं लांघ सकी स्कूल की दहलीज, सरकारी स्कूल में सिसक रहा 'शिक्षा का अधिकार'

आज जब शिक्षा को लेकर केंद्र व राज्‍य सरकारों की ओर से नित्‍य नई योजनाएं चलाई जा रही हैं, 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' जैसे नारे देश भर में बोले जा रहे हैं, तो एक ऐसा स्‍कूल भी है जहां पिछले कई दशकों से एक भी बेटी का दाखिला नहीं हो सका है. यह स्‍कूल है उत्‍तर प्रदेश के बस्ती जनपद के कलवारी क्षेत्र में, जहां पिछले सात दशकों से बेटियों के लिए शिक्षा के द्वार बंद हैं. यूं तो ये स्‍कूल बाल-बालिका विद्यालय है यानी कोएड एजुकेशन यहां होनी थी, लेकिन यहां 67 सालों से एक भी बेटी का एडमिशन नहीं हुआ है.स्‍कूल का नाम है- झिनकू लाल त्रिवेणी राम चौधरी इंटर कॉलेज. इस स्‍कूल में महिला शौचालय ही नहीं है. ग्रामीणों का आरोप है कि स्‍कूल प्रबंधक का स्कूल के बगल में प्राइवेट कॉलेज चलता है, जहां वो मोटी फीस लेकर एडमिशन करता है. 
​ 
1957 में बाल-बालिका विद्यालय की मान्‍यता 
इस स्‍कूल को वर्ष 1957 में बालक-बालिका के साथ पढ़ने की सरकारी मान्यता मिली थी. सरकारी रिकॉर्ड में यह कॉलेज समान शिक्षा का केंद्र है. लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि यहां की दहलीज लांघना किसी भी छात्रा के लिए नामुमकिन बना दिया गया है. ​ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कॉलेज प्रबंधन ने पास ही में अपना एक निजी विद्यालय खोल रखा है. सरकारी इंटर कॉलेज में लड़कियों का दाखिला रोककर उन्हें निजी स्कूल में मोटी फीस देने पर मजबूर किया जाता है. जो बेटियां प्राइवेट स्कूल की फीस नहीं भर पातीं, वे बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को विवश हैं. यह सीधे तौर पर संविधान द्वारा दिए गए शिक्षा के अधिकार का हनन है. 

प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर सरकार ने लगाया फुल-स्टॉप, महंगी किताब-यूनिफार्म की टेंशन खत्म, नियम हुए सख्त

छात्राओं की आपबीती 
​स्थानीय छात्राओं की आपबीती सुनकर किसी का भी कलेजा कांप सकता है. पढ़ाई छोड़ चुकी एक छात्रा ने बताया कि उसकी कई सहेलियों ने शिक्षा के लिए प्रबंधन के सामने हाथ जोड़े, मिन्नतें कीं, लेकिन उन्हें दुत्कार कर भगा दिया गया. सवाल यह है कि क्या सरकारी जमीन और सरकारी संसाधनों पर चल रहे इस कॉलेज में प्रबंधन की मर्जी कानून से ऊपर है? स्थानीय जागरूक निवासी प्रभाकर बेटियों की शिक्षा को लेकर अभियान छेड़ दिया है, वे कॉलेज के गेट पर बेटियों का एडमिशन करने के लिए कॉलेज को जागरुक करने में जुटे हुए हैं. बावजूद आज भी इस अदभुत विद्यालय में एक भी बेटी का दाखिला नहीं हो सका है. वहीं, एक बच्ची के पिता तो शौचालय सीट लेकर विद्यालय को देने आ गए ताकि बालिका शौचालय का निर्माण हो सके और बेटियां भी यहां शिक्षा ग्रहण कर सकें. 

हरकत में आया जिला प्रशासन ​
​इस मामले के सोशल मीडिया में तूल पकड़ने के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया है. डीआईओएस संजय सिंह ने मामले को संज्ञान में लेते हुए कहा यह अत्यंत गंभीर मामला है. हमने विद्यालय से तत्काल स्पष्टीकरण मांगी है. जांच के लिए विशेष अधिकारी तैनात किया गया है. यदि भेदभाव की पुष्टि होती है, तो कॉलेज की मान्यता रद्द करने से लेकर प्रबंधन पर कानूनी कार्रवाई तक की जाएगी. उन्‍होंने कहा सोमवार से इस विद्यालय में बेटियों का दाखिला सुनिश्चित कराया जाएगा. वहीं, प्रिंसिपल अज्ञाराम चौधरी ने कहा बालिका शौचालय न होने की वजह से एडमिशन नहीं हो पा रहे, इसके अलावा इस स्कूल के बच्चियों के लिए व्यवस्था नहीं है, प्रबंधन के आदेश पर बालिकाओं का एडमिशन यहां अब नहीं लिया जाता है.  

JEE स्कोर तय नहीं कर सकता है आपकी कीमत, ये पांच शानदार करियर ऑप्शन चुन सकते हैं आप

गुस्‍से में हैं ग्रामीण ​
​ग्रामीणों और अभिभावकों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि जल्द ही लड़कियों का दाखिला शुरू नहीं हुआ और दोषी प्रबंधन पर गाज नहीं गिरी, तो वे मुख्यमंत्री कार्यालय का दरवाजा खटखटाएंगे और जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन करेंगे. जब देश अंतरिक्ष में बेटियां भेज रहा है, तब बस्ती में एक कॉलेज का गेट बेटियों के लिए बंद होना शर्मनाक है. 

(इनपुट- सतीश श्रीवास्तव)

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com