Health Insurance Claim Rejection: हमने तो हर साल टाइम पर प्रीमियम भरा, फिर आज कंपनी क्यों क्लेम के पैसे नहीं दे रही है? यह सवाल उस हर शख्स का है जिसका हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम लास्ट टाइम पर रिजेक्ट हो गया. लोग पॉलिसी तो ले लेते हैं लेकिन उसकी शर्तें पढ़ना भूल जाते हैं. पिछले दिनों सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हुए जिसमें हजारों का प्रीमियम भरने के बाद कंपनी ने क्लेम के तौर पर एक रुपया भी नहीं दिया. इसलिए अगर आपका भी हेल्थ इंश्योरेंस है और बड़े अमाउंट में प्रीमियम भर रहे हैं तो यह खबर आपके लिए ही है.
क्लेम रिजेक्ट होता क्यों हैं? अगर इसके बारे में जान लिया तो इस समस्या को लगभग आप हल कर ले जाएंगे. इस खबर में उन 6 बातों के बारे में बताते हैं, जो आपके क्लेम प्रोसेस के बीच में आ जाती हैं और कंपनियां टो टूक बीमा होल्डर को मना कर देती हैं.
1. पुरानी बीमारी के बारे में ना बताना
ज्यादातर लोग पॉलिसी लेते समय मेडिकल हिस्ट्री छिपा लेते हैं. दरअसल ऐसा करने से प्रीमियम कम आता है. साथ में पॉलिसी भी आसानी से मिल जाती है. पर याद रखें इंश्योरेंस कंपनियां जासूस की तरह काम करती हैं. अगर उन्हें पता चला कि आपको शुगर या बीपी की समस्या पहले से थी और आपने नहीं बताया तो वो बिना सोचे क्लेम रिजेक्ट कर देंगी. इसलिए कहा भी जाता है कि सच बोलना ही सबसे अच्छी पॉलिसी है.
2. वेटिंग पीरियड का माया जाल
हम लोग दरअसल यह सोचते हैं कि आज पॉलिसी ले ली, अब कोई बीमारी हो भी जाए तो क्या दिक्कत? पर एक बात यहां ध्यान रखने वाली है कि पॉलिसी लेते ही अगले दिन से सब कुछ कवर नहीं होता. हर कंपनी का एक वेटिंग पीरियड होता है. घुटने का ऑपरेशन, मोतियाबिंद या पथरी जैसी बीमारियों के लिए एक फिक्स समय तक रुकना पड़ता है. अगर इस दौरान क्लेम किया तो रिजेक्शन पक्का है.
हां, अगर आप अपनी पॉलिसी को माइग्रेट कर रहे हैं, जैसे एक पॉलिसी से दूसरी कंपनी की पॉलिसी में, तो यह वेटिंग पीरियड हो सकता है वहां लागू ना हो. क्योंकि वो आप पहले वाली कंपनी में पूरा कर चुके होते हैं.
Health Insurance Claim Rejection
3. रूम रेंट कैपिंग और को-पेमेंट की जानकारी
क्या आपको पता है कि हॉस्पिटल में आपके लिए हुए रूम की भी एक लिमिट है? अगर आपकी लिमिट 5 हजार रुपये है और आप 10 हजार वाले कमरे में रुक गए तो कंपनी सिर्फ कमरा ही नहीं, बल्कि डॉक्टर की फीस और दूसरे खर्चों में भी पैसा काट लेगी. वहीं को-पेमेंट क्लॉज का मतलब है कि बिल का एक हिस्सा, जैसे 10-20% आपको जेब से भरना होगा. बाकि का इंश्योरेंस कंपनी देगी.
4. डॉक्युमेंट्स में छोटी सी चूक
अस्पताल से डिस्चार्ज होते समय डिस्चार्ज समरी, ओरिजिनल बिल और टेस्ट रिपोर्ट्स को ध्यान से चेक करें. अगर डॉक्टर की लिखने के स्टाइल और बिल के अमाउंट में मिसमैच हुआ या कोई जरूरी पेपर गायब हुआ तो क्लेम अटक जाएगा. ऐसे में डिस्चार्ज होने से पहले अपने एजेंट से एक बार बात कर लेना समझदारी भरा फैसला हो सकता है.
5. बीमारियों के लिए सब-लिमिट
मान लीजिए आपकी पॉलिसी 10 लाख की है, लेकिन कंपनी ने मोतियाबिंद के लिए केवल 30 हजार की सब-लिमिट रखी है. अब भले ही आपका बिल 1 लाख आए, कंपनी केवल 30 हजार ही देगी. इसे क्लेम रिजेक्शन तो नहीं, लेकिन पार्शियल रिजेक्शन जरूर कह सकते हैं जो जेब पर भारी पड़ता है.
6. मॉडर्न ट्रीटमेंट
आजकल रोबोटिक सर्जरी और स्टेम सेल थेरेपी का दौर है. कई पुरानी पॉलिसियां इन मॉर्डन ट्रीटमेंट को कवर नहीं करतीं. अगर आपकी पॉलिसी अपडेटेड नहीं है तो नई तकनीक से इलाज कराने पर कंपनी हाथ खड़े कर सकती है.














