पेट्रोल 113 रुपये और डीजल 123 का बिकता, अगर...! हर दिन 1,600 करोड़ रुपये का नुकसान सह रहीं कंपनियां 

Petrol Diesel Prices Hikes Update: तेल कंपनियों का घाटा बढ़कर पेट्रोल पर 18 रुपये और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर हो गया है, बावजूद कीमतें नहीं बढ़ाई गईं. मार्च में एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बाद भी तेल कंपनियों का घाटा कम नहीं हुआ, कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है.

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Petrol Diesel Prices Hike: क्‍या पेट्रोल-डीजल की कीमतें क्‍या बढ़ने वाली है?

Petrol Diesel Prices Hike: मिडिल ईस्‍ट तनाव के चलते अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर कच्‍चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच दुनियाभर के कई देशों में पेट्रोल-डीजल महंगे हुए हैं. पाकिस्‍तान-बांग्‍लादेश में तो कीमतें बेहिसाब बढ़ी हैं. बावजूद इसके भारत में कीमतें स्थिर हैं. कार-बाइक की टंकी भरवाना आपको महंगा नहीं पड़ रहा. आपकी जेब पर महंगाई का बोझ नहीं पड़ रहा. लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि अगर कच्‍चे तेल के महंगे होने का असर आप तक पहुंचता तो पेट्रोल-डीजल कितना महंगा होता? ऐसा होता तो पेट्रोल करीब 94 रुपये नहीं, बल्कि 113 रुपये/लीटर मिल रहा होता, जबकि डीजल इससे भी महंगा, 88 रुपये की बजाय करीब 123 रुपये/लीटर खरीदना पड़ता. 

आप सोचेंगे कि ये हमने कैसा कैलकुलेशन लगा दिया! दरअसल, समाचार एजेंसी PTI ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) का पेट्रोल पर घाटा बढ़कर 18 रुपये/लीटर और डीजल पर 35 रुपये/लीटर हो गया है. इन कंपनियों ने लागत में भारी बढ़ोतरी के बावजूद पंपों पर कीमतों को स्थिर रखा हुआ है.

4 साल से लगभग स्थिर हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतें 

एक दशक से ज्‍यादा समय हो चुके हैं, जब से पेट्रोल-डीजल की कीमतें नियंत्रण मुक्त (deregulated) हैं. इसके बावजूद, करीब 4 साल से कीमतें स्थिर हैं. सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) ने अप्रैल 2022 से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में बदलाव नहीं किया है. इस दौरान में वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है. जैसे कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद 100 डॉलर/बैरल से ऊपर जाने से लेकर इस साल की शुरुआत में 70 डॉलर के आसपास आने तक. पिछले महीने तो ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद कच्‍चे तेल की कीमतें फिर से 120 डॉलर के करीब पहुंच गई थीं. बावजूद इसके पेट्रोल-डीजल के दाम देश में नहीं बढ़े हैं. 

हर दिन 1,600 करोड़ का घाटा 

उद्योग जगत के सूत्रों ने बताया कि ये तीनों कंपनियां पिछले महीने के चरम पर प्रतिदिन लगभग 2,400 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही थीं, जो अब घटकर लगभग 1,600 करोड़ रुपये दैनिक रह गया है. यह कमी तब आई जब सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (Excise duty) में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की-यह कटौती उपभोक्ताओं को नहीं दी गई, बल्कि इसका उपयोग आंशिक रूप से घाटे की भरपाई के लिए किया गया.

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इतना घाटा हुआ कि सारा प्रॉफिट खत्‍म! 

मार्च में हुए घाटे ने जनवरी और फरवरी में हुए सभी लाभ को खत्म कर दिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि ये तीनों कंपनियां जनवरी-मार्च तिमाही में घाटा दर्ज कर सकती हैं. 'मैक्वेरी ग्रुप' ने अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि मौजूदा समय में कच्चे तेल की कीमतें $135-$165 प्रति बैरल होने पर भारत की तेल कंपनियां पेट्रोल पर 18 रुपये और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर का नुकसान उठा रही हैं. 

रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की हर बढ़ोतरी मार्केटिंग घाटे में लगभग 6 रुपये प्रति लीटर जोड़ देती है. ब्रोकरेज ने संकेत दिया है कि इस महीने के अंत में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे प्रमुख राज्यों में चुनाव के बाद खुदरा ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी की प्रबल संभावना है.

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मार्च में एक्‍साइज ड्यूटी में कटौती 

भारत, जिसने 2025 में अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत आयात किया था, वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है. आयात का लगभग 45 प्रतिशत मध्य पूर्व से, 35 प्रतिशत रूस से और 6 प्रतिशत अमेरिका से आया. इसके बावजूद, देश डीजल, पेट्रोल और विमानन ईंधन (ATF) सहित प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों का शुद्ध निर्यातक बना रहा.

मार्च में उत्पाद शुल्क में ₹10 की कटौती के बाद, अब पेट्रोल पर केंद्रीय लेवी ₹11.9 प्रति लीटर और डीजल पर ₹7.8 प्रति लीटर है. रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा कीमतों पर उत्पाद शुल्क को पूरी तरह हटाने से भी तेल कंपनियों के घाटे की भरपाई नहीं होगी.

बढ़ सकता है राजकोषीय घाटा 

टैक्स में और कटौती के राजकोषीय निहित महत्वपूर्ण हो सकते हैं. वित्त वर्ष 2026 में लगभग 170 बिलियन लीटर की खपत के आधार पर, उत्पाद शुल्क को पूरी तरह से वापस लेने से सालाना लगभग $36 बिलियन का राजस्व नुकसान हो सकता है, जिससे राजकोषीय घाटा (fiscal deficit) लगभग 80 आधार अंक (basis points) बढ़ सकता है.

मैक्वेरी की रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की उच्च कीमतें भारत के विदेशी संतुलन के लिए भी जोखिम पैदा करती हैं. चालू खाता घाटा (current account deficit), जो 2025 के मध्य में संतुलन के करीब था, 2026 की पहली तिमाही में बढ़कर लगभग 20 बिलियन डॉलर होने की उम्मीद है. यदि कोई नीतिगत कदम नहीं उठाया जाता है, तो कच्चे तेल में 10 डॉलर प्रति बैरल की निरंतर वृद्धि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 30 आधार अंकों तक घाटे को बढ़ा सकती है.

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