PM Modi Meloni Melody Gift: पीएम मोदी ने जब इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी को Melody टॉफी का एक पैकेट गिफ्ट किया, तो इंटरनेट पर मीम्स की बाढ़ आ गई. लेकिन बात सिर्फ सोशल मीडिया तक नहीं रुकी, इसकी गूंज शेयर बाजार तक सुनाई दी. निवेशकों में पारले नाम को लेकर ऐसी दीवानगी बढ़ी कि शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनी Parle Industries के शेयरों में बंपर तेजी आ गई. लेकिन इस पूरी कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट है. जिस पारले इंडस्ट्रीज के शेयर भागे, उसका मेलोडी टॉफी बनाने वाली कंपनी से कोई लेना-देना ही नहीं है. वहीं दूसरी तरफ, मेलोडी और पारले जी बिस्कुट बनाने वाली असली कंपनी पारले प्रोडक्ट्स के लिए बीता फाइनेंशियल ईयर 2025 कमाई के मामले में तो शानदार रहा, लेकिन मुनाफे के मोर्चे पर उसे तगड़ा झटका लगा है. चलिए इस खबर में आपको बताते हैं कि पारले के बिजनेस के साथ पिछले साल क्या हुआ और क्यों इसकी कमाई बढ़ने के बाद भी तिजोरी खाली रह गई.
शेयर बाजार का कन्फ्यूजन
पीएम मोदी और मेलोनी के मेलोडी डिप्लोमेसी के बाद जैसे ही ये नाम चर्चा में आया, शेयर बाजार के निवेशकों ने बिना सोचे-समझे 'Parle Industries' के स्टॉक खरीदने शुरू कर दिए. देखते ही देखते इस स्टॉक में उछाल आ गया. मजेदार बात ये है कि मेलोडी टॉफी, पारले-जी बिस्कुट और हाइड एंड सीक बनाने वाली मूल कंपनी पारले प्रोडक्ट्स शेयर बाजार में लिस्टेड ही नहीं है. ये एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है. बाजार में लिस्टेड पारले इंडस्ट्रीज एक बिल्कुल अलग कंपनी है, जिसे सिर्फ एक जैसे नाम होने की वजह से लॉटरी लग गई. इसे बिजनेस की भाषा में सेंटीमेंटल रैली कहते हैं, जहां सिर्फ नाम के बज की वजह से गलत शेयर भी दौड़ने लगते हैं.
फाइनेंशियल ईयर 25 में पारले प्रोडक्ट्स की परफॉर्मेंस
असली पारले (Parle Products) के लिए वित्तीय वर्ष 2025 का साल मिला-जुला रहा. महंगाई के दौर में भी पारले के प्रोडक्ट्स की मांग में कोई कमी नहीं आई. गांव से लेकर शहरों तक लोगों ने पारले के बिस्कुट और चॉकलेट जमकर खरीदे. यही वजह है कि फाइनेंशियल 2025 में कंपनी की टोटल सेल करीब 8.5% बढ़कर 15,568 करोड़ रुपये हो गई. अगर इसमें कंपनी की दूसरे निवेशों से होने वाली कमाइयों को भी जोड़ दें, तो पारले की कुल इनकम 16,190.98 करोड़ रुपये के पार रही.
हालांकि कहानी यहीं खत्म नहीं होती. भले ही पारले का सामान दुकानों पर खूब बिका और रेवेन्यू में इजाफा हुआ, लेकिन जब बात नेट प्रॉफिट की आई, तो कंपनी के चेहरे पर मायूसी छा गई. पारले प्रोडक्ट्स का नेट प्रॉफिट पिछले साल के मुकाबले लगभग 39% घट गया. ये गिरकर 979.53 करोड़ रुपये पर आ गया. यानी कंपनी ने धंधा तो बड़ा किया, लेकिन उसकी इन-हैंड सेविंग्स बहुत कम हो गई.
ऐसा क्यों हुआ?
अब सवाल उठता है कि जब मेलोडी और बिस्कुट ज्यादा बिके, तो मुनाफा कम क्यों हुआ? दरअसल बिस्कुट और कन्फेक्शनरी बनाने के लिए गेहूं, चीनी, दूध और पाम ऑयल जैसे कच्चे माल की जरूरत होती है. पिछले साल वैश्विक उथल-पुथल की वजह से इन सभी चीजों के दाम आसमान छू रहे थे. इसके अलावा पैकेजिंग मटीरियल और ट्रांसपोर्टेशन का खर्च भी काफी बढ़ गया. पारले ने अपने ग्राहकों को बनाए रखने के लिए बिस्कुट और टॉफी के दाम तो नहीं बढ़ाए, लेकिन इसका सीधा असर कंपनी के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ा और मुनाफा कम हो गया.
बिजनेस का टेकअवे
एफएमसीजी सेक्टर में पारले जैसी कंपनियां हमेशा मास वॉल्यूम पर काम करती हैं. जब कच्चे माल की कीमत बढ़ती है, तो ये कंपनियां 5 रुपये वाले पारले-जी का पैकेट 7 रुपये का नहीं करतीं, बल्कि पैकेट के अंदर बिस्कुट का वजन थोड़ा कम कर देती हैं. लेकिन जब महंगाई ज्यादा बढ़ जाए, तो ये प्लान भी काम नहीं आता और सीधे मुनाफा कम हो जाता है.
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