T20 World Cup 2026: रविवार को अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में न्यूजीलैंड (Ind vs Nz Final) को फाइनल में हराकर लगातार दूसरी बार विश्व कप जीतने वाली टीम इंडिया के दुनिया भर में चर्चे हो रहे हैं. मैनेजमेंट कॉलेज में इसके उदाहरण दिए जा रहे हैं. कुल मिलाकर इस खिताबी जीत ने इस फॉर्मेट में नया मानक स्थापित करते हुए अगले मेगा संस्करण के लिए भविष्य के खिलाड़ियों के लिए एक नया चैलेंज भी खड़ा कर दिया. बहररहाल, अगर टीम इंडिया ने पूरे टूर्नामेंट में सफर में कुछ खिलाड़ी विशेष की विफलताओं के बीच अगर बड़ी उपलब्धि हासिल की, तो उसके पीछे यूं तो कई वजह रहीं, लेकिन आप उन 5 बड़े कारणों पर गौर फरमा लीजिए, जिसने भारत को को चैंपियन बना दिया.
1. संजू सैमसन की सनसनी!
इसमें दो राय नहीं कि भारत की जीत की सबसे बड़ी एक वजह संजू सैमसन रहे. वह भले ही 5 मैच खेले, लेकिन काम उन्होंने ऐसा कर डाला, जो बाकी बल्लेबाज 7 या 8 मैचों में नहीं कर सके. जरा कोई कप्तान सूर्यकुमार के दिल से पूछे! सबसे बड़ी जरूरत यानी आखिरी तीन नॉकआउट मैचों में सैमसन ने एक के बाद एक सुपर इनिंग रूपी मिसाइल विरोधी टीमों पर गिराईं, तो देखते ही देखते क्रमश: विंडीज, फिर इंग्लैंड और सबसे आखिर में न्यूजीलैंड सैमसन मिसाइल में तबाह हो गए. सैमसन ने 5 मैचों में 80.25 के औसत से 321 रन बनाए. और स्ट्राइक-रेट तो पूछिए मत! 9 मैच खेलने वाले न्यूजीलैंड के एलन फिन (200) के बाद शीर्ष दस बल्लबाजों में सबसे ज्यादा सैमसन (199.37) का ही रहा. चंद मिलीमीटर से दूर रह गए!
2. बूम-बूम बुमराह !
अब तो यह कहना ही पड़ेगा कि लाइन वहीं से शुरू होती है, जहां बुमराह खड़े होते हैं. इस दौर के बॉलरों में तो कम से कम यह बात उन पर लागू होती है. आंकड़ों से ही नहीं, कई उन बातों से भी खुद को चैंपियन साबित किया, जो आंकड़ों की किसी किताब की किसी कैटेगिरी में नहीं ही आतीं. मसलन इंग्लैंड के खिलाफ सेमीफाइनल में आखिरी 5 में से उनक दो ओवरों में दिए सिर्फ 14 रनों को किसी भी रिकॉर्डबुक की कैटेगिरी में जगह नहीं ही मिल पाएगी, लेकिन ये लोगों के दिल में छप गया है. बुमराह ने 8 मैचों में सबसे ज्यादा 14 विकेट लिए. इकॉनमी रन-रेट रहा 6.21 का. वाह बुमराह वाह!
3. हार्दिक का ऑलराउंड प्रदर्शन
पिछले विश्व कप की विजेता टीम के सदस्य रहे हार्दिक भी खिताब जीत तक के सफर में टीम की रीढ़ बने रहे. यह सही है कि उनका प्रदर्शन असाधारण नहीं रहा, लेकिन यह बहुत अहम जरूर रहा. और उन्होंने बल्ले और गेंद का बढ़िया संतुलन स्थापित किया. पांड्या ने 9 मैचों में 27.12 के औसत से 217 रन बनाए, तो वही उन्होंने इतने ही मैचों में फेंके 9 विकेट भी चटकाए.
4. वरुण चक्रवर्ती...और " बड़ी जरूरत के साथी" !
अगर किसी की भी नजर वरुण चक्रवर्ती पर जाएगी, तो उसे सिर्फ इस मिस्ट्री स्पिनर की पिटाई ही याद आएगी. इंग्लैंड के खिलाफ बुरी तरह कुटाई हुई, तो और भी कुछ मैचों में इसी से मिलता-जुलता हुआ. लेकिन यह जानकर ये लोग चौंक जाएंगे कि वरुण 14 विकेट चटकाकर बुमराह के बराबर संयुक्त रूप से नंबर-1 गेंदबाज रहे. बाकी पहलुओं को छोड़ देते हैं. और कुछ ऐसा ही जरूरत पर बड़े साथी बन गए इशान किशन, शिमव दुबे और तिलक वर्मा के बारे में कहा जा सकता है. इशान किशन के 9 मैचों में 35.22 के औसत से 317 रन, सिवम दुबे के 9 मैचों में 39.16 के औसत से 235 रन और तिलक वर्माा के 9 मैचों में 29.57 के औसत से 207 रन. इनमें से कुछ के औसत बहुत मामूली हैं, लेकिन जब आप इनके कारनामे को मैच दर मैच, घटना दर घटना और हालात दर हालात के हिसाब से देखेंगे, तो पाएंगे कि इन जरूरत के साथियों का योगदान जीत में कितना बड़ा है.
5. कमाल का गंभीर टीम प्रबंधन!
बात चाहे चीफ सेलेक्टर अजीत अगरकर की हो, या खुद गौतम गंभीर, सहायक कोच रियान टेन डोइशचेट, सहायक कोच सुतांशु कोटक, मोर्न मॉर्कल, फील्डिंग कोच टी दली या फिर कोई और. सभी ने बहुत शानदार काम नहीं, बल्कि सबसे आड़े समय गजब की निर्णय क्षमता दिखाई. खासकर तब जब अभिषेक शर्मा लगातार फ्लॉप हो रहे थे. तब जब फाइनल में हर कोई अभिषेक की बलि की मांग कर रहा था, वरुण को बाहर बैठाने की मांग कर रहा था, लेकिन प्रबंधन अपनी सोच से टस से मस नहीं हुआ. यह टीम इंडिया की जीत ही नहीं, यह प्रबंधन की खुद में, अपने फैसलों में भरोसे की बहुत बड़ी जीत रही. और भारत ने विश्व कप जीता, तो इसमें प्रबंधन खासकर गौतम गंभीर का बड़ा योगदान रहा. पूरे टूर्नामेंट के दौरान भारतीय प्रबंधन ने सबसे बड़ी जरूरत पर सही और सटीक फैसले लिए.
(खबर बड़ी है...)














