वर्ल्ड कप से दो हफ़्ते पहले डिफेंडिंग चैंपियन टीम इंडिया की तैयारी ठोस नजर आ रही है. एक टॉपर स्टूडेंट- छात्र की तरह कप्तान सूर्या की सेना ने सबसे बड़े इम्तिहान के लिए अपनी तैयारी दुरुस्त कर ली है. ओपनर्स में अभिषेक शर्मा, टॉप ऑर्डर में ईशान किशन, मिडिल ऑर्डर में सूर्यकुमार यादव, हार्दिक पांड्या के साथ पेसर्स हर्षित राणा-बुमराह-अशर्दीप और स्पिनर्स कुलदीप यादव और वरुण चक्रवर्ती की पहेलियां हल हो गई दिखती हैं.
वर्ल्ड कप में जाने से पहले, पूरी उम्मीद है कि, अगले 13 दिनों में टीम इंडिया परीक्षा के सभी पहलुओं और भी अच्छी तरह ठोक बजाकर परख लेगी. फिर भी, टूर्नामेंट में ऐक ऐसा X- फ़ैक्टर भी है जिसे लेकर ना सिर्फ़ टीम इंडिया बल्कि सभी 20 टीमों को मुश्किल होने वाली है और वो है Dew यानी ओस का फ़ैक्टर.
‘साबुन की परत' का चैलेंज: गावस्कर
पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर ओस से भीगी रात में वाइट गेंद के चैलेंज की तुलना ‘साबुन की परत या बार ऑफ़ सोप' से करते रहे हैं और इससे दुनिया भर के गेंदबाज़ और एक्सपर्ट्स सहमत नज़र आते हैं. ओस के साथ गेंदबाज़ी करना, पेसर हो या स्पिनर सबके लिए मुश्किल साबित होता है और टी-20 वर्ल्ड कप 2026 में ये एक बड़ा फ़ैक्टर साबित होने जा रहा है.
सुनील गावस्कर इस पर लंबे समय से बात करते रहे हैं. ओस, ज़ाहिर तौर पर, अक्सर गेंदबाज़ों का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है. जब, पेसर्स हों या स्पिनर्स सबके लिए ओस की वजह से गेंद को ग्रिप करना या पकड़ना मुश्किल जो जाता है.
ओस मिटाती है टीमों में अंतर
पूर्व भारतीय ऑफ-स्पिनर आर अश्विन कहते हैं, "टीमों के बीच क्वालिटी का फ़र्क नहीं दिख रहा है क्योंकि अगर आप टॉस हार जाते हैं तो ओस इस अंतर को कम कर देती है.
क्रिकेट कॉमेन्टेटर हर्षा भोगले ओस के गेंदबाज़ों पर असर पर बात करते हुए कहते हैं, "अगला बड़ा डेथ बॉलर सबसे अच्छा ओस बॉलर होगा।" यानी वर्ल्ड कप के दौरान भी ओस पर कंट्रोल करने की काबिलियत एक उम्दा बॉलर का पैमाना साबित होगी.
ओस अक्सर, यॉर्कर को फुल टॉस में बदल देता है. गेंद धीमी हो जाती है. स्पिनर ग्रिप नहीं कर पाते और गेंद को टर्न नहीं मिल पाता. गेंदें स्किड कर जाती हैं. यहां तक कि फ़ील्डिंग, कैच करना भी मुश्किल हो जाता है. ओस, टॉप क्लास गेंदबाज़ को भी कई बार बेबस कर देता है.
अगर मैदान पर ओस ज़्यादा हो तो लक्ष्य का पीछा कर रही टीम ज़्यादा मैच जीत पाती है. आंकड़े भी इस बात की गवाही देते रहे हैं. वर्ल्ड कप के मैच भी भारत में दिल्ली, अहमदाबाद, कोलकाता, चेन्नई, मुंबई और श्रीलंका में कोलंबो और पैलेकेले के स्टेडियम में खेले जाएंगे. इन जगहों के स्टेडियम में फरवरी-मार्च की गर्माहट भरी रातों और समुद्र की हवाओं की वजह से ओस का असर कहीं ज़्यादा हो सकता है.
उपमहाज्वीप में जब 7 फ़रवरी से 8 मार्च के बीच थोड़ी गर्मी बढ़ेगी तो ये मुश्किल और भी बढ़ने वाली है. दुनिया की सभी 20 टीमों के गेंदबाज़ों के लिए सबसे बड़ा दुश्मन किसी बैटर से कहीं ज़्यादा ओस के फ़ैक्टर को कंट्रेल करना होगा. हरभजन सिंह ने टीम इंडिया के लिए इसका एक हल भी सुझाया है.
टर्बनेटर ने सुझाया हल
पूर्व भारतीय क्रिकेटर हरभजन सिंह, द टर्बनेटर, ने कहा कि मैच में ओस हो या गेंद गीली हो तो तेज़ गेंदबाज़ भी सटीक गेंदबाज़ी नहीं कर सकता. लेकिन मैचविनर गेंदबाज़ (मसलन, बुमराह, अर्शदीप, हर्षित, कुलदीप और वरुण चक्रवर्ती) विकेट निकाल सकते हैं. इसलिए उनके मुताबिक टीम इंडिया मैच में 8 नंबर के बैटर के बजाए 5 स्पेशलिस्ट गेंदबाज़ों के साथ जाना चाहिए. ऐसा करने से ओस के फ़ैक्टर का एक सॉल्यूशन, हल निकल सकता है.
भज्जी का मानना है कि इन मैचों में वरुण चक्रवर्ती और कुलदीप यादव दोनों को एक साथ खिलाना चाहिए, क्योंकि ये मैचविनर गेंदबाज़ हैं. उन्होंने कहा कि अगर मैच फंसा हो तो ये दोनों गेंदबाज़ मैच निकाल सकते हैं.
रायपुर टी-20 मैच, भारत बनाम न्यूज़ीलैंड का उदाहरण देते हुए टर्बनेटर ने कहा कि इस मैच में दोनों गेंदबाज़ों ने कुल मिलाकर 70 रन खर्चे और तीन विकेट निकाल दिए. कुलदीप यादव ने 35 रन देकर 2 विकेट (4-0-35-2) लिए और वरुण चक्रवर्ती ने 35 रन देकर 1 विकेट (4-0-35-1) अपने नाम किया. वो भी तब जब कि विकेट सपाट है और गेंद गीली.
वर्ल्ड कप में ओस रहेगा सॉलिड 12वां खिलाड़ी
भारत और श्रीलंका में होनेवाले वर्ल्ड कप के दौरान ओस की भूमिका टीम की रैंकिंग और टीम के स्तर में नहीं चमकेगी. लेकिन ये एक ऐसा फ़ैक्टर है जो सभी टीमों की रणनीति का हिस्सा रहेगी. ओस की वजह से इस टूर्नामेंट में कुछ मैचों में बड़ी टीमों को झटका खाते हुए भी देखा जा सकेगा.
गेंदबाज़ी पर ओस का असर
फिंगर स्पिनर्स के लिए गेंद को घुमाव देने में होती है मुश्किल: फिंगर स्पिनर्स के लिए गेंद को घुमाव देने के काबिलियत उनकी पकड़ या ग्रिप पर करती है. ओस की मौजूदगी वाइट बॉल पर ग्रिप को मज़बूत नहीं होने देती और स्पिन का ज़ोर पूरी तरह नहीं चल पाता है.
कलाई के स्पिनर्स के लिए
एक्सपर्ट्स के मुताबिक कलाई के स्पिनर्स के लिए भी ग्रिप करना मुश्किल होता है. लेकिन कलाई के स्पिनर्र का इन हालात में इस्तेमाल बेहतर होता है. वो ज़्यादा कारगर साबित होते हैं. जैसे कि, बांये हाथ के कलाई के स्पिनर कुलदीप यादव. इसलिए कुलदीप यादव से टीम इंडिया को मौजूदा वर्ल्ड कप में बड़ी उम्मीदें रहेंगी.
पेसर्स पर ओस का असर
पेसर्स की भी गीली गेंद पर पकड़ नहीं होने से उनकी रफ़्तार, लाइन और लेंथ पर असर पड़ता है. अक्सर गेंद रीलीज़ में मुश्किल होती है. यॉर्कर गेंद फ़ुलटॉस में और लेग स्टंप पर टारगेट की गई गेंद वाइड या नो बॉल बन जाती है.
टॉस का बॉस, एक्स्ट्रा रनों पर कंट्रोल
इन मैचों में अक्सर टॉस की अहमियत बढ़ जाती है. अगर मैदान पर देर रात ओस बढ़ती है तो हर बार टॉस जीतने वाली टीमें पहले गेंदबाज़ी करना चाहेंगी. यही नहीं हर कप्तान चाहेगा कि इन हालात में उनके फ़ील्डर्स मुस्तैद रहें और गेंदबाज़ कम से कम एक्स्ट्रा रन खर्चें.
टॉस पर किसी टीम का कंट्रोल नहीं इसलिए ओस पर गेंदबाज़ों का कंट्रोल टीम और मैच की रणनीति तय करेगी. ओस 2026 के टी-20 वर्ल्ड कप का सबसे प्रभावी 12वां खिलाड़ी और मैच का X फ़ैक्टर साबित हो सकता है.
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