Power Consumtion in India on Peak: देश में बिजली की खपत ने 16 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. जनवरी में देश में बिजली की मांग 143 बिलियन यूनिट (BU) पहुंच गई, जो कि पिछले 16 साल में एक महीने में सबसे ज्यादा है. इससे पहले मई-जून की प्रचंड गर्मी में भी बिजली की डिमांड ऐसी नहीं रही थी. ऊर्जा मंत्रालय के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले डेढ़ दशक में देश में जनवरी में बिजली की मांग और खपत रॉकेट की रफ्तार से बढ़ी है. 2011-12 के आसपास जनवरी में बिजली की मांग 70-75 बिलियन यूनिट (BU) रहा करती थी, वो हाल के वर्षों में 120-130 BU के पार पहुंच गई है. बिजली की खपत का इस कदर बढ़ना देश की बदलती अर्थव्यवस्था और बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को दिखाती है. जहां 2011–12 के आसपास जनवरी में बिजली की मांग करीब 70–75 बिलियन यूनिट (BU) थी, वहीं हाल के वर्षों में यह 120 BU के पार पहुंच गई.
पिछले दिनों आई क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट बताती है कि जनवरी में बिजली की मांग 4.5% बढ़कर 143 BU तक पहुंच गई, जो 2010 के बाद इस महीने का सबसे ऊंचा स्तर है. सर्दी की लहर, इंडस्ट्री की रफ्तार और बदलती खपत के पैटर्न ने इस उछाल को आगे बढ़ाया है.
ठंड की लहर और हीटिंग डिमांड ने बदला ट्रेंड
आमतौर पर देश में बिजली की सबसे ज्यादा मांग गर्मियों में होती है, लेकिन इस बार जनवरी में पीक डिमांड 245 गीगावॉट तक पहुंच गई, जो पिछले साल जून के 243 गीगावॉट के समर पीक से भी ज्यादा रही. क्रिसिल के मुताबिक, 9 जनवरी के आसपास उत्तर भारत में पड़ी तेज ठंड के कारण हीटर, गीजर और लाइटिंग की मांग बढ़ी, जिससे बिजली खपत अचानक ऊपर चली गई. इससे साफ है कि अब सर्दियां भी बिजली सिस्टम के लिए चुनौती बनती जा रही हैं.
जनवरी में बिजली की डिमांड कैसे बढ़ी है, इसे 15 साल के चार्ट से समझने की कोशिश करते हैं.
15 साल का डेटा क्या कहता है?
अगर आप 2011 से 2026 तक के जनवरी आंकड़ों को देखें तो एक साफ ट्रेंड नजर आता है कि बिजली की खपत किस तेज रफ्तार से बढ़ी है. इसमें एक बड़ा फैक्टर इलेक्ट्रिफिकेशन का भी है. पहले देशभर के गांव, गली-कूची तक बिजली की पहुंच नहीं थी, लेकिन हाल के दशक में बिजली की पहुंच और उत्पादन दोनों बढ़ा है. गांवों में बिजली पहुंची तो वहां रहन-सहन के स्तर में भी सुधार आया है, लोगों की लाइफस्टाइल चेंज हुई है. टीवी, फ्रिज, कूलर और यहां तक कि एसी और गीजर जैसे उपकरण भी खूब इस्तेमाल किए जा रहे हैं.
- 2011-2013: मांग कम बेस से शुरू हुई, क्योंकि तब ग्रामीण विद्युतीकरण तेजी से हो रहा था.
- 2014-2016: इंडस्ट्री रिकवरी के साथ धीरे-धीरे खपत बढ़ी.
- 2017-2019: आर्थिक गतिविधि और ग्रामीण कनेक्शन बढ़ने से तेज ग्रोथ दिखी.
- 2020: कोविड के कारण हल्की गिरावट देखी गई, क्योंकि औद्योगिक गतिविधियों पर ब्रेक लगा.
- 2021 के बाद: बिजली मांग ने तेज रिकवरी की और हर साल नया स्तर छुआ.
डेटा बताता है कि जनवरी की बिजली खपत करीब 72 BU से बढ़कर 144 BU से ज्यादा हो चुकी है यानी लगभग दोगुनी हो गई है.
आखिर क्यों लगातार बढ़ रही है जनवरी की मांग?
क्रिसिल रिपोर्ट में मैन्युफैक्चरिंग PMI का बढ़कर 55.4 पर पहुंचना भी अहम कारण बताया गया है. इसका मतलब है कि फैक्ट्रियां और औद्योगिक गतिविधियां लगातार चल रही हैं, जिससे बिजली की जरूरत बढ़ रही है. शहरी कमर्शियल लोड, डेटा सेंटर, ई-कॉमर्स वेयरहाउस और डिजिटल सर्विस सेक्टर भी अब सर्दियों में बेसिक बिजली मांग को ऊंचा बनाए रखते हैं.
डेटा और सेक्टर ट्रेंड्स मिलाकर देखें तो देश में बिजली की बढ़ती मांग के पीछे चार बड़े कारण सामने आते हैं.
1). हर घर तक बिजली (Electrification)
सौभाग्य और दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना जैसी योजनाओं ने करोड़ों ग्रामीण परिवारों को पहली बार ग्रिड से जोड़ा है. इस 'बेसलाइन' विस्तार के कारण अब उन दूरदराज के इलाकों से भी बिजली की स्थाई मांग आ रही है, जहां पहले बिजली का बुनियादी ढांचा तक मौजूद नहीं था.
2). आर्थिक विस्तार (Economic Expansion)
भारत की जीडीपी ग्रोथ के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में भारी उछाल आया है, जो सीधे तौर पर ऊर्जा की खपत बढ़ाता है. 'मेक इन इंडिया' के तहत नई फैक्ट्रियों का लगना और डेटा सेंटर्स का तेजी से विस्तार होना बिजली की औद्योगिक मांग को रिकॉर्ड स्तर पर ले जा रहा है.
3). लाइफस्टाइल बदलाव (Changing Lifestyle and EV Load)
मध्यम वर्ग की बढ़ती आय के कारण अब घरों में हीटर, गीजर, एसी और हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स का उपयोग एक जरूरत बन गया है. इसके अलावा, इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के बढ़ते चलन ने चार्जिंग स्टेशनों के रूप में एक नया और भारी बिजली लोड सिस्टम पर डाल दिया है.
4). मौसम का असर (Extreme Weather Impact)
जलवायु परिवर्तन के कारण अब गर्मियों में भीषण हीटवेव और सर्दियों में अत्यधिक ठंड के दौर लंबे खिंचने लगे हैं. इन चरम स्थितियों में कूलिंग (AC/Cooler) और हीटिंग उपकरणों का एक साथ इस्तेमाल होने से ग्रिड पर अचानक 'पीक लोड' की स्थिति पैदा हो जाती है, जो मांग को अनियंत्रित कर देती है.
पावर मार्केट में क्या बदला?
जनवरी में रियल-टाइम मार्केट (RTM) की वॉल्यूम 52.8% बढ़कर 4,638 मिलियन यूनिट हो गई. वहीं बिजली के दाम कम हुए. RTM में औसत कीमत 16% गिरकर 3.72 रुपये प्रति यूनिट हो गई. वहीं, डे-अहेड मार्केट (DAM) में कीमत 13% गिरकर 3.86 रुपये प्रति यूनिट हो गई. कम कीमतों ने डिस्कॉम और इंडस्ट्री को एक्सचेंज से सस्ती बिजली खरीदने का मौका दिया, जिससे मांग को पूरा करना आसान हुआ.
कोयला अब भी सबसे बड़ा सहारा
जनवरी में कुल बिजली उत्पादन 6% बढ़कर 156 BU रहा. नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन 10% बढ़ा, क्योंकि नई क्षमता जुड़ी, लेकिन कोयला आधारित बिजली की हिस्सेदारी 74% तक पहुंच गई, जो सालाना औसत से ज्यादा है. इससे साफ है कि सर्दियों में जब सोलर ऊर्जा से बिजली का उत्पादन कम रहता है, तब कोयला सिस्टम को बैलेंस करने में अहम भूमिका निभाता है. हाइड्रो और न्यूक्लियर उत्पादन में भी क्रमशः 11.8% और 5.3% की बढ़ोतरी हुई.
पावर डिमांड की बदलती तस्वीर
जनवरी अभी भी साल का पीक सीजन नहीं है, लेकिन डेटा दिखाता है कि देश की बेसिक बिजली जरूरत लगातार बढ़ रही है. पहले जहां सर्दियों में मांग गर्मियों की तुलना में कम रहती थी, अब घरेलू और कमर्शियल लोड के कारण बेस लेवल ऊंचा हो गया है. यही वजह है कि सर्दियों में भी रिकॉर्ड मांग देखने को मिल रही है.
क्रिसिल का अनुमान है कि 2025-26 में कुल बिजली मांग करीब 1,730 BU तक पहुंच सकती है. हालांकि लंबा मॉनसून और मौसम के उतार-चढ़ाव ग्रोथ को थोड़ा धीमा कर सकते हैं, लेकिन आर्थिक गतिविधि और ऊर्जा ट्रांजिशन के चलते बिजली की जरूरत बढ़ती रहने की उम्मीद है.
महत्वपूर्ण बात ये है कि सरकार, ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों पर फोकस कर रही है. प्राइवेट कंपनियों को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है. बड़ी-बड़ी कंपनियां सोलर और पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट्स के जरिये सस्ती बिजली का उत्पादन कर रही है और सरकार उनसे बिजली खरीद भी रही हैं, जिससे उपभोक्ताओं तक फायदा पहुंच रहा है.
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