खास बातें
- भारत ने वर्ष 2011 में अमेरिका की सरकारी प्रतिभूतियों में अपना निवेश 6.3 अरब डॉलर (लगभग 30,000 करोड़ रुपये) कम किया है।
नई दिल्ली: भारत ने वर्ष 2011 में अमेरिका की सरकारी प्रतिभूतियों में अपना निवेश 6.3 अरब डॉलर (लगभग 30,000 करोड़ रुपये) कम किया है। हालांकि इसी दौरान जापान, फ्रांस, ब्राजील तथा ब्रिटेन जैसे देशों ने अमेरिकी बांड में निवेश बढ़ाया है।
अमेरिकी सरकार की ऋण प्रतिभूति अमेरिकी ट्रेजरी बांड धारकों के बारे में जारी आंकड़ों के अनुसार मूल्य के हिसाब से अमेरिकी प्रतिभूति रखने के मामले में भारत 2011 के अंत में 18वें स्थान पर रहा जबकि एक साल पहले वह 15वें स्थान पर था।
हालांकि, चीन अमेरिकी बांड का सबसे बड़ा धारक बना हुआ है लेकिन उसने भी 2011 में अपना निवेश घटाया है। ताइवान, हांगकांग, रूस, लक्जमबर्ग तथा सिंगापुर जैसे अन्य देशों ने भी अमेरिकी प्रतिभूतियों में अपना निवेश घटाया है।
बहरहाल, जापान, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, कनाडा, जर्मनी, थाईलैंड, आयरलैंड, बेल्जियम तथा दक्षिण कोरिया ने अमेरिकी ट्रेजरी बांड में निवेश बढ़ाया है।
दिसंबर 2011 तक भारत के पास 34.2 अरब डॉलर मूल्य का अमेरिकी ट्रेजरी बांड था। वहीं चीन के पास 1100 अरब डालर मूल्य का अमेरिकी प्रतिभूति था।
भारत के पास दिसंबर 2010 में 40.5 अरब डालर मूल्य का अमेरिकी प्रतिभूति था। चीन के पास 1,160 अरब डालर मूल्य का बांड था जो अब 1,100 अरब डॉलर कर रह गया है।
जिन अन्य प्रमुख देशों के पास अधिक मूल्य का अमेरिकी प्रतिभूति है, उनमें जापान (1004 अरब डॉलर), ब्रिटेन (414.8 अरब डॉलर), ब्राजील (206.9 अरब डॉलर) तथा ताइवान (149.2 अरब डॉलर) शामिल हैं। स्विट्जरलैंड तथा हांगकांग के पास भी 100 अरब डॉलर मूल्य से अधिक का अमेरिकी बांड है।