Rupee vs Dollar: ईरान-इजरायल युद्ध और मिडिल-ईस्ट के तनाव ने भारतीय रुपये की कमर तोड़ दी है. सोमवार को रुपया इतिहास में पहली बार 95 प्रति डॉलर के ऑल टाइम लो लेवल पार कर गया. लेकिन कारोबार के अंत में 15 पैसे की मजबूती के साथ 94.70 प्रति डॉलर पर बंद हुआ. बीते दिन कारोबार के दौरान रुपये में 165 पैसे का उतार-चढ़ाव देखने को मिला. इंटरबैंक फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में मचे हाहाकार के बीच देश के सबसे बड़े बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की एक इकॉनोमिक रिसर्च रिपोर्ट सामने आई है. SBI ने रिजर्व बैंक (RBI) को सलाह दी है कि अब हाथ पर हाथ धरे बैठने का नहीं, बल्कि एक्शन लेने का वक्त है.
1. 700 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के इस्तेमाल का सुझाव
SBI की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के पास 700 अरब डॉलर (USD 700 Billion) से ज्यादा का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) है. यह इतना पैसा है कि हम 10 महीने से ज्यादा का आयात आसानी से कर सकते हैं. SBI का कहना है कि RBI को इस भंडार का इस्तेमाल बाजार में दखल देने और रुपये को गिरने से बचाने के लिए करना चाहिए. सिर्फ बुरे दिनों के लिए पैसे बचाकर रखने का कोई मतलब नहीं, जब आज ही जरूरत खड़ी है.
2. तेल कंपनियों के लिए अलग स्पेशल विंडो
भारत की तेल कंपनियां (OMCs) रोज बाजार से करीब 250-300 मिलियन डॉलर खरीदती हैं. SBI ने सुझाव दिया है कि RBI को इन कंपनियों के लिए एक 'स्पेशल विंडो' खोलनी चाहिए. इससे तेल कंपनियों की डॉलर डिमांड आम बाजार से अलग हो जाएगी, जिससे डॉलर की किल्लत कम होगी और रुपये पर दबाव घटेगा.
3. सट्टेबाजों को डराना जरूरी
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार सट्टेबाजी करने वालों को डराने के लिए काफी है. अगर RBI बाजार में उतरकर डॉलर बेचना शुरू करता है, तो रुपये में आ रही बेवजह की गिरावट तुरंत थम सकती है.
4. 100 मिलियन डॉलर की लिमिट पर फिर से विचार की जरूरत
RBI ने हाल ही में रुपये को गिरने से बचाने के लिए बैंकों के लिए 100 मिलियन डॉलर की जो नेट ओपन पोजीशन (Net Open Position) लिमिट तय की है, उस पर SBI ने सवाल उठाए हैं. RBI ने बैंकों को विदेशी मुद्रा बाजार में अपनी 'नेट ओपन पोजीशन' (NOP) को 100 मिलियन डॉलर तक सीमित रखने का निर्देश दिया है.यह नियम बैंकों को 10 अप्रैल तक लागू करने के लिए कहा गया है.
लेकिन SBI रिपोर्ट में कहा गया है कि यह नियम पूरे बैंक पर लागू करने के बजाय सिर्फ ट्रेडिंग पर होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो विदेशी निवेशक (FPIs) अपना पैसा निकालते समय बैंकों के लिए ऑपरेशनल मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं.
5. ऑफशोर मार्केट में बढ़ी टेंशन
मिडिल ईस्ट युद्ध (West Asia crisis) की वजह से विदेशी बाजारों (Offshore Market) में रुपये की हालत और भी खराब दिख रही है. 1 साल के लिए प्रीमियम 3.43% से बढ़कर 4.19% हो गया है. SBI का मानना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो बाजार में कैश (Liquidity) की भारी कमी हो सकती है.
वित्त वर्ष 2025-26 में डॉलर के मुकाबले रुपये में 9.8% गिरावट
भारतीय रुपये के लिए वित्त वर्ष 2025-26 काफी चुनौतीपूर्ण रहा है, जिसमें डॉलर के मुकाबले इसमें 9.88 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई. यह पिछले 14 सालों की सबसे बड़ी गिरावट है, इससे पहले साल 2011-12 में रुपया 12.4 प्रतिशत तक कमजोर हुआ था. इस बार रुपये पर दबाव बढ़ने की मुख्य वजह विदेशी फंड्स की लगातार निकासी, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और दुनिया भर में डॉलर का मजबूत होना रहा है. इसके अलावा, अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए टैरिफ और मिडल-ईस्ट में चल रहे युद्ध ने हालात को और बिगाड़ दिया, जिससे डॉलर की मांग और कच्चे तेल के दाम दोनों बढ़ गए.
बाजार के जानकारों का कहना है कि रुपये की यह कमजोरी सिर्फ घरेलू कारणों से नहीं, बल्कि वैश्विक उथल-पुथल और नकदी की तंगी की वजह से भी है. दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ भारतीय करेंसी ही नहीं, बल्कि अन्य एशियाई करेंसी भी डॉलर के सामने पस्त दिखी हैं. बाजार के जानकारों के अनुसार,पिछेल साल एक अप्रैल से अब तक जापानी येन में 6 प्रतिशत और फिलिपीन के पीसो में 5.74 प्रतिशत और दक्षिण कोरियाई वॉन 2.88 प्रतिशत की गिरावट आई है.














