ट्रंप की चेतावनी के बाद कच्चे तेल में लगी आग, ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल के पार, 4 साल के रिकॉर्ड हाई पर पहुंची कीमतें

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल. ब्रेंट क्रूड $120 के पार पहुंचा, जो 2022 के बाद का सबसे उच्चतम स्तर है.

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Crude Oil Price Today: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष की वजह से इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है.

दुनिया भर में एक बार फिर तेल की कीमतों ने आग पकड़ ली है और इसका सबसे बड़ा कारण है अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त चेतावनी और ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी ने ग्लोबल मार्केट में हलचल मचा दी है. तेल की कीमतें 4 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. ट्रंप ने चेतावनी दी है कि ईरान के बंदरगाहों की अमेरिकी घेराबंदी (Blockade) अभी महीनों तक चल सकती है.

ट्रंप का मानना है कि ईरान परमाणु समझौते को लेकर ईमानदारी से बातचीत नहीं कर रहा है. उन्होंने नेशनल सिक्योरिटी ऑफिसर्स से कहा है कि इस घेराबंदी को तब तक जारी रखें जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को छोड़ने के लिए मजबूर न हो जाए.

ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल के पार

ईरान और अमेरिका के बीच इस तनातनी का सबसे बुरा असर तेल की कीमतों पर पड़ा है. दुनिया के कुल तेल और गैस सप्लाई का पांचवां हिस्सा 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है, जिस पर संकट मंडरा रहा है. इसी डर से ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जो 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी 108 डॉलर के आसपास बना हुआ है. 

जानकारों ने चेतावनी दी है कि अगर तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो इसका असर अर्थव्यवस्था और कंपनियों के मुनाफे पर दिखने लगेगा.

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तेल की कीमतों ने बढ़ाई फेडरल रिजर्व की टेंशन 

फेडरल रिजर्व के सामने अब दोहरी चुनौती है. एक तरफ महंगाई बढ़ रही है और दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था को संभालना है. फेड ने फिलहाल ब्याज दरों को 3.5% से 3.75% के बीच स्थिर रखा है, लेकिन मीटिंग में सदस्यों के बीच काफी मतभेद दिखे. फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने माना कि तेल की ऊंची कीमतों की वजह से महंगाई दर मार्च में बढ़कर 3.5% हो गई है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर पेट्रोल के दाम इसी तरह बढ़ते रहे, तो लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो जाएगी, क्योंकि उनकी जेब से पैसा ईंधन पर ज्यादा खर्च होगा.

एशिया और भारत पर संकट के बादल

पॉवेल ने स्पष्ट किया कि तेल के झटके का सबसे ज्यादा असर अमेरिका के मुकाबले पश्चिमी यूरोप और एशिया पर पड़ेगा. भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह तेल आयात (Import) पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति काफी खतरनाक हो सकती है. इससे व्यापार घाटा (Trade Deficit) बढ़ने और घरेलू महंगाई के और ऊपर जाने का खतरा है. फिलहाल फेडरल रिजर्व 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में है

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