जम्मू कश्मीर पहली बार रणजी चैंपियन, 'यह बिशन सिंह बेदी को याद करने का दिन'

Ranji Trophy Final, Jammu and Kashmir vs Karnataka: जैसे ही युधवीर सिंह ने कर्नाटक की पहली पारी का आखिरी विकेट लिया, मेरी मुस्कान थमने का नाम नहीं ले रही थी. जम्मू-कश्मीर अब शनिवार को रणजी ट्रॉफी चैंपियन बनने जा रहा है.

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Jammu Kashmir's first cricketer Parvez Rasool Blog

जैसे ही युधवीर सिंह ने कर्नाटक की पहली पारी का आखिरी विकेट लिया, मेरी मुस्कान थमने का नाम नहीं ले रही थी. जम्मू-कश्मीर अब शनिवार को रणजी ट्रॉफी चैंपियन बनने जा रहा है. यह अब सपना नहीं, हकीकत है. लगभग सात दशकों के इंतजार के बाद हमें 'राष्ट्रीय चैंपियन' कहलाने का गौरव मिलने जा रहा है. पिछले डेढ़ दशक से हम इस दिन का इंतजार कर रहे थे, जब जम्मू-कश्मीर एक प्रतिस्पर्धी टीम से आगे बढ़कर मजबूत दावेदार बनने लगा था. 

मेरी कप्तानी में भी हम क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे, मुंबई जैसी मजबूत टीम को हराया, लेकिन औकिब नबी ने जो कर दिखाया है, वह कल्पना से परे है. यह ऐसा प्रदर्शन है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. मुझे लगता है वह दिन दूर नहीं जब औकिब भारत की जर्सी पहनते नजर आएंगे. इस सफलता का श्रेय हालांकि सिर्फ औकिब ही नहीं बल्कि सभी को जाता है जिसमें कप्तान परस डोगरा, मुख्य कोच अजय शर्मा और खिलाड़ी कामरान इकबाल, शुभम पुंडीर, सुनील कुमार और अब्दुल समद शामिल हैं. 

टीम के हर सदस्य को इसका श्रेय जाता है. अगर यह पूछा जाये कि जम्मू-कश्मीर के लिए यह रणजी ट्रॉफी जीत कितनी बड़ी है तो मैं सिर्फ एक तथ्य बताऊंगा कि 67 वर्षों से हम घरेलू क्रिकेट खेल रहे हैं, लेकिन आज भी जम्मू और घाटी में हमारे पास प्रथम श्रेणी स्तर के केवल दो ही क्रिकेट मैदान हैं. 

औकिब का घर मेरे घर से और भी 40 किलोमीटर अंदरूनी इलाके में है. मुझे आज भी याद है कि अंडर-16 या अंडर-19 ट्रायल के लिए हमें रोज 100 किलोमीटर (आना-जाना) जाना पड़ता था. बिजबेहारा से मैं सुबह-सुबह बस पकड़ता और शाम को लौटता. कई बार बस ड्राइवर और कंडक्टर हमें सिर्फ इसलिए बिठाने से मना कर देते थे क्योंकि हमारे बड़े किटबैग अन्य यात्रियों के लिए परेशानी बनते थे. हर पीढ़ी ने कठिनाइयों का सामना किया है और इस मेहनत का फल इससे ज्यादा मीठा नहीं हो सकता. 

जब हम जम्मू-कश्मीर क्रिकेट के इतिहास के सबसे बड़े पल का जश्न मना रहे हैं तो उन सभी लोगों को कृतज्ञता के साथ याद करना जरूरी है जिन्होंने इस क्षेत्र के क्रिकेट को आगे बढ़ाने में योगदान दिया. आज का दिन दिवंगत बिशन सिंह बेदी को याद करने का है जिन्होंने प्रतिस्पर्धा का बीज बोया. बेदी सर सख्त और अनुशासनप्रिय थे. उन्होंने हमें सिखाया कि सिर्फ भाग लेना नहीं, बल्कि मुकाबला करना है.

एक समय था जब जम्मू-कश्मीर टीम हर मैच हारकर लौट आती थी. वह हार मान लेने वाली मानसिकता थी जिसे बदलने की जरूरत थी. इस काम के लिए उनसे बेहतर कौन हो सकता था. विश्व स्तरीय खिलाड़ी और पूर्व भारतीय कप्तान ने हमें विश्वास दिलाया कि हमारे पास शीर्ष घरेलू टीमों को चुनौती देने की प्रतिभा है. बेदी सर मैदान पर किसी तरह की राजनीति बर्दाश्त नहीं करते थे. एक समय गुटबाजी चरम पर थी.

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यहां तक कि एक बार बीसीसीआई मैच के लिए जम्मू-कश्मीर की दो टीमें पहुंच गई थीं. लेकिन बेदी सर हमेशा कहते थे,"तुम्हारा काम अपने खेल पर ध्यान देना है, बाहरी बातों पर नहीं. बस खुद को सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनाने पर ध्यान दो." आयु वर्ग के शिविरों से कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी निकले जिन्होंने राज्य टीम का प्रतिनिधित्व किया. बेदी सर के बाद सुनील जोशी ने भी अपने संक्षिप्त कार्यकाल में बेहतरीन काम किया. 

उनके कोच रहते हमने पहली बार मुंबई को हराया. इरफान पठान ने भी खिलाड़ी-सह-मार्गदर्शक (मेंटोर) के रूप में युवाओं को निखारने में अहम भूमिका निभाई. औकिब की बात करें तो उनका यहां तक पहुंचना गर्व की बात है. 2018 में जब मैं कप्तान था, तब हमने उन्हें विजय हजारे ट्रॉफी के लिए चुना था. आयु वर्ग स्तर पर वह शानदार प्रदर्शन कर चुके थे और बेहतरीन सत्र के दम पर सीनियर टीम में आए. पहली बार हमने उनके बारे में तब सुना था जब उन्होंने आयु वर्ग में शतक जमाया था. 

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औकिब की सबसे बड़ी खूबी उनकी एकाग्रता और शांत मानसिकता है. वह ‘अपना काम करो और घर जाओ' वाले मंत्र पर काम करता है. वह बेहद अंतर्मुखी है, कम बोलता है, लेकिन कप्तान की अपेक्षाओं को हमेशा समझता है. क्वार्टर फाइनल, सेमीफाइनल और फाइनल में 26 विकेट लेने वाला खिलाड़ी खास ही होता है. उनकी बल्लेबाजी भी साधारण निचले क्रम के खिलाड़ी जैसी नहीं है. वह किसी भी टीम में नंबर आठ की भूमिका निभा सकते हैं. यह जीत निश्चित रूप से इस क्षेत्र के बच्चों को बड़े सपने देखने का हौसला देगी और यह तो बस शुरुआत है.

(यह ब्लॉग परवेज रसूल ने लिखा है, जो भारत के लिए खेलने वाले जम्मू-कश्मीर के पहले क्रिकेटर हैं)

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