बसंत पंचमी आते ही जिंदगी में पीला रंग उतर आता है - सरसों के फूल, गेंदे की मालाएं, नई ऋतु का स्वागत और ज्ञान की देवी मां सरस्वती की आराधना. देशभर में इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा होती है, बच्चे विद्या आरंभ करते हैं, घरों में खिचड़ी बनती है और माता-पिता संतान के लिए ज्ञान, विवेक और मधुर वाणी का आशीर्वाद मांगते हैं. लेकिन दिल्ली के दिल में बसी हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह में बसंत पंचमी सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि 700 साल पुरानी सूफ़ी परंपरा बनकर हर साल रूहों को जोड़ देती है.
जब गम में डूबे पीर और बेचैन शागिर्द
इतिहास के मुताबिक, हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने भतीजे ख़्वाजा तकीउद्दीन नूह के इंतकाल के बाद गहरे शोक में चले गए थे. पीर की ये उदासी उनके सबसे प्रिय शागिर्द अमीर ख़ुसरो से देखी नहीं गई. सूफ़ी परंपरा में गुरु-शिष्य का रिश्ता सिर्फ़ ज्ञान का नहीं, दिल का होता है और जब दिल उदास हो, तो शागिर्द चैन से कैसे रहे?
बसंत बना गम का मरहम
बसंत का मौसम था. चारों ओर पीले फूल, सरसों की बहार और जीवन के लौट आने का एहसास. अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि शायद बसंत के रंग उनके पीर के दिल का बोझ हल्का कर सकें. कहा जाता है कि बसंत पंचमी के दिन अमीर ख़ुसरो पीले कपड़े पहनकर, हाथों में सरसों और फूल लिए दरगाह पहुंचे. ढोलक की थाप पर कव्वाली शुरू हुई. ख़ुसरो ने अपने कलाम के ज़रिये बसंत को आवाज़ दी और अपने पीर को याद किया. उसी दिन, बरसों बाद, निज़ामुद्दीन औलिया के चेहरे पर मुस्कान लौटी और वहीं से बसंत पंचमी निज़ामुद्दीन दरगाह की रिवायत बन गई.
आज भी पीले रंग में डूबी दरगाह
आज भी बसंत पंचमी के दिन निज़ामुद्दीन दरगाह पीले रंग में सजी नजर आती है. सिर पर पीले साफे, हाथों में फूल, तालियों और ढोलक के साथ सूफ़ी कव्वाली-माहौल बेहद रूहानी हो उठता है. अमीर ख़ुसरो का कलाम सदियों की दूरी मिटा देता है.
यहां कोई धर्म नहीं पूछा जाता, कोई पहचान नहीं मांगी जाती. हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई -सभी एक ही चौखट पर सिर झुकाते हैं, मन्नत मांगते हैं और शांति की तलाश में आते हैं.
गंगा-जमुनी तहज़ीब की ज़िंदा मिसाल
बसंत पंचमी भले ही इस्लामिक त्योहार न हो, लेकिन निज़ामुद्दीन दरगाह में यह सूफ़ी सोच, इंसानियत और मोहब्बत का उत्सव है. यही वजह है कि सदियों बाद भी यह परंपरा टूटती नहीं, बल्कि हर साल और गहरी होती जाती है. बसंत पंचमी पर जब निज़ामुद्दीन की फिज़ा में अमीर ख़ुसरो का कलाम गूंजता है, तो लगता है मानो इतिहास आज भी सांस ले रहा हो. और दरगाह की ये सदियों पुरानी रिवायत आज भी यही पैग़ाम देती है -
आस्था चाहे जिस रास्ते से आए,
मंज़िल इंसानियत और मोहब्बत ही होती है.














