स्टार्टअप की दुनिया में 'अर्श से फर्श' तक पहुंचने की कहानियां तो आपने बहुत सुनी होंगी, लेकिन शॉपक्लूज (ShopClues) की कहानी सबसे अलग और चौंकाने वाली है. एक समय था जब यह कंपनी देश की दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनियों को टक्कर दे रही थी, लेकिन आज इसका नाम उन स्टार्टअप्स में शुमार है जिनका साम्राज्य देखते ही देखते ढह गया. साल 2016 में करीब 1.1 अरब डॉलर यानी करीब 9,000 करोड़ रुपये की वैल्यूएशन वाली यह कंपनी 2019 में कौड़ियों के भाव बिक गई. आखिर कहां हुई चूक? आइए आसान भाषा में समझते हैं शॉपक्लूज के अर्श से फर्श पर पहुंचने की पूरी इनसाइड स्टोरी...
'ऑनलाइन चांदनी चौक' के आइडिया से मिली शुरुआती कामयाबी
शॉपक्लूज ने अपनी शुरुआत एक बहुत ही अनोखे विजन के साथ की थी. उसने खुद को "ऑनलाइन चांदनी चौक" के रूप में पेश किया. उनका टारगेट महानगर नहीं, बल्कि टियर-2 और टियर-3 शहरों के वो ग्राहक थे जो कम कीमत में बिना ब्रांड वाला सामान ढूंढते थे. जब अमेजन और फ्लिपकार्ट बड़े शहरों पर ध्यान दे रहे थे, तब शॉपक्लूज ने छोटे शहरों के दिलों में जगह बना ली यानी शुरुआती सफलता हासिल की. इस स्ट्रैटजी ने शॉपक्लूज को उस समय तेजी से विस्तार करने में मदद की लेकिन यही रणनीति बाद में उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई.
अमेजन-फ्लिपकार्ट की एंट्री और खराब क्वालिटी ने बिगाड़ा खेल
शॉपक्लूज का मॉडल तब लड़खड़ाने लगा जब अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे दिग्गजों ने छोटे शहरों में दमदार एंट्री की. इन कंपनियों ने बेहतर लॉजिस्टिक्स, भारी डिस्काउंट और सबसे जरूरी भरोसा दिया.जैसे-जैसे कॉम्पीटीशन तेज होती गई, शॉपक्लूज अपना मार्केट शेयर खोने लगा. दूसरी तरफ, शॉपक्लूज के अनऑर्गेनाइज्ड सेलर्स की वजह से क्वालिटी का कंट्रोल हाथ से निकल गया. जल्द ही प्लेटफॉर्म पर नकली और खराब सामान की शिकायतें बढ़ने लगीं. आलम यह था कि 30-40 प्रतिशत सामान वापस होने लगा, जिससे ग्राहकों का भरोसा पूरी तरह टूट गया.
को-फाउंडर पर इनसाइडर ट्रेडिंग के आरोपों से निवेशकों ने खींचे हाथ
कंपनी की मुश्किलें सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं थीं. अंदरूनी उथल-पुथल ने भी आग में घी का काम किया. को-फाउंडर संदीप अग्रवाल को अमेरिका में इनसाइडर ट्रेडिंग के आरोपों के कारण पद छोड़ना पड़ा. इसके बाद राधिका अग्रवाल और संजय सेठी ने कमान संभाली, लेकिन फाउंडर्स के बीच हुए सार्वजनिक विवादों ने निवेशकों को डरा दिया. जब कंपनी को निवेश की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब निवेशकों ने हाथ पीछे खींच लिए.
वैल्यूएशन से 90% कम में बिकी कंपनी
खुद को शेयर बाजार (IPO) के लिए तैयार करने के चक्कर में शॉपक्लूज ने मार्केटिंग खर्चों में भारी कटौती कर दी. इसका नतीजा यह हुआ कि ग्राहकों की संख्या तेजी से गिरी और बिजनेस का ग्राफ नीचे चला गया. नए निवेश के सारे प्रयास विफल रहे. कारोबारी चुनौतियों के चलते अंत में, 2019 में सिंगापुर की कंपनी Qoo10 ने गुरुग्राम की कंपनी शॉपक्लूज को महज 70-100 मिलियन डॉलर में खरीद लिया.जो कि इसके पहले के वैल्यूएशन से 90 प्रतिशत कम था.इसे ही बिजनेस की दुनिया में 'डिस्ट्रेस सेल' कहा जाता है.
2015 में शॉपक्लूज छोड़ने के बाद संदीप अग्रवाल ने 'ड्रूम' (Droom) की शुरुआत की, जो सेकंड हैंड गाड़ियों का ऑनलाइन मार्केट है. हालांकि, ड्रूम भी इस वक्त पुणे, जयपुर और हरियाणा में जीएसटी जांच का सामना कर रहा है. कंपनी का कहना है कि वे सभी कानूनों का पालन कर रहे हैं. वहीं, शॉपक्लूज की कहानी आज भी नए स्टार्टअप्स के लिए एक सबक है कि सिर्फ सस्ते सामान के दम पर आप लंबे समय तक टिक नहीं सकते.














