ईरान और इजरायल-अमेरिका की जंग को पहला एनर्जी वॉर क्‍यों कह रहे एक्‍सपर्ट? जानिए भारत के लिए कहां है अवसर

Iran-Iraq war- इस युद्ध ने दुनियाभर के देशों को तेल और गैस संकट से जूझने को मजबूर कर दिया है. एक्‍सपर्ट इसे पहले एनर्जी वर्ल्‍ड वॉर यानी ऊर्जा विश्व युद्ध' (First Energy World War) के रूप में देख रहे हैं. 

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मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में जंग जारी है. ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से वापसी का रास्ता बेहद कठिन नजर आता है. इजरायल दशकों से ईरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता रहा है और अब वह उसे मटियामेट करने के अपने पुराने सपने को पूरा करने में जुटा है. लंबे समय तक इस तरह के युद्ध से बचने के बाद, अब अमेरिका भी इजरायल के साथ इस भीषण जंग में पूरी तरह फंस चुका है. इस युद्ध ने दुनियाभर के देशों को तेल और गैस संकट से जूझने को मजबूर कर दिया है. सीनियर एनर्जी एक्‍सपर्ट नरेंद्र तनेजा इसे केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे पहले एनर्जी वर्ल्‍ड वॉर यानी ऊर्जा विश्व युद्ध' (First Energy World War) के रूप में देख रहे हैं. 

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एनर्जी संकट नहीं, एनर्जी वॉर 

जाने-माने ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा के अनुसार, हम इतिहास के सबसे बुरे ऊर्जा संकट से नहीं, बल्कि पहले 'ऊर्जा विश्व युद्ध' से गुजर रहे हैं. तनेजा का कहना है कि इस युद्ध से दुनिया का लगभग कोई भी देश अछूता नहीं रहा है.

महाशक्तियों पर संकट: सऊदी अरब जैसा ऊर्जा का 'सुपरपावर' आज सबसे गहरे आर्थिक और भू-राजनीतिक दर्द से गुजर रहा है. यहां तक कि बेहद अमीर और पश्चिमी यूरोप को ऊर्जा की आपूर्ति करने वाला नॉर्वे भी संकट में है, क्योंकि वहां पेट्रोल और बिजली की आसमान छूती कीमतों ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है.

गरीबों पर मार: 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) में गरीबों को खाना पकाने के लिए वापस केरोसिन (मिट्टी के तेल) का इस्तेमाल करने को कहा जा रहा है. भारत में भी कई रसोईघरों में केरोसिन की वापसी हो रही है.

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अमेरिका की कमजोरी और बदलता सिक्‍योरिटी स्‍ट्रक्‍चर 

नरेंद्र तनेजा बताते हैं कि इस युद्ध ने अमेरिका की कमजोरियों को दुनिया के सामने उजागर कर दिया है. ईरान द्वारा कतर के 'रास लफान' (Ras Laffan) एलएनजी हब पर बमबारी की गई, जिसे अमेरिका अपना बड़ा सैन्य बेस होने के बावजूद नहीं बचा सका.

संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और कुवैत जैसे हाइड्रोकार्बन संपन्न देश अपनी रक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर थे, लेकिन आज वे खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं. तनेजा के अनुसार, खाड़ी देशों में अब यह अहसास बढ़ रहा है कि अमेरिका अब वह पुरानी महाशक्ति नहीं रहा और उसकी ताकत तेजी से घट रही है. यही कारण है कि अब ये देश अपनी सुरक्षा के लिए भारत, चीन, यूरोप और जापान की ओर नई नजरों से देख रहे हैं.

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भारत के लिए क्या हैं 'एक्स फैक्टर्स' और अवसर?

तनेजा का मानना है कि 'नया मिडिल ईस्ट' अब अमेरिका पर कम निर्भर होगा और भारत जैसी उभरती शक्तियों के साथ गहरे ऊर्जा और सुरक्षा संबंध तलाशेगा. भारत के लिए इसमें कई बड़ी चुनौतियां भी हैं और अवसर भी छिपे हैं. 

$150 प्रति बैरल का खतरा: अगर अमेरिका ईरान के तेल निर्यात केंद्र 'खर्ग द्वीप' (Kharg Island) पर हमला करता है, तो कच्चे तेल की कीमतें $150 प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं. हालांकि, बाजार के कुछ तंत्र इसे $200 के पार जाने से रोक सकते हैं, लेकिन युद्ध हमेशा अनिश्चित होता है.

रणनीतिक निवेश की जरूरत: भारत को केवल तेल और गैस खरीदने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. नरेंद्र तनेजा का सुझाव है कि भारत को युद्ध के बाद के ईरान सहित पूरे क्षेत्र में तेल और गैस उत्पादन संपत्तियों में हिस्सेदारी (Stakes) खरीदने पर जोर देना चाहिए.

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घरेलू इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर में FDI: भारत को खाड़ी देशों से तेल एक्‍सप्‍लोरेशन, उत्पादन और रणनीतिक भंडारण (Strategic Storage) के क्षेत्र में अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की मांग करनी चाहिए. इसके अलावा एलएनजी और एलपीजी जहाजों के निर्माण (Shipbuilding) में भी सहयोग बढ़ाना चाहिए.

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नरेंद्र तनेजा का मानना है कि मिडिल ईस्ट अब पहले जैसा कभी नहीं रहेगा. भारत जैसे देशों के लिए चुनौती ये है कि वे इस बढ़ते ऊर्जा युद्ध के बीच अपनी जरूरतों को कैसे सुरक्षित रखते हैं. जहां एक तरफ सप्लाई बाधित होने से मांग में गिरावट आ रही है, वहीं दूसरी तरफ ये स्थिति भारत को इस क्षेत्र में एक नए सुरक्षा और ऊर्जा साझेदार के रूप में स्थापित होने का मौका भी दे रही है.

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