अनिल अग्रवाल के संघर्ष की कहानी, जब थाली लेकर बैठी रहती थीं पत्‍नी, 75% संपत्ति दान की प्रेरणा कहां से मिली?

Anil Agarwal: अनिल अग्रवाल कहते हैं कि इसी दर्शन ने उन्हें यह सिखाया कि उनके पास मौजूद अपार धन असल में उनका नहीं, बल्कि समाज का है. वे खुद को अपनी संपत्ति का केवल एक 'ट्रस्टी' मानते हैं. 

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अनिल अग्रवाल के संघर्ष के दिनों की कहानी

अनिल अग्रवाल आज दुनिया के सबसे सफल उद्यमियों में से एक हैं, लेकिन उनकी यह सफलता रातों-रात नहीं मिली. 1976 से 1986 के बीच का दशक उनके जीवन का सबसे कठिन संघर्ष का दौर था. वे बताते हैं कि उन दिनों वे मुंबई में अपनी पहचान बनाने के लिए दिन-रात एक कर रहे थे. काम का बोझ इतना अधिक था कि उन्हें अक्सर घर लौटते हुए रात के 2 बज जाते थे. इस संघर्षपूर्ण यात्रा में उनकी पत्नी, किरण अग्रवाल, उनकी सबसे बड़ी ताकत बनीं. अनिल अग्रवाल ने भावुक होते हुए याद किया कि चाहे रात के 2 क्यों न बज जाएं, किरण तब तक खाना नहीं खाती थीं जब तक वे घर न आ जाएं. वे हाथ में थाली लेकर अपने पति की राह ताकती रहती थीं. जब अनिल घर पहुंचते, तब दोनों साथ बैठकर शांति से भोजन करते थे.

सादगी भरा साथ और असली पूंजी 

वे कहते हैं कि उस समय हमारे पास बहुत पैसा या सुख-सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन वह सादगी भरा साथ और एक-दूसरे के प्रति वह समर्पण ही उनकी असली पूंजी थी. आज भले ही उनके पास बड़े आलीशान घर और महल जैसे मकान हैं, लेकिन वे उस समय को याद कर थोड़े उदास भी होते हैं. वे कहते हैं कि आज मैं 8 बजे भी घर आ जाऊं, तो कोई मिलने वाला नहीं होता; बस दो कुत्ते हैं जो घर में घुसते ही स्वागत करते हैं.  

अनिल अग्रवाल की एक पुरानी पोस्‍ट

आज भी पत्‍नी से लेते हैं जेबखर्च 

अनिल अग्रवाल के पास भले ही अरबों की संपत्ति है, लेकिन जब बात उनके निजी खर्चों की आती है, तो वह आज भी अपनी पत्नी किरण अग्रवाल के अनुशासन में रहना पसंद करते हैं. एक सफल और अमीर कारोबारी होने के बावजूद उन्होंने अपने पारिवारिक जीवन में एक बहुत ही सरल और ईमानदार व्यवस्था बना रखी है.

उन्‍होंने एक इंटरव्‍यू में बताया कि उन्होंने अपनी निजी जिंदगी में एक सख्त आर्थिक अनुशासन अपनाया हुआ है. वे अपनी कंपनी से जो भी सैलरी लेते हैं, उसे खुद पास रखने के बजाय सीधे अपनी पत्नी को सौंप देते हैं. वे बताते हैं कि लंदन में उनकी पत्नी ही उन्हें रोजमर्रा के खर्च के लिए हर दिन '200 पाउंड' (करीब 21,000 रुपये) देती हैं.

वे मुस्कुराते हुए कहते हैं कि इसमें से भी अक्सर 100 पाउंड बच ही जाते हैं क्योंकि उनके पास खर्च करने के लिए बहुत कुछ नहीं होता. इतने बड़े व्यापारिक साम्राज्य को संभालने वाला व्यक्ति अपने घर में कितना सरल है और अपनी पत्नी पर उनका भरोसा कितना अटूट है.

75% संपत्ति दान की प्रेरणा कहां से मिली? 

अनिल अग्रवाल के जीवन में दान और सेवा की भावना उनके बचपन के उन दृश्यों से आई है, जिन्हें उन्होंने पटना के गंगा घाटों पर देखा था. वे अपनी मां के संस्कारों को अपने साम्राज्य की नींव मानते हैं. वे एक बेहद भावुक दृश्य याद करते हुए उन्‍होंने बताया था कि जब उनकी मां और अन्य महिलाएं छठ पूजा के दौरान गंगा जी में अर्घ्य देने जाती थीं, वे देखते थे कि कैसे उनकी मां गंगा जी का पानी अपनी अंजलि में उठाती थीं और मंत्रोच्चार के साथ वापस गंगा जी में ही अर्पित कर देती थीं. 

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उन्‍होंने कहा, 'उनके दिलो-दिमाग में छप गया था. इसका मतलब था कि 'जो आपसे (प्रकृति/समाज से) लिया है, वह आपको ही वापस देना है'. अग्रवाल कहते हैं कि इसी दर्शन ने उन्हें यह सिखाया कि उनके पास मौजूद अपार धन असल में उनका नहीं, बल्कि समाज का है. वे खुद को अपनी संपत्ति का केवल एक 'ट्रस्टी' मानते हैं. 

उन्होंने संकल्प लिया है कि वे अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा लोक कल्याण के लिए दान करेंगे, क्योंकि इंसान हाथ खाली लेकर आता है और खाली हाथ ही जाता है. बेटे के असामयिक निधन के बाद उन्‍होंने अपना यही संकल्‍प दोहराया है. उन्‍होंने कहा है कि वे जो भी कमाएंगे, उसका 75 फीसदी हिस्‍सा समाज को लौटा देंगे. यानी 75 फीसदी वो समाज के भले के लिए खर्च करेंगे. वे कहते हैं कि जो लिया है उसे यहीं लौटाना है, क्योंकि साथ तो कुछ लेकर जाना नहीं है.  

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