बंगाल में 48 से 96 घंटे की शराबबंदी पर विवाद, आबकारी विभाग ने बिक्री में “असामान्य उछाल” का दिया हवाला

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बीच 48 घंटे की जगह 96 घंटे की शराबबंदी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. आबकारी विभाग के आदेश पर कारोबारियों ने आपत्ति जताई है, जबकि टीएमसी और बीजेपी के बीच इसे लेकर सियासी आरोप‑प्रत्यारोप तेज हो गए हैं.

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  • पश्चिम बंगाल के आबकारी विभाग ने विधानसभा चुनाव के मद्देनजर शराबबंदी का समय 48 घंटे से बढ़ाकर 96 घंटे कर दिया
  • जिला प्रशासन ने मतदाताओं को प्रभावित करने से रोकने के लिए शराब की दुकानों को बंद रखने के आदेश जारी किए हैं
  • EC ने स्पष्ट किया है कि कानून के तहत केवल मतदान समाप्ति से 48 घंटे पहले और मतगणना के दिन ही शराबबंदी लागू
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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बीच शराबबंदी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार मतदान से पहले 48 घंटे का ‘ड्राई डे' लागू होना चाहिए, वहीं राज्य के आबकारी विभाग ने इसे बढ़ाकर 96 घंटे तक करने का निर्देश जारी किया है. राज्य के आबकारी आयुक्त द्वारा 19 अप्रैल 2026 को जारी आदेश में कहा गया है कि मॉडल आचार संहिता के दौरान शराब की बिक्री में “असामान्य उछाल” देखा गया है. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि राज्य के डिपो से पैकेज्ड शराब की बिक्री अचानक बढ़ी है और संवेदनशील दुकानों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. इसे देखते हुए प्रशासन ने सख्ती बढ़ाने का फैसला लिया.

48 घंटे की जगह 96 घंटे की पाबंदी

आदेश में कहा गया है कि चुनाव के दौरान शराब को मतदाताओं को प्रभावित करने के रूप में इस्तेमाल होने से रोकने के लिए कड़े कदम उठाना जरूरी है. इसी आधार पर जिलाधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे 48 घंटे के बजाय 96 घंटे तक शराब की दुकानों को बंद रखें. इस निर्देश के बाद जिला प्रशासन जैसे दक्षिण 24 परगना और उत्तर 24 परगना ने 20 से 23 अप्रैल तक (पहले चरण के मतदान के लिए) और 25 से 29 अप्रैल तक (दूसरे चरण के मतदान के लिए) शराब की दुकानों को बंद रखने का आदेश जारी किया है. इसके अलावा 4 मई, यानी मतगणना के दिन भी ‘ड्राई डे' घोषित किया गया है. बता दे की इन दोनों ज़िलो में चुनाव दूसरे चरण में है.

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EC के नियम बनाम राज्य का आदेश

 चुनाव आयोग के 20 अप्रैल के प्रेस नोट में स्पष्ट किया गया है कि कानून, RP एक्ट की धारा 135C के तहत केवल मतदान समाप्ति से 48 घंटे पहले और मतगणना के दिन ही शराब की बिक्री और वितरण पर रोक लगाई जाती है.  इसी अंतर को लेकर विवाद गहराता जा रहा है. शराब कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि जिन इलाकों में किसी चरण में मतदान नहीं हो रहा, वहां भी लंबी अवधि के लिए प्रतिबंध लगाया गया है, जिससे व्यापार पर भारी असर पड़ रहा है. खासकर कोलकाता जैसे बड़े बाजारों में इसका असर ज्यादा देखने को मिल सकता है. 

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हजारों करोड़ के नुकसान की आशंका

उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार, राज्य में करीब 5400 लाइसेंसधारी शराब की दुकानें और बार हैं, जिनका रोजाना कारोबार 80–90 करोड़ रुपये के बीच होता है. अनुमान है कि इस विस्तारित प्रतिबंध से 9.5 दिनों से राज्य को 1400 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हो सकता है. इसका असर रेस्टोरेंट और अन्य खानपान के कारोबार पर भी पड़ेगा, क्योंकि शराब बिक्री से इनकी आय का बड़ा हिस्सा आता है. राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं. टीएमसी के नेताओं ने आरोप लगाया है कि इस तरह के कड़े प्रतिबंध आम लोगों और कारोबारियों के लिए परेशानी बढ़ाते हैं और कई मामलों में यह जरूरत से ज्यादा सख्ती है. 

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टीएमसी ने EC पर लगाए आरोप

एनडीटीवी से बातचीत में टीएमसी के प्रवक्ता रिजु दत्ता ने कहा कि बंगाल में शराब बिक्री पर बढ़ाई गई पाबंदी भारत निर्वाचन आयोग की हताशा को दर्शाती है. उन्होंने कहा, “भारतीय जनता पार्टी जानती है कि वह राज्य में 50 सीटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाएगी, और यही कारण है कि अब वे इतने बौखला गए हैं कि बंगाल में आपातकाल जैसी स्थिति बनाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे निर्देश दिखाते हैं कि पश्चिम बंगाल के असली मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के बाद ईसीआई भी अपना संतुलन खो चुका है.”

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बीजेपी बोली- सख्ती से रुकेगा उपद्रव

वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि यह कदम राज्य में मतदाताओं को डराने-धमकाने वाले असामाजिक तत्वों को रोकने में मदद करेगा, जैसा कि पहले देखा गया है. बीजेपी नेता शिशिर बाजोरिया ने कहा , “शराब अक्सर उपद्रवियों को और अधिक उग्र बना देती है, यह कदम उन्हें मतदाताओं को डराने से रोकेगा. हालांकि, किसी ऐसे राज्य की अर्थव्यवस्था, जो काफी हद तक आबकारी राजस्व पर निर्भर है, उसकी चिंता करना ईसीआई का काम नहीं है.” चुनावी प्रक्रिया के बीच आम तौर पर रूटीन माने जाने वाले ‘ड्राई डे' इस बार बंगाल में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनता दिख रहा हैं.

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